सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

षष्ठ लम्बक ७१

षष्ठ लम्बक ७१
मैंने भय से जाकर इसी भवन के पीछे उद्यान में अनार के पेड़ के नीचे की भूमि में गाड़
दिया है॥१२०॥
तो अब मेरी रक्षा करो और मेरे हाथ में जो सोना है उसे ले लो। यह सुनकर हरिशर्मा
गर्व के साथ कहने लगा॥१२१॥
'तू जा मैं भूत भविष्य सब जानता हूँ। दीन और शरण में आई हुई तुझसे प्रकट न करूँगा।
जो तेरे हाथ में धन है उसे मुझे न देगी तब ऐसा करूँगा' ॥१२२॥
हरिशर्मा से इस प्रकार कही गई दासी उसकी बात मानकर शीघ्र चली गई॥१२३॥
तदनन्तर स्वयं चकित हरिशर्मा ने आश्चर्य से सोचा कि अनुकूल दैव असाध्य बात को
भी सरलता से ही सिद्ध कर देता है ॥१२४॥
देखो मेरे सामने अनर्थ उपस्थित था किन्तु अब निःसन्देह मेरा कार्य सिद्ध हो गया।
अपनी जिह्वा की निन्दा करते हुए चोरिनी जिह्वा सामने आगई॥१२५॥
आश्चर्य है छिपे हुए पाप धोखा से ही प्रकाशित हो जाते हैं इत्यादि बातें सोचते हुए
प्रसन्न हरिशर्मा ने रात्रि व्यतीत की॥१२६॥
प्रातःकाल झूठी रेखा आदि खींचकर, राजा को उस उद्यान में ले गया और गड़ा हुआ
धन निकलवा दिया॥१२७॥
और कह दिया कि चोर कुछ हिस्सा लेकर भाग गया है। इस बात पर सन्तुष्ट राजा
उसे गाँव आदि पुरस्कार में देने को उद्यत हुआ॥१२८॥
तब एक मन्त्री ने राजा के कान में कहा—'ऐसा ज्ञान शास्त्र के बिना मनुष्य के लिए
अप्राप्य है। अतः यह अवश्य ही चोर से बताई हुई धूर्त की जीविका है॥१२९॥
इसलिए किसी अन्य उपाय से भी इस ज्योतिषी की परीक्षा करनी चाहिए' ॥१३०॥
तब राजा ने एक नया घड़ा मँगाकर, उसमें एक मेंढक डालकर बन्द कर दिया और
हरिशर्मा से कहा—॥१३१॥
'ब्राह्मण इस घड़े के अन्दर क्या है? यदि बता दो तो तुम्हारी पूजा विशेष रूप से
करूँगा' ॥१३२॥
यह सुनकर और अपना विनाश-काल जानकर, अपने पिता द्वारा हँसी-हँसी में रखे हुए
अपने मण्डूक नाम को स्मरण कर विलाप करता हुआ दैवप्रेरित हरिशर्मा इस प्रकार
बोल उठा—॥१३३-१३४॥

७२ कथासरित्सागर

७२ कथासरित्सागर
साघोरेव तु मण्डूक शवाकाण्डे घटोऽधुना।
अयशस्य विनाशाय सञ्जातोऽय हठादिह ॥१३५॥
रन्ध्रस्वाहो महाज्ञानी मेकोऽपि विदितोऽमुना।
इति जल्पन्ननन्वात्र प्रस्तुतान्नान्ययाज्जनः ॥१३६॥
ततस्तत्रातिमानान मन्वानो हरिधर्मण ।
तुष्टो राजा ददौ ग्रामान् सहेमच्छत्रवाहनान् ॥१३७॥
क्षणाच्च हरिशर्मा स जज्ञे सामन्तसन्निभः।१
इत्थं दैवेन साध्यन्ते सदर्थाः शुभकर्मणाम् ॥१३८॥
तत्सोमदत्त सदृशं दैवेनेबाभिसारिता।
निजायसदृशं राजंस्तव तेजस्वती सुता ॥१३९॥
इति मन्त्रिमुरबाच्छ्रुत्वा तस्मै राजसुताय ताम्।
राजा विक्रमसेनोऽथ ददौ लक्ष्मीमिवात्मजम् ॥१४०॥
ततः श्वशुरसैन्येन गत्वा जित्वा रिपूंश्च स।
सोमदत्तः स्वराज्यस्थस्तस्थौ भार्यासख मुदम् ॥१४१॥
एवं विधेर्भवति सर्वमिदं विशेषा
त्त्वामीदृशीं घटयितुं क इह क्षमेत।
वत्सेश्वरेण सदृशेन धिनैव देव
कुर्यामिह सखि किमत्र कलिङ्गसेने ॥१४२॥
इत्थं कथां रहसि राजसुता निशम्य
सोमप्रभावदनतोऽत्र कलिङ्गसेना।
सप्ताधिनी शिथिलबन्धुभयत्रपा सा
वत्सैशसङ्गमसमुत्कमना बभूव ॥१४३॥
अथास्तमुपमास्यति त्रिभुवनैकदीपे रवौ
प्रभातसमयागमर्षि कथञ्चिदामन्त्र्य ताम्।
सखीमभिमतोद्यमस्थितमतिं खमार्गेण सा
मयासुरसुता ययौ निजगृहाय सोमप्रभा ॥१४४॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे
मदनमञ्चुकालम्बके चतुर्थस्तरङ्गः ।
१ पाश्चात्यकथास्वपीदृश्यः कथा समालोक्यन्ते । श्रीमत्सरचित 'चतुर्माणिपत्स्य
कथा' नाम्नि पुस्तकेऽपीदृशी कथा समायाति । सर्वास मूलं कथासरित्सागर एव ।

'हे मंडूक, भांप-भांपे और विवश तेरे नाश के लिए यह चर्म कारण हुआ' ।।१३५।।
यह सुनकर प्रसंग की ओर अख लगाकर वहाँ उपस्थित पुरुषों ने कहा—'ओह ! यह
तो महान् ज्योतिषी है। इसने मण्डूक को भी जान लिया' ।।१३६।।
तब प्रसन्न राजा ने उसके कथन को प्रतिभा प्रसूत ज्ञान समझकर थान के छत्र हाथी घोड़े
आदि के साथ ग्राम भी भेंट किए ।।१३७।।
क्षण-भर में वह हरिशर्मा सामन्त राजा के समान हो गया। १ दैव अच्छे कर्मवालों के
साथ स्वयं ऐसे ही मिल कर बैठता है ।।१३८।।
इसलिए दैव ने इस कन्या को भीमदत्त के पास उचित ही अभिगमन करा दिया और
अयोग्य व्यक्ति को भी हटा दिया ।।१३९।।
मन्त्री के मुँह से इस प्रकार कथा सुनकर विक्रममत्त ने धरणी के समान अपनी कन्या
राजपुत्र सामदत्त को दे दी ।।१४० ।।
तदनन्तर सामदत्त भी श्वशुर की सेना के बल से शत्रुओं पर चढ़ाई करके और उन्हें जीतकर
अपने राज्य में अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा ।।१४१।।
हे कलिङ्गसेने दैवगति की विशेषता से ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं। अतः ऐसी सुन्दरी
तुझे वत्सेश्वर से मिलाने में दैव के सिवा और कौन समर्थ है। मैं इस विषय में क्या कर
सकती हूँ ।।१४२।।
इस प्रकार, सोमप्रभा के मुख से एकान्त में कथा सुनकर बन्धुओं के भय और लज्जा को
छोड़कर कलिङ्गसेना वत्सराज के समागम के लिए अत्यन्त उत्कण्ठित हो गई ।।१४३।।
तदनन्तर त्रिभुवन के एकमात्र दीपक सूर्य के अस्त हो जाने पर, प्रातःकाल पुन आने की
अवधि प्रदान करके मयासुर की पुत्री सोमप्रभा अभीष्ट-सिद्धि के लिए उद्यत सखी कलिङ्गसेना
से पूछकर आकाश-मार्ग से घर को चली गई ।।१४४।।
चतुर्थ तरङ्ग समाप्त

१ इस कथा से मिलती-जुलती कहानी, ग्रीस की 'परियों की कहानी' में भी है।
बेनफी का कथन है कि योरप में प्रचलित ऐसी कहानियों का मूल स्रोत कथासरित्सागर
ही है।—अनु

७६ कथासरित्सागर

७६ कथासरित्सागर
साम्यन्ती च सतं सा तं स्वप्ने दृष्टं प्रियं विना।
पृच्छन्त्यै चित्रलेखायै सख्यै सर्वं शशंस तत् ॥१५॥
सापि नामाद्यभिज्ञानं न किञ्चित्तस्य जानती।
योगेश्वरी चित्रलेखा तामुपामेवमब्रवीत् ॥१६॥
सखि देवीवरस्यायं प्रभावोऽत्र किमुच्यते।
किं त्वभिज्ञानशून्यस्ते सोऽन्वेष्टव्यः प्रियः कथम् ॥१७॥
परिजानासि चेत् ते ससुरासुरमानुषम्।
जगल्लिखामि तन्मध्ये तं मे दर्शय येन सः ॥१८॥
आनीयते मयेत्युक्ता सा तथेत्युदिते तया।
चित्रलेखा क्रमाद् विश्वममिखद् वर्णवर्तिभिः ॥१९॥
तत्रोषा सोऽयमित्यस्या दृष्टाङ्गुल्या सकम्पया।
द्वारवत्यां यदुकुलादनिरुद्धमदर्शयत् ॥२०॥
चित्रलेखा ततोऽब्रवीत् सखि धन्यासि यत्त्वया।
भर्त्तामिरुद्धः प्राप्तोऽयं पौत्रो भगवतो हरेः ॥२१॥
योजनानां सहस्रेषु षष्टौ वसति स स्थितः।
तच्छ्रुत्वा साधिकौत्सुक्यवशात्तामब्रवीदुषा ॥२२॥
माद्य चेत्सखि तस्याङ्कं ध्ये श्रीखण्डशीतलम्।
तदत्युद्दामकामाग्निनिर्वग्धां विद्धि मां मृताम् ॥२३॥
श्रुत्वैतच्चित्रलेखा सा तामाश्वास्य प्रियां सखीम्।
तदैवोत्पत्य मनसा ययौ द्वारवतीं पुरीम् ॥२४॥
ददर्श च पृथूत्तुङ्गेर्मन्दिरैरब्धिमध्यगाम्।
कुर्वतीं तं पुनः क्षिप्तमन्याभिश्चिस्तरभ्रमम् ॥२५॥
तस्यां सुप्तं निशि प्राप्य सानिरुद्धं विबोध्य च।
उपानुरागं च तस्मै शशंस स्वप्नदर्शनात्१ ॥२६॥
आदाय चाततद्रूपस्वप्नवृत्तान्तमेव तम्।
सोक्तं सिद्धिप्रभावेण क्षणेनेवाययौ ततः ॥२७॥
एत्य चावेक्षमाणायास्तस्याः सख्याः सबाष्पंगः।
प्रावेशयदुपायास्तं गुप्तमन्तःपुरं प्रियम् ॥२८॥

१ स्वप्नान्तमेवालिख्यं तमानयत् चित्रलेखेति पाठान्तरै।

षष्ठ खण्ड ७०७
स्वप्न में देखे हुए पति को न पाकर व्याकुल हुई। इसीलिए पूछती हुई सखी से
चित्रलेखा से और, सब समाचार कह दिया ॥१५॥
योगेश्वरी चित्रकला भी उसके नाम-धाम आदि का परिचय न जानती हुई उषा को इस
प्रकार कहने लगी ॥१६॥
'हे सखि यह देवी पार्वती के वर का प्रभाव है। इसमें क्या कहा जा सकता है। किन्तु
परिचय से रहित वह तेरा प्रियतम कैसे खोजा जा सकता है? ॥१७॥
'यदि तू उस नहीं पहचानती है, तो मैं संसार के सुन्दर देवनामों असुरों और मनुष्यों के
चित्र बनाती हूँ उनमें तू मुझे उसे पहचान कर दिखा ॥१८॥
'मैं उसे चाहती हूँ। ऐसा कहने पर चित्रलेखा ने भ्रमरा रंग की कूँचिया से सभी सुन्दर
व्यक्तियों के चित्र लिखे ॥१९॥
तब उषा ने काँपती हुई अँगूली से द्वारकापुरी के यदुवंशीय अनिरुद्ध को पहचान
कर दिखाया ॥२०॥
यह देखकर चित्रलेखा बोली—'सखि तू धन्य है, जो तूने भगवान् कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध
को अपना पति प्राप्त किया॥२१॥
वह यहाँ से साठ हजार योजन (२४ कोस) की दूरी पर है। यह सुनकर अधिक
उत्कण्ठा के वश होकर उषा बोली॥२२॥
'सखि यदि आज मैं उनकी चन्दन के समान शीतल गोद में न बैठी तो अति प्रचंड कामाग्नि
से मुझे दग्ध समझो। अर्थात् मर जाऊँगी' ॥२३॥
यह सुनकर चित्रलेखा सखी उषा को धैर्य देकर आकाश में उड़कर द्वारवती नगरी में
पहुँची ॥२४॥
उसने समुद्र के मध्य ऊँचे ऊँचे भवनों से शोभित द्वारकापुरी को देखा जो पर्वत-शिखरों
के समान ऊँचे भवनों से समुद्र-मन्थन करने के लिए पुनः समुद्र में फेंके हुए मन्दराचल के शिखर
का भ्रम उत्पन्न कर रही थी॥२५॥
उस चित्रकला ने वहाँ रात में शयन करते हुए अनिरुद्ध को जगाकर उसके प्रति स्वप्न
देखने से उत्पन्न हुए गाढ़े अनुराग का परिचय दिया ॥२६॥
उसी प्रकार के स्वप्न देखने से उद्विग्न अनिरुद्ध को लेकर वह योगेश्वरी चित्रलेखा
सिद्धि के प्रभाव से क्षण भर में बाण-नगरी में आ गई॥२७॥
वहाँ लाकर अनिरुद्ध को उसका रूप निहारती हुई उषा के भवन में युक्ति द्वारा पहुँचा
दिया॥२८॥
१ भागवत के अनुसार चित्रलेखा नींद अनिरुद्ध को योगबल से उड़ा ले गई थी।

७४ कथासरित्सागर

७४ कथासरित्सागर
पञ्चमस्तरङ्ग
कलिङ्गसेनायाः सोमप्रभायाश्च कथा (पूर्वानुवृत्ता)
ततोऽन्येद्युरुपेतां तां प्रातः सोमप्रभां सखीम्।
कलिङ्गसेना वियन्मातः कथां कुर्वत्युवाच सा॥१॥
मां प्रसेनजिते राज्ञे तातो दास्यति निश्चितम्।
एतच्चात्र मयाम्बातो दृष्टो वृद्धः स च त्वया॥२॥
वत्सेश्वरस्तु यथा रूपे त्वयैव कथितस्तथा।
श्रुतिमार्गप्रविष्टेन हृतं तेन मया मनः॥३॥
तत्प्रसेनजितं पूर्वं प्रदर्श्य नय तत्र माम्।
आस्ते वत्सेश्वरो यत्र किं तातेन किमम्बया॥४॥
एवमुक्तवतीं तां च सोक्ता सोमप्रभाब्रवीत्।
गन्तव्यं यदि तद्यामो यन्त्रेण व्योमगामिना॥५॥
किं तु सर्वं गृहाण त्वं निजं परिकरं यतः।
दृष्ट्वा वत्सेश्वरं भूयो नागन्तुमिह शक्ष्यसि॥६॥
न च त्वं द्रक्ष्यसि पुनः पितरौ न स्मरिष्यसि।
दूरस्थां प्राप्तदयिता विस्मरिष्यसि मामपि॥७॥
नह्येषमहमेष्यामि भर्तृवेश्मनि ते सखि।
तच्छ्रुत्वा राजकन्या सा रुदती तामभाषत॥८॥
तर्हि वत्सेश्वरं तं त्वमिहैवानय मे सखि।
नोत्सहे तत्र हि स्थातुं क्षणमक्क त्वया विना॥९॥
मानिन्ये चानिरुध्य किमपायाच्चित्रलेखया।
जानन्त्यपि तथा चेतो मतस्त्वं तत्कथां शृणु॥१०॥
बाणासुरस्य तनया बभूवोषेति विश्रुता।
तस्याश्चाराधिता गौरी पतिप्राप्त्यै वरं ददौ॥११॥
स्वप्ने प्राप्स्यसि यत्सङ्गं स ते भर्त्ता भवेदिति।
ततो देवकुमाराभं कञ्चित्स्वप्ने ददर्श सा॥१२॥
गान्धर्वविधिना तेन परिणीता तथैव च।
प्राप्ततत्सदृशसम्भोगा प्राबुध्यत निशाक्षये॥१३॥
अबुद्ध्वा सं पतिं दृष्टं दृष्ट्वा सम्भोगलक्षणम्।
स्मृत्वा गौरीवरं सामूत्सात्कुभयविस्मया॥१४॥

षष्ठ लम्बक ७०५

षष्ठ लम्बक ७०५
पञ्चम तरङ्ग
कलिङ्गसेना और सोमप्रभा की कथा (चालू)
तदनन्तर दूसरे दिन प्रातःकाल आई हुई सहेली सोमप्रभा से विश्वस्त बातें करती हुई
कलिङ्गसेना कहने लगी ॥१॥
मेरा पिता मुझे प्रसेनजित् को अवश्य दे देगा यह निश्चित है। यह मैंने अपनी माता से
सुना है और तूने उस वृद्ध प्रसेनजित् को देखा है ॥२॥
वत्सराज को तो रूप (सुन्दरता) में जैसा तूने वर्णित किया है कि उसने कानों के
मार्ग से प्रवेश करके मेरा हरण कर लिया है ॥३॥
इसलिए पहले मुझे प्रसेनजित् को दिखाओ। और, मुझे वहाँ भी ले चलो जहाँ
वत्सराज है। पिता से क्या प्रयोजन और माता से भी क्या करना है ॥४॥
इस प्रकार कहती हुई उत्कंठित कलिङ्गसेना को सोमप्रभा ने कहा—'यदि चलना है तो
यन्त्रचालित आकाशयान से चलें ॥५॥
किन्तु तुम अपने वस्त्र आभूषण और सबलों को साथ ले लो क्योंकि वत्सराज को
देखकर फिर तुम लौट न सकोगी ॥६॥
फिर तुम माता-पिता को न देखोगी और न उन्हें स्मरण ही करोगी अर्थात् सब भूल
जाओगी ॥७॥
और हे सखि न मैं ही तुम्हारे पति के घर आऊँगी'। यह सुनकर आँसू बहाती हुई राज-
कुमारी सखी से बोली ॥८॥
'मेरी प्यारी सखी यदि ऐसा है, तो तुम वत्सराज को ही यहाँ ले आओ। मैं तेरे बिना
यहाँ एक क्षण भी न ठहर सकूँगी ॥९॥
क्या चित्रलेखा ने उपाय करके अनिरुद्ध को उषा के पास नहीं ला दिया था ? इस कथा
को जानती हुई भी तुम मुझसे सुनो ॥१०॥
उषा और अनिरुद्ध की कथा
उषा के नाम से प्रसिद्ध बाणासुर की कन्या थी। उसने गौरी की आराधना की और
गौरी ने उसे पति-प्राप्ति का वरदान दिया ॥११॥
'कि स्वप्न में तुम जिसका संग प्राप्त करोगी वही तुम्हारा पति होगा' ॥१२॥
तब उसने एकबार देवकुमार के समान किसी को स्वप्न में देखा। गान्धर्व विधि से उसके
साथ विवाह आदि किया और प्रातःकाल उठी ॥१३॥
उठने पर स्वप्न में देखे हुए उस पति को न देखकर और सम्भोग के लक्षणों को देखकर
गौरी के वर को स्मरण करके वह आतंक और भय से व्याकुल हो गई ॥१४॥
८९

७६ कथासरित्सागर

७६ कथासरित्सागर
ताम्यन्ती च ततः सा तं स्वप्ने दृष्ट्वा प्रियं विना।
पृच्छन्त्यै चित्रलेखायै सख्यै सर्वं शशंस तत्॥१५॥
सापि नामाद्यभिज्ञानं न किञ्चित्तस्य जानती।
योगेश्वरी चित्रलेखा तामुपायममब्रवीत् ॥१६॥
सखि देवीवरस्यायं प्रभावोऽत्र किमुच्यते।
किं त्वभिज्ञानशून्यस्ते सोऽन्वेष्टव्यः प्रियः कथम्॥१७॥
परिजानासि चेत् ते ससुरासुरमानुषम्।
जगल्लिखामि तन्मध्यं तं मे दर्शय येन सः॥१८॥
आनीयते मयेत्युक्ता सा तथेत्युदिते तया।
चित्रलेखा क्रमाद् विश्वमलिखद् वर्णवर्तिभिः॥१९॥
तत्रोषा सोऽयमित्यस्या हृष्टाङ्गुल्या सकम्पया।
द्वारवत्यां यदुकुलादमिरुद्धमदर्शयत्॥२०॥
चित्रलेखा ततोऽवादीत् सखि धन्यासि यत्त्वया।
भर्त्तानिरुद्धः प्राप्तोऽयं पौत्री भगवतो हरेः॥२१॥
योजनानां सहस्रेषु षष्टौ वसति स त्वितः।
तच्छ्रुत्वा साधिकौत्सुक्यवशात्तामब्रवीदुषा॥२२॥
माद्य चेत्सरिस तस्याङ्गं अये श्रीखण्डशीतलम्।
तदत्युद्दामकामान्निर्दग्धां विद्धि मां मृताम्॥२३॥
श्रुत्वैतच्चित्रलेखा सा तामाश्वास्य प्रियां सखीम्।
तदैवोत्पत्य नभसा ययौ द्वारवतीं पुरीम्॥२४॥
ददर्श च पृथुशृङ्गेमन्दिरेरत्नमम्यगाम्।
कुर्वती त पुन क्षिप्यमन्त्राञ्चितित्तरभ्रमम्॥२५॥
तस्यां सुप्तं निशि प्राप्य सानिरुद्धं विबोध्य च।
उषाऽनुरागं त तस्मै शशंस स्वप्नदर्शनात् ॥२६॥
आदाय भारतरूपस्त्वप्नवृत्तान्तमेव सम्।
सोऽतं सिद्धिप्रभावेण क्षणेनैवाययौ ततः॥२७॥
एत्य चावेक्षमाणायास्तस्याः सख्याः सबर्मना।
प्रावेशयदुपायास्तं गुप्तमन्तःपुरं प्रियम्॥२८॥
१ स्वप्नन्तमेवानिरुद्धं समागमत् चित्रलेखेति ज्ञायते।

षष्ठ लम्बक ७७

षष्ठ लम्बक ७७
स्वप्न में देखे हुए पति को न पाकर व्याकुल हुई। इसीलिए पूछती हुई सखी से
चित्रलेखा ने और, सब समाचार कह दिया॥१५॥
योगेश्वरी चित्रलेखा भी उसके नाम-धाम आदि का परिचय न जानती हुई उषा को इस
प्रकार कहने लगी॥१६॥
'हे सखि यह देवी पार्वती के वर का प्रभाव है। इसमें क्या कहा जा सकता है। किन्तु
परिचय से रहित वह तेरा प्रियतम कैसे खोजा जा सकता है? ॥१७॥
'यदि तू उसे नहीं पहचानती है तो मैं संसार के सुन्दर देवताओं असुरों और मनुष्यों के
चित्र बनाती हूँ उनमें तू मुझे उसे पहचान कर दिखा ॥१८॥
'मैं उसे लाती हूँ।' ऐसा कहने पर चित्रलेखा ने क्रमशः रंग की कूँचियों से सभी सुन्दर
व्यक्तियों के चित्र लिखे॥१९॥
तब उषा ने काँपती हुई अँगुली से द्वारकापुरी के यदुवंशीय अनिरुद्ध को पहचान
कर दिखाया ॥२०॥
यह देखकर चित्रलेखा बोली—'सखि तू धन्य है, जो तूने भगवान् कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध
को अपना पति प्राप्त किया॥२१॥
वह यहाँ से साठ हजार योजन (२४ कोस) की दूरी पर है। यह सुनकर अधिक
उत्कण्ठा के वश होकर उषा बोली॥२२॥
'सखि यदि आज मैं उसकी चंदन के समान शीतल गोद में न बैठी तो अति प्रचंड कामाग्नि
से मुझे दग्ध समझो। अर्थात् मर जाऊँगी' ॥२३॥
यह सुनकर चित्रलेखा सखी उषा को धैर्य देकर आकाश में उड़कर द्वारावती नगरी में
पहुँची॥२४॥
उसने समुद्र के मध्य ऊँचे-ऊँचे भवनों से शोभित द्वारकापुरी को देखा जो पर्वत-शिखरों
के समान ऊँचे भवनों से समुद्र-मन्थन करने के लिए पुनः समुद्र में फेंके हुए मन्दराचल के शिखर
का भ्रम उत्पन्न कर रही थी॥२५॥
उस चित्रलेखा ने वहाँ रात में शयन करते हुए अनिरुद्ध को जगाकर, उसके प्रति स्वप्न
देखने से उत्पन्न हुए गाढ़े अनुराग का परिचय दिया ॥२६॥
उसी प्रकार के स्वप्न देखने में उत्कण्ठित अनिरुद्ध को लेकर वह योगेश्वरी चित्रलेखा
सिद्धि के प्रभाव से रात भर में बाण-नगरी में आ गई॥२७॥
यहाँ लाकर अनिरुद्ध को उसका पथ निहारती हुई उषा के महल में युक्ति द्वारा पहुँचा
दिया॥२८॥
१ भागवत के अनुसार चित्रलेखा सोये अनिरुद्ध को शोणस्तन से उड़ा ले गई थी।

७८ कथासरित्सागर

७८ कथासरित्सागर

सा दृष्ट्वैवानिरुद्धं समुपा साक्षादुपागतम्।
अमृतांशुमिवाम्भोधिबेला नाङ्गेष्ववर्तत ॥२९॥
ततस्तेन समं तस्यौ सखीवत्तेन तत्र सा।
जीवितेनेव मूर्तेन वल्लमेन यमासुखम् ॥३०॥
सम्मानात् पितर चास्याः शुद्ध बाणं जिगाय सः।
अनिरुद्धः स्ववीर्येण पितामहबलेन च ॥३१॥
ततो द्वारवतीं गत्वा तावभिनन्दतू उभौ।
उषानिरुद्धौ भ्राजते गिरिजाशङ्कराविव ॥३२॥
इत्युपायाः प्रियोऽङ्गेव मेलितश्चित्रलेखया।
त्वं सप्रभाबाप्यधिका ततोऽपि सखि मे मता ॥३३॥
तममानय वत्सैशमिह मास्म चिरं कृथाः।
एव कलिङ्गसेनातः श्रुत्वा सोमप्रभाब्रवीत् ॥३४॥
चित्रलेखा सुरस्त्री सा समत्क्षिप्यानयत्परम्।
मानुषी किं विदध्यात् परस्परधि कुर्वती ॥३५॥
सत्वं नयामि तत्रैव यत्र वत्सेश्वरः सस्ति।
प्राप्तप्रसेनजित तं से दर्शयित्वा त्वदर्शिनम् ॥३६॥
इति सोमप्रभोक्ता सा तथेत्युक्त्वा तया सह।

कलिङ्गसेनाया कौशाम्बीयात्रा

कलिङ्गसेना सस्कृप्तं मायायन्त्रविमानकम् ॥३७॥
तदेवारुह्य नमसा सकोपा सपरिच्छदा।
हृतप्रास्थामिका प्रायात् पित्रोरविदिता ततः ॥३८॥
न हि पश्यति तुङ्गं वा दवभ्रं वा स्त्रीजनोऽग्रतः।
स्मरेण नीतः परमां धारां वाजीव सादिना ॥३९॥
श्रावस्तीं प्राप्य पूर्वं च तं प्रसनजित नृपम्।
मृगयानिर्गतं दूराज्जरा पाण्ड ददर्श सा ॥४०॥
श्वाद् व्रजास्मादिति तां दूरादिव निषेधतः।
उडूयमानेन मुहुश्चामरेणोपलक्षिताम् ॥४१॥
सोऽयं प्रसनजिद्राजा पित्रास्मै स्वां प्रदिसिता।
पश्येति सामप्रभया दर्शितं सोपहामया ॥४२॥

उषा साक्षात् आते हुए अनिरुद्ध को देखकर इस प्रकार अपने अंगों से बाहर हो गई
जिस प्रकार चन्द्र-दर्शन से समुद्र की बेला अपनी सीमा से बाहर हो जाती है ॥२९॥
तदनन्तर उषा मन्त्री द्वारा दिये गये मूर्तिमान् जीवन के समान उस प्राणप्यारे अनिरुद्ध
के साथ सुखपूर्वक रहने लगी ॥३०॥
इस बात को जानकर वृद्ध बाणासुर को अनिरुद्ध ने अपने तथा अपने पितामह श्रीकृष्ण
के बल से जीत लिया ॥३१॥
तदनन्तर अभिप्रेतशरीर ये दोनों द्वारकापुरी में जाकर पार्वती और शंकर के समान
प्रसिद्ध हुए ॥३२॥
इस प्रकार उषा को सखी चित्रलेखा ने शीघ्र ही उसके प्रियतम से उसे मिला दिया था।
हे सखि मैं तुम्हें चित्रलेखा से भी अधिक प्रभावशालिनी समझती हूँ ॥३३॥
इसलिए उस वत्सराज को यहाँ ले आओ। विलम्ब न करो। कलिङ्गसेना से ऐसा सुन
कर सोमप्रभा बोली—॥३४॥
'वह चित्रलेखा देवस्त्री थी इसलिए दूसरे पुरुष को उठा लाई किन्तु पर-पुरुष का स्पर्श
भी न करनेवाली मैं यह कार्य कैसे कर सकती हूँ ॥३५॥
इसलिए तुझे ही वहाँ ले जाती हूँ जहाँ वत्सराज है। उससे पहले मैं तुम्हें माँगनेवाले
प्रसेनजित् को भी दिखा दूँगी' ॥३६॥
कलिङ्गसेना की कौशाम्बी-यात्रा
इस प्रकार सोमप्रभा से कही गई कलिङ्गसेना उसकी बात को मानकर उसके साथ माया-
यन्त्र-चालित आकाशयान से अपने सामान और अंतरंग सेवकों के साथ माता-पिता से छिपकर
चली गई ॥३७-३८॥
सच है कामदेव द्वारा वेगवती धारा में पहुँचाई गई स्त्रियाँ ऊँचा-नीचा नहीं देखतीं
जिस प्रकार सरपट चाल से चलते हुए घोड़े का सारथी ऊँचा-नीचा नहीं देख पाता ॥३९॥
पहले श्रावस्ती नगरी में पहुँचकर शिकार के लिए निकले हुए और वृद्धावस्था से पीले
पड़े हुए प्रसेनजित् को उसने दूर से ही देखा ॥४०॥
उस राजा के दोनों ओर डुलाये जाते हुए चँवर, मानों सोमप्रभा को 'इस वृद्ध से दूर
रहो'—इस प्रकार कहकर दूर से ही निषेध कर रहे थे ॥४१॥
हँसती हुई सोमप्रभा ने कलिङ्गसेना से उस राजा को दिखाते हुए कहा—'देखो यही
वह वृद्ध प्रसेनजित् राजा है। जिसे तुम्हारा पिता तुम्हें दे रहा है ॥४२॥

जरयाय वृतो राजा का वृणीतेऽपरा त्वमुम्।
तदितः सखि शीघ्रं मां नय वत्सेश्वरं प्रति ॥४३॥
इति सोमप्रभां प्रोक्त्वा तत्क्षण सा तया सह।
कलिङ्गसेना व्योम्नैव कौशाम्बी नगरीं ययौ ॥४४॥
तत्रोद्यानगत सा तं वत्सेशं सख्युदीरितम्।
ददर्श दूरात् सोत्कण्ठा चकोरीवामृतत्विषम् ॥४५॥
सा तद्वुत्फुल्लया दृष्ट्या दृश्यस्तेन च पाणिना।
प्रविष्णोऽथ पथानेन मामत्रेत्यब्रवीदिव ॥४६॥
सखि सङ्गमयाद्यैव वत्सराजेन मामिह।
एनं विलोक्य हि स्थातुं न शक्ता क्षणमप्यहम् ॥४७॥
इति चोक्तवतीं सा या सखी सोमप्रभाब्रवीत्।
अद्याशुभं मया किञ्चिन्निमित्तमुपलक्षितम् ॥४८॥
तदिदं दिवस तूष्णीमुद्यानेऽस्मिन्नलक्षिता।
अधितिष्ठस्व मा कार्षी सखि दूरं गतागतम् ॥४९॥
प्रातरागत्य युक्तिं वा घटयिष्यामि सङ्गमे।
अधुना गन्तुमिच्छामि भर्तुश्चित्तगृहे गृहम् ॥५०॥
इत्युक्त्वा तामवस्थाप्य ययौ सोमप्रभा ततः।
वत्सराजोऽपि चोद्यानात् स्वमन्दिरमवाविशत ॥५१॥
ततः कलिङ्गसेना सा तत्रस्था स्वमहत्तरम्।
यथा सर्वं स्वसन्देशं गत्वा वत्सेश्वरं प्रति ॥५२॥
प्राहिणोल्लाङ्घिनिपिच्छापि स्वसख्या शकुनज्ञया।
स्वतन्त्रार्थमनवाञ्छो युवतीनां मनोरमः ॥५३॥
स च गत्वा प्रतीहारमुखेनावद्य तत्क्षणम्।
महत्तर प्रविष्टोऽथ वत्सराजं व्यजिज्ञपत् ॥५४॥
राजन्नस्ति नृदस्तस्य रागस्तत्प्रणिधापने।
सुता कलिङ्गसेनाख्या श्रुत्वा स्वां रूपसम्पदम् ॥५५॥
स्वयंवरार्थमिह ते सम्प्राप्ता त्यक्तबान्धवा।
मायायन्त्रविमानेन सानुगा व्योमगामिना ॥५६॥
आनीता गन्धचारिण्या सख्या सोमप्रभाह्वया।
मद्यामुद्यानलग्ना न लङ्घयेदथार्यया ॥५७॥
तया विज्ञापनायाः प्रेषितः स्वीकुरुष्व ताम्।
युवयोरस्तु यागार्थं कौमुदीवन्यायिव ॥५८॥

षष्ठ लम्बक ७११
'यह राजा जराक्रान्त (बुढ़ावस्था से घिरा हुआ) है। अब इसे कौन दूसरी स्त्री वरेगी ?
इसलिए सखि मुझे यहाँ से शीघ्र वत्सराज की ओर ले चल' ॥४३॥
सोमप्रभा से इस प्रकार कहकर कलिङ्गसेना उसी समय कौशाम्बी नगरी को गई ॥४४॥
वहाँ पर उद्यान में बैठे हुए और सोमप्रभा द्वारा दिखाये गये वत्सराज को उसने ऐसे देखा
जैसे चकोरी चन्द्रमा को देखती है ॥४५॥
कलिङ्गसेना खिली हुई आँखों से उसे देखती हुई हृदय पर हाथ रखकर मानों यह कहने
लगी कि 'यह आँखों के मार्ग से यहाँ कैसे घुस गया है ?' ॥४६॥
'यदि आज ही तू मुझे इससे मिला दे। मैं इसे देखकर अब एक क्षण भी नहीं ठहर
सकती' ॥४७॥
कलिङ्गसेना के ऐसा कहने पर सोमप्रभा बोली- आज मैंने कुछ अशुभसूचक शकुन
देखा है ॥४८॥
इसलिए आज के दिन तुम इस उद्यान में छिप कर रहो। अति दूर तक जाना-आना न
करना। एक ही स्थान पर चुपचाप बैठी रहो ॥४९॥
प्रातःकाल आकर तुम दोनों को मिलाने का कोई उपाय करूंगी। अपने स्वामी के हृदय
की घर में बनी हुई है सखी ! मैं तो अभी अपना घर जाना चाहती हूँ ॥५०॥
ऐसा कहकर और उसे उद्यान के एकान्त स्थान में ठहराकर सोमप्रभा चली गई।
और वत्सराज भी उद्यान से भवन को चला गया ॥५१॥
तब शकुन जाननेवाली सखी सोमप्रभा से रोके जाने पर भी कलिङ्गसेना ने अपने प्रतीहार
को वास्तविक बातें बताकर वत्सराज के पास सन्देश देकर भेजा और निवेदन किया—॥५२-५४॥
हे राजन् ! तक्षशिला के राजा कलिङ्गदत्त की कन्या कलिङ्गसेना तुम्हें अत्यधिक
सुन्दर समझकर अपने बन्धु-बान्धवों को छोड़कर, यन्त्रचालित विमान से अपने अनुचरों के साथ
तुम्हारा स्वयं वरण करने के लिए आई है। उसे मयासुर की आकाशचारिणी कन्या और नल-
कूबर की स्त्री सोमप्रभा ने यहाँ पहुँचाया है। उस राजकुमारी ने मुझे आपसे यह निवेदन करने।
के लिए भेजा है कि आप उसे स्वीकार करें। चन्द्र और चन्द्रिका के समान तुम दोनों का सुन्दर
समागम हो' ॥५५-५८॥

४१२ कथासरित्सागर

४१२ कथासरित्सागर
एव महत्तराच्छ्रुत्वा तं सद्येत्यभिनन्द्य च।
प्रहृष्टो हेमवस्त्राद्यैर्वत्सराजोऽभ्यपूजयत् ॥५९॥
आहूय चाब्रवीन्मित्रमुख्यं यौगन्धरायणम्।
राज्ञः कलिङ्गदत्तस्य ख्यातरूपा क्षितौ सता ॥६०॥
स्वयं कलिङ्गसेनाख्या वरणाय ममागता।
तद्ब्रूहि शीघ्रमत्यन्त्यां कदा परिणयामि ताम् ॥६१॥
महामन्त्रिणो यौगन्धरायणस्य कूटनीतिचक्रम्
इत्युक्तो वत्सराजेन मन्त्री यौगन्धरायणः।
अस्यायतिहितापेक्षी क्षणमेवमचिन्तयत् ॥६२॥
कलिङ्गसेना या तावत्ख्यातरूपा जगत्त्रये।
नास्त्यन्या तादृशी तस्यै स्पृहयन्ति सुरा अपि ॥६३॥
तां लब्ध्वा वत्सराजोऽयं सर्वमन्यत्परित्यजेत्।
देवी वासवदत्ता च ततः प्राणैर्वियुज्यते ॥६४॥
नरवाहनदत्तोऽपि नश्येद्राजसुतस्ततः।
पद्मावत्यपि तत्स्नेहाद्देवी जीवति दुष्करम् ॥६५॥
ततश्चण्डमहासेनप्रद्योतौ पितरौ द्वयोः।
देव्योर्विमुञ्चत प्राणात् विकृतिं वापि गच्छतः ॥६६॥
एवं च सर्वनाशः स्यान्न च युक्तं निषेधनम्।
राज्ञोऽस्य व्यसनं यस्माद् वारितस्याधिकीभवेत् ॥६७॥
तस्मान्नुप्रवेशस्य सिद्धयै कालं हराम्यहम्।
इत्यालोच्य स वत्सेशं प्राह यौगन्धरायणः ॥६८॥
देव धन्योऽसि यस्यैषा स्वयं ते गृहमागता।
कलिङ्गसेना भृत्यत्वं प्राप्तश्चतत्पिता नृपः ॥६९॥
तत्ख्या गणकान् पृष्ट्वा सुलग्नेऽस्या यथाविधि।
कार्यः पाणिग्रहो राज्ञो बृहतो दुहिता ह्यसौ ॥७०॥
अद्यास्या दीयतां साधुयोग्यं वासगृहं पृथक्।
दासीदासा विमृग्यन्तां वस्त्राण्याभरणानि च ॥७१॥
इत्युक्तो मन्त्रिममुख्येन वत्सराजस्तथेति तत्।
प्रहृष्टहृदयः सर्व्वं सविदार्य्य चकार सः ॥७२॥

पष्ठ लम्बक ११०

पष्ठ लम्बक ११०
मन्त्रिसेना व प्रतीहार से घिर गुप्तचर और अपना मन्त्रणागृह बनाकर मन्त्रणा करने
लगा और शकुन्त कन्याहरण आदि आख्यान से उसका समाधान-सत्कार किया ॥ ६६ ॥
और मन्त्री यौगन्धरायण को समझाकर कहा—'पृथ्वी में अपनी सुन्दरता से जिन
अत्यन्त प्रसिद्ध कन्याओं का कवियों द्वारा गायन किया गया है। मेरा स्मरण करने के लिए
उनमें से तुम (एक) उत्तम कन्या खोजकर (मुझे) लाओ जिससे मैं उसका परिणय करूँ ।' ॥ ६७ ॥
॥ ६७ ॥ इति
यौगन्धरायण का राजनैतिक षड्यन्त्र
राजा से इस प्रकार कहा गया यौगन्धरायण राजा के भावी कल्याण की चिन्ता करता
हुआ अपने घर के लिए प्रस्थान लगा—॥ ६८ ॥
सिंहवर्मन् की पुत्री पद्मावती का समाचार पाकर वह (मन्त्री यौगन्धरायण) विचारने
लगा—'इस समय इस विषय में केवल यह (पद्मावती) ही विचारणीय है। उन दोनों की अत्यन्त मैत्री है॥ ६९ ॥'
...

७१४ कथासरित्सागर

७१४ कथासरित्सागर
कलिङ्गसेना च ततः प्रविश्या वासवेश्म तत्।
स्वमनोरथमासन्नं मत्वा प्राप परां मुदम् ॥७३॥
यौगन्धरायणः सोऽपि क्षणाद्राजकुलात्ततः।
निर्गत्य स्वगृहं गत्वा धीमानेवमचिन्तयत् ॥७४॥
प्रायोऽशुभस्य कार्यस्य कालद्वारः प्रतिक्रिया।
तथा च वृत्रशत्रौ प्राग्ब्रह्महत्यापलायिते ॥७५॥
देवराज्यमवाप्तेन नहुषेणामियाचिता।
रक्षिता देव गुरुणा शची शरणमार्थिता ॥७६॥
अद्य प्राप्स्यति त्वामित्युक्त्वा कालहारतः।
यावत्स भ्रष्टो नहुषो हुङ्काराद् ब्रह्मणापतत् ॥७७॥
प्राप्तश्च पूर्ववच्छक्रः स पुनर्वैराजताम्।
एवं कलिङ्गसेनार्थे कालः क्षेप्यो मया प्रभोः ॥७८॥
इति सञ्चिन्त्य सर्वेषां गणकानां स सन्विदम्।
दूरलग्नप्रदानाय मन्त्री गुप्तं व्यघातयत् ॥७९॥
अथ विज्ञाय वृत्तान्तं देव्या वासवदत्तया।
आहूय स महामन्त्री स्वमन्दिरमनीयत ॥८०॥
तत्र प्रविष्टं प्रणतं रुदती सा जगाद तम्।
आर्य! पूर्वं त्वयोक्तं मे यथा देवि मयि स्थिते ॥८१॥
पद्मावत्या ऋते मान्या सपत्नी ते भविष्यति।
कलिङ्गसेनाप्यथैषा पश्येह परिणेष्यते ॥८२॥
सा च रूपवती तस्यामार्यपुत्रश्च रज्यति।
अतो वितथवादी त्वं जातोऽहं च मृताधुना ॥८३॥
तच्छ्रुत्वा तामवोचत्स मन्त्री यौगन्धरायणः।
धीरा भव क्व ह्येतद्देवि स्यान्मम जीवतः ॥८४॥
त्वया तु नात्र कर्तव्या राज्ञोऽस्य प्रतिकूलता।
प्रत्युतावलम्ब्य धीरत्वं दर्शनीयानुकूलता ॥८५॥
नातुष्टः प्रतिकूलोक्तैर्वशो वैद्यस्य वर्तते।
वर्तते स्वनुकूलोक्तौ साम्नैवाचरतः क्रियाम् ॥८६॥
प्रतीपं कृष्यमाणो हि नोत्तरेदुत्तरोत्तरः।
वाह्यमानोऽनुकूलस्तु नोद्योगान् व्यसनात्तथा ॥८७॥
अतः समीपमायान्तं राजानं त्वमविक्रिया।
उपचारैरुपचरेः संवृत्याकारमात्मनः ॥८८॥

षष्ठ लम्बक ७१५

षष्ठ लम्बक ७१५
कलिङ्गसेना भी नये बाह्य भवन में जाकर अपना मनोरथ सिद्ध समझकर अत्यन्त प्रसन्न
हुई॥७३॥
बुद्धिमान् यौगन्धरायण भी राजभवन से तुरन्त अपने घर जाकर इस प्रकार सोचने
लगा। समय व्यतीत करना ही अधुना कार्य का प्रतिकार है। पहले समय में ब्रह्महत्या के भय
से इन्द्र के भाग जाने पर देवराज्य प्राप्त करके नहुष राजा ने इन्द्राणी को प्राप्त करना चाहा था।
तब देवगुरु बृहस्पति ने शरण में आई हुई इन्द्राणी की यही कहकर नहुष से रक्षा की थी कि
'आज आवेगी कल आवेगी'। इसी बीच राजा नहुष ब्राह्मणों के शाप से नष्ट हो गया और इन्द्र
पुनः देवराज बन गया। इसी प्रकार मुझे भी कलिङ्गसेना के लिए राजा का समय टालते रहना
चाहिए ॥७४-७८॥
ऐसा सोचकर सभी पण्डितों से सम्मति करके उसने एक लम्बी अवधि के पश्चात् लग्न
निर्धारणने का गुप्त परामर्श किया ॥७९॥
तदनन्तर महारानी वासवदत्ता ने आई हुई कलिङ्गसेना का समाचार जानकर मन्त्री
यौगन्धरायण को अपने भवन में बुलवाया ॥८०॥
वासवदत्ता के घर में जाकर और प्रणाम करते हुए यौगन्धरायण से रोती हुई वासवदत्ता
कहने लगी—'आर्य तुमने पहले ही मुझसे कहा था कि देवि मेरे रहते हुए पद्मावती के सिवा
दूसरी सौत तुम्हारी नहीं होगी। अब देखो यह कलिङ्गसेना भी आज विवाहित हो जायगी।
यह अत्यन्त रूपवती है और राजा उसके प्रति अत्यन्त आसक्त हैं। अतः तुम अब झूठे बन और
मैं मरी अर्थात् आत्महत्या करूँगी' ॥८१-८३॥
यह सुनकर मन्त्री यौगन्धरायण वासवदत्ता से कहने लगा—'देवि धैर्य रखो। मेरे जीने
भी यह कैसे हो सकता है? किन्तु तुम्हें इस सम्बन्ध में राजा का विरोध न करना चाहिए। प्रत्युत
धैर्य के साथ अनुकूलता ही प्रकट करनी चाहिए ॥८४-८५॥
प्रतिकूल चलने से रोगी वैद्य के वश में नहीं आता। शान्तिपूर्वक रोगी की अनुकूल
चिकित्सा करने पर ही वह उसके वश में आता है ॥८६॥
मनुष्य विपरीत क्रिया द्वारा अपने उद्योग या व्यसन से दूर नहीं होता। इसलिए
पास आये हुए राजा को तुम सरल भाव से अपनी भावना को छिपाकर विविध प्रकार से सेवा
करना ॥८७-८८॥

७१६ कथासरित्सागर

७१६ कथासरित्सागर
कलिङ्गसेनास्वीकारं श्रद्दध्यात्तस्य साम्प्रतम्।
ब्रूहि मुग्धाणा राज्यस्य महाये तत्पितर्यपि ॥८९॥
एवं कृते च माहात्म्यगुणं दृष्ट्वा परं तव।
प्रवृद्धस्नेहदाक्षिण्यो राजासौ भवति त्वयि ॥९०॥
मत्वा कलिङ्गसेनां च स्वाधीनां नोत्सुको भवेत्।
वार्यमाणस्य वाञ्छा हि विषयेष्वभिवर्धते ॥९१॥
देवी पद्मावती चैतच्छिक्षणीया स्वयानघे।
एवं स राजा कार्येऽस्मिन्कालक्षेपं सहेत न ॥९२॥
अतः परं च जानेऽहं पदयेयुक्तिरुत्तरम्।
सङ्कटे हि परीक्ष्यन्ते प्राज्ञा शूराश्च सङ्गरे ॥९३॥
तद्देवि मा विषण्णा भूरिति देवीं प्रबोध्य ताम्।
तथादृतोक्तिः स ययौ ततो यौगन्धरायणः ॥९४॥
वत्सेश्वरश्च तदहर्न दिवा न रात्रौ
देव्योर्द्वयोरपि स वासगृहं जगाम।
तादृक्स्वयंवररसापनमत्कलिङ्ग-
सेनासमाननवसंगमसोत्सुचेताः ॥९५॥
रात्रिं च दुर्लभरसोत्सुकतातिगाढ-
चिन्तामहोत्सवमयीमिव तां ततस्ते।
निन्युः स्वसद्मसु पृथक्पृथगेव देवी
वत्सेशतत्सचिवमुख्यकलिङ्गसेनाः ॥९६॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे मदनमञ्चुका लम्बके
पञ्चमस्तरङ्गः।
षष्ठस्तरङ्गः
कलिङ्गसेनायाः कथा
यौगन्धरायणस्य कूटनीतिप्रपञ्चः
ततः प्रतीक्षमाणं तं वत्सराजमुपेत्य सः।
यौगन्धरायणो धूर्तः प्रातर्मन्त्री व्यजिज्ञपत् ॥१॥
'भगवन् कलिङ्गसेनाया देव्यस्य च शुभावहम्।
विवाह मङ्गलायेह किं नाद्यैव विलोक्यते ॥२॥
१ प्राचीनपुस्तकेऽस्माच्छ्लोकात्पूर्वं राजन् ! कलिङ्गदत्तस्य राज्ञस्तत्कलिकालतो
इत्यधिकः पाठः समुपलभ्यते।

षष्ठ लम्बक ७१७

षष्ठ लम्बक ७१७
इस समय कलिङ्गसेना की स्वीकृति को भी सादर मान लेना। यह भी कहना कि उसके
पिता कलिङ्गरत राजा की सहायता से राज्य की वृद्धि ही होगी ॥८९॥
ऐसा करने पर तुम्हारे हृदय की उदारता और महत्ता से बढ़ हुए स्नेहवाला राजा तुम्हारी
ओर आ जायगा ॥९०॥
और कलिङ्गसेना को स्वाधीन (स्वतन्त्र) समझकर उसके प्रति वह उत्सुक न होगा।
विषयों से रोके जाते हुए व्यक्ति की इच्छा विषयों की ओर ही अधिक दौड़ती है ॥९१॥
रानी पद्मावती को भी इसी प्रकार, शिक्षा देना। इस प्रकार, तुम लोगों से सँभाला हुआ
राजा हमारे द्वारा किये जाते हुए विलम्ब को सहन कर लेगा ॥९२॥
इससे अधिक मैं नहीं जानता। अब मेरी बुद्धि का बल देखो। सङ्कट-काल में बुद्धिमान्
और युद्ध-काल में शूरवीर की परीक्षा होती है ॥९३॥
इसलिए हे देवि खिन्न न होओ। इस प्रकार, रानी को समझाकर और अपनी बातों का
समर्थन प्राप्त कर यौगन्धरायण चला गया ॥९४॥
स्वयंवर के रस से अभिभूत होकर बालवाली ऐसी कलिङ्गसेना के प्रथम समागम के लिए
उत्कण्ठित चित्तवाला वत्सराज उस दिन न दिन में और न रात में ही किसी भी रानी के भवन में
गया ॥९५॥
और उधर, कलिङ्गसेना ने भी यह रात दुर्लभ रस प्राप्त करने की उत्सुकता गम्भीर
चिन्ता और महोत्सव के स्मरण में व्यतीत की ॥९६॥
पंचम तरङ्ग समाप्त
षष्ठ तरंग
कलिङ्गसेना की कथा (चालू)
मन्त्री यौगन्धरायण का कूटनीति-प्रपञ्च
तदनन्तर, दूसरे दिन प्रातःकाल प्रतीक्षा करते हुए वत्सराज से धूर्त (चतुर) मन्त्री
यौगन्धरायण ने जाकर निवेदन किया—'महाराज आपके लिए कल्याणदायक कलिङ्गसेना का
विवाह-महोत्सव आज ही क्यों न देख लिया जाय' ॥१ २॥

७१८ कथासरित्सागर

७१८ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीद्राजा ममाप्येवं हृदि स्थितम् ।
तां बिना हि मुहूर्तं मे स्थातुं न सहते मनः ॥३॥
इत्युक्त्वैव स तत्कालं प्रतीहारं पुरःस्थितम् ।
आदिश्यानाययामास गणकान् सरलाक्षयः ॥४॥
तेन पृष्टा महामन्त्रिपूर्वस्थापितसंविदः ।
ऊचुर्लग्नोऽनुकूलोऽस्ति राज्ञो मासेषु षट्स्वितः ॥५॥
तच्छ्रुत्वैव मृषा कोपं कृत्वा यौगन्धरायणः ।
अज्ञा इमे धिगित्युक्त्वा राजानं निपुणोऽब्रवीत् ॥६॥
योऽसौ ज्ञानीति देवेन पूजितो गणकः पुरा ।
स नागतोऽद्य तं पृष्ट्वा यथायुक्तं विधीयताम् ॥७॥
एतन्मन्त्रिवचः श्रुत्वा वत्सेशो गणकं तदा ।
तमप्यानाययामास दोलारूढेन चेतसा ॥८॥
सोऽप्यस्य कालहाराय स्थितसंवित्तथैव तम् ।
लग्नं पृष्टोऽब्रवीद्ध्यात्वा षण्मासान्ते व्यवस्थितम् ॥९॥
ततो राजानमद्विग्न इव यौगन्धरायणः ।
जगाद देव कर्तव्यं किमत्राविधीयतामिति ॥१०॥
राजाप्युक्तः सुरुग्नेयी स विमृश्य ततोऽभ्यधात् ।
कलिङ्गसेना प्रष्टव्या सा त्रिमाहेत्यवेक्ष्यताम् ॥११॥
सञ्छ्र्त्वा स तथेत्युक्त्वा गृहीत्वा गणकद्वयम् ।
पार्श्वं कलिङ्गसेनाया ययौ यौगन्धरायणः ॥१२॥
तया कृतादरो दृष्ट्वा तद्रूपं स व्यचिन्तयत् ।
प्राप्येमां व्यसनाद्राजा सर्वं राज्यं त्यजेदिति ॥१३॥
उवाच चैनामुद्वाहलग्नं ते गणकैः सह ।
निर्द्धातुमागतोऽस्म्येतैस्त्वं मद्य तन्निषेव्यताम् ॥१४॥
तच्छ्रुत्वा जन्मऋक्षं तस्याः परिजनोदितम् ।
गणकास्ते मृषा कृत्वा विचारं मन्त्रिसंविदा ॥१५॥
लग्नं तमेव तत्रापि मासषट्कान्तवर्त्तिनम् ।
नातीतः पुरोऽस्तीति वदन्तः पुनरभ्यधुः ॥१६॥