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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

(श्राद्धपर्व)

(श्राद्धपर्व)

षड्विंशोऽध्यायः

प्राप्त अनुस्मृतिविद्या और दिव्यदृष्टिके प्रभावसे युधिष्ठिरका महाभारतयुद्धमें मारे गये लोगोंकी संख्या और गतिका वर्णन तथा युधिष्ठिरकी आज्ञासे सबका दाह-संस्कार

श्रीभगवानुवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गान्धारि मा च शोके मनः कृथाः ।
तवैव ह्यपराधेन कुरवो निधनं गताः ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले—गान्धारी! उठो, उठो। शोकमें मनको न डुबाओ। तुम्हारे ही अपराधसे कौरवोंका विनाश हुआ है ॥ १ ॥
यत् त्वं पुत्रं दुरात्मानमीर्षुमत्यन्तमानिनम् ।
दुर्योधनं पुरस्कृत्य दुष्कृतं साधु मन्यसे ॥ २ ॥
निष्ठुरं वैरपुरुषं वृद्धानां शासनातिगम् ।
कथमात्मकृतं दोषं मय्याधातुमिहेच्छसि ॥ ३ ॥
तुम्हारा पुत्र दुर्योधन दुरात्मा, दूसरोंसे ईर्ष्या एवं जलन रखनेवाला और अत्यन्त अभिमानी था। दुष्कर्मपरायण, निष्ठुर, वैरका मूर्तिमान् स्वरूप और बड़े-बूढ़ोंकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाला था। तुमने उसको अगुआ बनाकर जो अपराध किया है, उसे क्या तुम अच्छा समझती हो? अपने ही किये हुए दोषको यहाँ मुझपर कैसे लादना चाहती हो? ॥ २-३ ॥
मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति ।
दुःखेन लभते दुःखं द्वावनर्थौ प्रपद्यते ॥ ४ ॥
यदि कोई मनुष्य किसी मरे हुए सम्बन्धी, नष्ट हुई वस्तु अथवा बीती हुई बातके लिये शोक करता है तो वह एक दुःखसे दूसरे दुःखका भागी होता है, इस प्रकार वह दो अनर्थोंको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
तपोर्थियं ब्राह्मणी धत्त गर्भं
** गौर्वोढारं धावितारं तुरङ्गी ।

शूद्रा दासं पशुपालं च वैश्या
** वधार्थियं त्वद्विधा राजपुत्री ॥ ५ ॥

ब्राह्मणी तपके लिये, गाय बोझ ढोनेके लिये, घोड़ी वेगसे दौड़नेके लिये, शूद्रा सेवाके लिये, वैश्य-कन्या पशु-पालन करनेके लिये और तुम-जैसी राजपुत्री युद्धमें लड़कर मरनेके लिये पुत्र पैदा करती है ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य पुनरुक्तं वचोऽप्रियम् ।
तूष्णीं बभूव गान्धारी शोकव्याकुललोचना ॥ ६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! श्रीकृष्णका दुबारा कहा हुआ वह अप्रिय वचन सुनकर गान्धारी चुप हो गयी। उसके नेत्र शोकसे व्याकुल हो उठे थे ॥ ६ ॥
धृतराष्ट्रस्तु राजर्षिर्निगृह्याबुद्धिजं तमः ।
पर्यपृच्छत धर्मज्ञो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥ ७ ॥
उस समय धर्मज्ञ राजर्षि धृतराष्ट्रने अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाले शोक और मोहको रोककर धर्मराज युधिष्ठिरसे पूछा— ॥ ७ ॥
जीवतां परिमाणज्ञः सैन्यानामसि पाण्डव ।
हतानां यदि जानीषे परिमाणं वदस्व मे ॥ ८ ॥
‘पाण्डुनन्दन! तुम जीवित सैनिकोंकी संख्याके जानकार तो हो ही। यदि मरे हुओंकी संख्या जानते हो तो मुझे बताओ ॥ ८ ॥

युधिष्ठिर उवाच

दशायुतानामयुतं सहस्राणि च विंशतिः ।
कोट्यः षष्टिश्च षट् चैव ह्यस्मिन् राजन् मृधे हताः ॥ ९ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**राजन्! इस युद्धमें एक अरब, छाछठ करोड़, बीस हजार योद्धा मारे गये हैं ॥ ९ ॥
अलक्षितानां वीराणां सहस्राणि चतुर्दश ।
दश चान्यानि राजेन्द्र शतं षष्टिश्च पञ्च च ॥ १० ॥
राजेन्द्र! इनके अतिरिक्त चौबीस हजार एक सौ पैंसठ सैनिक लापता है ॥ १० ॥

धृतराष्ट्र उवाच

युधिष्ठिर गतिं कां ते गताः पुरुषसत्तम ।
आचक्ष्व मे महाबाहो सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ॥ ११ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**पुरुषप्रवर! महाबाहु युधिष्ठिर! तुम तो मुझे सर्वज्ञ जान पड़ते हो; अतः यह तो बताओ कि ‘वे मरे हुए सैनिक किस गतिको प्राप्त हुए हैं?’ ॥

युधिष्ठिर उवाच

यैर्हुतानि शरीराणि हृष्टैः परमसंयुगे ।

देवराजसमालूँलोकान् गतास्ते सत्यविक्रमाः ॥ १२ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**जिन लोगोंने इस महासमरमें बड़े हर्ष और उत्साहके साथ अपने शरीरोंकी आहुति दी है, वे सत्यपराक्रमी वीर देवराज इन्द्रके समान लोकोंमें गये हैं ॥
ये त्वहृष्टेन मनसा मर्तव्यमिति भारत ।
युध्यमाना हताः संख्ये गन्धर्वैः सह संगताः ॥ १३ ॥
भारत! जो अप्रसन्न मनसे मरनेका निश्चय करके रणक्षेत्रमें जूझते हुए मारे गये हैं, वे गन्धर्वोंके साथ जा मिले हैं ॥ १३ ॥
ये च संग्रामभूमिष्ठा याचमानाः पराङ्मुखाः ।
शस्त्रेण निधनं प्राप्ता गतास्ते गुह्यकान् प्रति ॥ १४ ॥
जो संग्रामभूमिमें खड़े हो प्राणोंकी भीख माँगते हुए युद्धसे विमुख हो गये थे; उनमेंसे जो लोग शस्त्रद्वारा मारे गये हैं, वे गुह्यकलोकोंमें गये हैं ॥ १४ ॥
पात्यमानाः परैर्यै तु हीयमाना निरायुधाः ।
ह्रीनिषेवा महात्मानः परानभिमुखा रणे ॥ १५ ॥
छिद्यमानाः शितैः शस्त्रैः क्षत्रधर्मपरायणाः ।
गतास्ते ब्रह्मसदनं न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ १६ ॥
जिन महामनस्वी पुरुषोंको शत्रुओंने गिरा दिया था, जिनके पास युद्ध करनेका कोई साधन नहीं रह गया था, जो शस्त्रहीन हो गये थे और उस अवस्थामें भी लज्जाशील होनेके कारण जो रणभूमिमें निरन्तर शत्रुओंका सामना करते हुए ही तीखे अस्त्र-शस्त्रोंसे कट गये, वे क्षत्रियधर्मपरायण पुरुष ब्रह्मलोकमें गये हैं, इस विषयमें मेरा कोई दूसरा विचार नहीं है ॥ १५-१६ ॥
ये त्वत्र निहता राजन्नन्तरायोधनं प्रति ।
यथाकथंचित् पुरुषास्ते गतास्तूत्तरान् कुरून् ॥ १७ ॥
राजन्! इनके सिवा, जो लोग इस युद्धकी सीमाके भीतर रहकर जिस किसी भी प्रकारसे मार डाले गये हैं, वे उत्तर कुरुदेशमें जन्म धारण करेंगे ॥ १७ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

केन ज्ञानबलेनैवं पुत्र पश्यसि सिद्धवत् ।
तन्मे वद महाबाहो श्रोतव्यं यदि वै मया ॥ १८ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**बेटा! किस ज्ञानबलसे तुम इस तरह सिद्ध पुरुषोंके समान सब कुछ प्रत्यक्ष देख रहे हो। महाबाहो! यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो बताओ ॥

युधिष्ठिर उवाच

निदेशाद् भवतः पूर्वं वने विचरता मया ।
तीर्थयात्राप्रसङ्गेन सम्प्राप्तोऽयमनुग्रहः ॥ १९ ॥

**युधिष्ठिर बोले—**महाराज! पहले आपकी आज्ञासे जब मैं वनमें विचरता था, उन्हीं दिनों तीर्थयात्राके प्रसंगसे मुझे एक महात्माका इस रूपमें अनुग्रह प्राप्त हुआ ।।

देवर्षिर्लोमशो दृष्टस्ततः प्राप्तोऽस्म्यनुस्मृतिम् ।
दिव्यं चक्षुरपि प्राप्तं ज्ञानयोगेन वै पुरा ॥ २० ॥

तीर्थयात्राके समय देवर्षि लोमशका दर्शन हुआ था। उन्हींसे मैंने यह अनुस्मृतिविद्या प्राप्त की थी। इसके सिवा, पूर्वकालमें ज्ञानयोगके प्रभावसे मुझे दिव्यदृष्टि भी प्राप्त हो गयी थी ॥ २० ॥

धृतराष्ट्र उवाच

अनाथानां जनानां च सनाथानां च भारत ।
कच्चित् तेषां शरीराणि धक्ष्यसे विधिपूर्वकम् ॥ २१ ॥

**धृतराष्ट्रने पूछा—**भारत! यहाँ जो अनाथ और सनाथ योद्धा मरे पड़े हैं, क्या तुम उनके शरीरोंका विधिपूर्वक दाह-संस्कार करा दोगे? ॥ २१ ॥

न येषामस्ति संस्कर्ता न च येऽत्राहिताग्नयः ।
वयं च कस्य कुर्याम बहुत्वात् तात कर्मणाम् ॥ २२ ॥

जिनका कोई संस्कार करनेवाला नहीं है तथा जो अग्निहोत्री नहीं रहे हैं, उनका भी प्रेतकर्म तो करना ही होगा, तात! यहाँ तो बहुतोंके अन्त्येष्टि-कर्म करने हैं, हम किस-किसका करें? ॥ २२ ॥

यान् सुपर्णाश्च गृध्राश्च विकर्षन्ति यतस्ततः ।
तेषां तु कर्मणा लोका भविष्यन्ति युधिष्ठिर ॥ २३ ॥

युधिष्ठिर! जिनकी लाशोंको गरुड़ और गीध इधर-उधर घसीट रहे हैं, उन्हें तो श्राद्धकर्मसे ही शुभलोक प्राप्त होंगे? ॥ २३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तो महाराज कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
आदिदेश सुधर्माणं धौम्यं सूतं च संजयम् ॥ २४ ॥
विदुरं च महाबुद्धिं युयुत्सुं चैव कौरवम् ।
इन्द्रसेनमुखांश्चैव भृत्यान् सूतांश्च सर्वशः ॥ २५ ॥
भवन्तः कारयन्त्वेषां प्रेतकार्याण्यशेषतः ।
यथा चानाथवत् किंचिच्छरीरं न विनश्यति ॥ २६ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज! राजा धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने सुधर्मा, धौम्य, सारथि संजय, परम बुद्धिमान् विदुर, कुरुवंशी युयुत्सु तथा इन्द्रसेन आदि सेवकों एवं सम्पूर्ण सूतोंको यह आज्ञा दी कि 'आपलोग इन सबके प्रेतकार्य सम्पन्न करावें। ऐसा न हो कि कोई भी लाश अनाथके समान नष्ट हो जाय' ॥

शासनाद् धर्मराजस्य क्षत्ता सूतश्च संजयः ।
सुधर्मा धौम्यसहित इन्द्रसेनादयस्तथा ॥ २७ ॥
चन्दनागुरुकाष्ठानि तथा कालीयकान्युत ।
घृतं तैलं च गन्धांश्च क्षौमाणि वसनानि च ॥ २८ ॥
समाहृत्य महार्हाणि दारूणां चैव संजयान् ।
रथांश्च मृदितांस्तत्र नानाप्रहरणानि च ॥ २९ ॥
चिताः कृत्वा प्रयत्नेन यथामुख्यान् नराधिपान् ।
दाहयामासुरव्यग्राः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ ३० ॥
धर्मराजके आदेशसे विदुरजी, सारथि संजय, सुधर्मा, धौम्य तथा इन्द्रसेन आदिने चन्दन और अगरुकी लकड़ी कालीयक, घी, तेल, सुगन्धित पदार्थ और बहुमूल्य रेशमी वस्त्र आदि वस्तुएँ एकत्र कीं, लकड़ियोंका संग्रह किया, टूटे हुए रथों तथा नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको भी एकत्र कर लिया। फिर उन सबके द्वारा प्रयत्नपूर्वक कई चिताएँ बनाकर जेठे-छोटेके क्रमसे सभी राजाओंका शास्त्रीय विधिके अनुसार उन्होंने शान्तभावसे दाह-संस्कार सम्पन्न कराया ।।

दुर्योधनं च राजानं भ्रातॄंश्चास्य महारथान् ।
शल्यं शलं च राजानं भूरिश्रवसमेव च ॥ ३१ ॥
जयद्रथं च राजानमभिमन्युं च भारत ।
दौःशासनिं लक्ष्मणं च धृष्टकेतुं च पार्थिवम् ॥ ३२ ॥
बृहन्तं सोमदत्तं च सृञ्जयांश्च शताधिकान् ।
राजानं क्षेमधन्वानं विराटद्रुपदौ तथा ॥ ३३ ॥
शिखण्डिनं च पाञ्चाल्यं धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ।
युधामन्युं च विक्रान्तमुत्तमौजसमेव च ॥ ३४ ॥
कौसल्यं द्रौपदेयांश्च शकुनिं चापि सौबलम् ।
अचलं वृषकं चैव भगदत्तं च पार्थिवम् ॥ ३५ ॥
कर्णं वैकर्तनं चैव सहपुत्रममर्षणम् ।
केकयांश्च महेष्वासांस्त्रिगर्तांश्च महारथान् ॥ ३६ ॥
घटोत्कचं राक्षसेन्द्रं बकभ्रातरमेव च ।
अलम्बुषं राक्षसेन्द्रं जलसन्धं च पार्थिवम् ॥ ३७ ॥
एतांश्चान्यांश्च सुबहून् पार्थिवांश्च सहस्रशः ।
घृतधाराहुतैर्दीप्तैः पावकैः समदाहयन् ॥ ३८ ॥
राजा दुर्योधन, उनके निन्यानबे महारथी भाई, राजा शल्य, शल, भूरिश्रवा, राजा जयद्रथ, अभिमन्यु, दुःशासन-पुत्र लक्ष्मण, राजा धृष्टकेतु, बृहन्त, सोमदत्त, सौसे भी अधिक सृंजयवीर, राजा क्षेमधन्वा, विराट द्रुपद, शिखण्डी, पांचालदेशीय द्रुपदपुत्र

धृष्टद्युम्न, युधामन्यु, पराक्रमी उत्तमौजा, कोसलराज बृहद्वल, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, सुबलपुत्र शकुनि, अचल, वृषक, राजा भगदत्त, पुत्रोंसहित अमर्षशील वैकर्तन कर्ण, महाधनुर्धर पाँचों केकयराजकुमार, महारथी त्रिगर्त, राक्षसराज घटोत्कच, बकके भाई राक्षसप्रवर अलम्बुष और राजा जलसंध—इनका तथा अन्य बहुतेरे सहस्रों भूपालोंका घीकी धारासे प्रज्वलित हुई अग्नियोंद्वारा उन लोगोंने दाह-कर्म कराया ।। ३१—३८ ।।

पितृमेधाश्च केषांचित् प्रावर्तन्त महात्मनाम् ।
सामभिश्चाप्यगायन्त तेऽन्वशोचन्त चापरैः ॥ ३९ ॥
किन्हीं महामनस्वी वीरोंके लिये पितृमेध (श्राद्धकर्म) भी आरम्भ कर दिये गये। कुछ लोगोंने वहाँ सामगान किया तथा कितने ही मनुष्योंने वहाँ मरे हुए विभिन्न जनोंके लिये महान् शोक प्रकट किया ।। ३९ ।।

साम्नामृचां च नादेन स्त्रीणां च रुदितस्वनैः ।
कश्मलं सर्वभूतानां निशायां समपद्यत ॥ ४० ॥
सामवेदीय मन्त्रों तथा ऋचाओंके घोष और स्त्रियोंके रोनेकी आवाजसे वहाँ रातमें सभी प्राणियोंको बड़ा कष्ट हुआ ।। ४० ।।

ते विधूमाः प्रदीप्ताश्च दीप्यमानाश्च पावकाः ।
नभसीवान्वदृश्यन्त ग्रहास्तन्वभ्रसंवृताः ॥ ४१ ॥
उस समय स्वल्प धूमयुक्त, प्रज्वलित तथा जलायी जाती हुई चिताकी अग्नियाँ आकाशमें सूक्ष्म बादलोंसे ढँके हुए ग्रहोंके समान दिखायी देती थीं ।। ४१ ।।

ये चाप्यनाथास्तत्रासन् नानादेशसमागताः ।
तांश्च सर्वान् समानाय्य राशीन् कृत्वा सहस्रशः ॥ ४२ ॥
चित्त्वा दारुभिरव्यग्रैः प्रभूतैः स्नेहपाचितैः ।
दाहयामास तान् सर्वान् विदुरो राजशासनात् ॥ ४३ ॥
इसके बाद वहाँ अनेक देशोंसे आये हुए जो अनाथ लोग मारे गये, उन सबकी लाशोंको मँगवाकर उनके सहस्रों ढेर लगाये। फिर घी-तेलमें भिगोयी हुई बहुत-सी लकड़ियोंद्वारा स्थिरचित्तवाले लोगोंसे चिता बनाकर उन सबको विदुरजीने राजाकी आज्ञाके अनुसार दग्ध करवा दिया ।। ४२-४३ ।।

कारयित्वा क्रियास्तेषां कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य गङ्गामभिमुखोऽगमत् ॥ ४४ ॥
इस प्रकार उन सबका दाहकर्म कराकर कुरुराज युधिष्ठिर धृतराष्ट्रको आगे करके गंगाजीकी ओर चले गये ।। ४४ ।।

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि श्राद्धपर्वणि कुरूणामौर्ध्वदेहिके षड्विंशोऽध्यायः ॥
२६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत श्राद्धपर्वमें कौरवोंका और्ध्वदैहिक संस्कारविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २६ ।।