महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2198, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[अग्निके स्वरूपमें अग्निहोत्रकी विधि तथा उसके माहात्म्यका वर्णन]
युधिष्ठिर उवाच
कथं तद् ब्राह्मणैर्देव होतव्यं क्षत्रियैः कथम् ।
वैश्यैर्वा देवदेवेश कथं वा सुहुतं भवेत् ॥
युधिष्ठिरने पूछा— देवदेवेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंको किस प्रकार हवन करना चाहिये? और उनके द्वारा किस प्रकार किया हुआ हवन शुभ होता है? ॥
कत्यग्नयः किमात्मानः स्थानं किं कस्य वा विभो ।
कतरस्मिन् हुते स्थानं कं व्रजेदग्निहोत्रिकः ॥
विभो! अग्निके कितने भेद हैं? उनके पृथक्-पृथक् स्वरूप क्या हैं? किस अग्निका कहाँ स्थान है? अग्निहोत्री पुरुष किस अग्निमें हवन करके किस लोकको प्राप्त होता है? ॥
अग्निहोत्रनिमित्तं च किमुत्पन्नं पुरानघ ।
कथमेवाथ हूयन्ते प्रीयन्ते च सुराः कथम् ॥
निष्पाप! पूर्वकालमें अग्निहोत्र किसके निमित्तसे उत्पन्न हुआ था? देवताओंके लिये किस प्रकार हवन किया जाता है और कैसे उनकी तृप्ति होती है? ॥
विधिवन्मन्त्रवत् कृत्वा पूजितास्त्वग्नयः कथम् ।
कां गतिं वदतां श्रेष्ठ नयन्ति ह्यग्निहोत्रिणः ॥
प्रवक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! विधिके अनुसार मन्त्रोंसहित पूजा की जानेपर तीनों अग्नियाँ अग्निहोत्रीको किस प्रकार किस गतिको प्राप्त कराती हैं? ॥
दुर्हुताश्चापि भगवन्नविज्ञातास्त्रयोऽग्नयः ।
किमाहिताग्नेः कुर्वन्ति दुश्शीर्णा वापि केशव ॥
भगवन्! केशव! यदि तीनों अग्नियोंके स्वरूपको न जानकर उनमें अविधिपूर्वक हवन किया जाय अथवा उनकी उपासनामें त्रुटि रह जाय तो वे त्रिविध अग्नि अग्निहोत्रीका क्या अनिष्ट करते हैं? ॥
उत्सन्नाग्निस्तु पापात्मा कां योनिं देव गच्छति ।
एतत् सर्वं समासेन भक्त्या ह्युपगतस्य मे ।
वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ सर्वाधिक नमोऽस्तु ते ॥
देवेश्वर! जिसने अग्निका परित्याग कर दिया हो, वह पापात्मा किस योनिमें जन्म लेता है? ये सारी बातें संक्षेपमें मुझे सुनाइये; क्योंकि मैं भक्तिभावसे आपकी शरणमें आया हूँ। भगवन्! आप सर्वज्ञ हैं, सबसे महान् हैं; अतः आपको मैं नमस्कार करता हूँ ॥
श्रीभगवानुवाच
शृणु राजन् महापुण्यमिदं धर्मामृतं परम् ।
यत् तु तारयते युक्तान् ब्राह्मणानग्निहोत्रिणः ॥