कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ७११
'यह राजा जराक्रान्त (बुढ़ावस्था से घिरा हुआ) है। अब इसे कौन दूसरी स्त्री वरेगी ?
इसलिए सखि मुझे यहाँ से शीघ्र वत्सराज की ओर ले चल' ॥४३॥
सोमप्रभा से इस प्रकार कहकर कलिङ्गसेना उसी समय कौशाम्बी नगरी को गई ॥४४॥
वहाँ पर उद्यान में बैठे हुए और सोमप्रभा द्वारा दिखाये गये वत्सराज को उसने ऐसे देखा
जैसे चकोरी चन्द्रमा को देखती है ॥४५॥
कलिङ्गसेना खिली हुई आँखों से उसे देखती हुई हृदय पर हाथ रखकर मानों यह कहने
लगी कि 'यह आँखों के मार्ग से यहाँ कैसे घुस गया है ?' ॥४६॥
'यदि आज ही तू मुझे इससे मिला दे। मैं इसे देखकर अब एक क्षण भी नहीं ठहर
सकती' ॥४७॥
कलिङ्गसेना के ऐसा कहने पर सोमप्रभा बोली- आज मैंने कुछ अशुभसूचक शकुन
देखा है ॥४८॥
इसलिए आज के दिन तुम इस उद्यान में छिप कर रहो। अति दूर तक जाना-आना न
करना। एक ही स्थान पर चुपचाप बैठी रहो ॥४९॥
प्रातःकाल आकर तुम दोनों को मिलाने का कोई उपाय करूंगी। अपने स्वामी के हृदय
की घर में बनी हुई है सखी ! मैं तो अभी अपना घर जाना चाहती हूँ ॥५०॥
ऐसा कहकर और उसे उद्यान के एकान्त स्थान में ठहराकर सोमप्रभा चली गई।
और वत्सराज भी उद्यान से भवन को चला गया ॥५१॥
तब शकुन जाननेवाली सखी सोमप्रभा से रोके जाने पर भी कलिङ्गसेना ने अपने प्रतीहार
को वास्तविक बातें बताकर वत्सराज के पास सन्देश देकर भेजा और निवेदन किया—॥५२-५४॥
हे राजन् ! तक्षशिला के राजा कलिङ्गदत्त की कन्या कलिङ्गसेना तुम्हें अत्यधिक
सुन्दर समझकर अपने बन्धु-बान्धवों को छोड़कर, यन्त्रचालित विमान से अपने अनुचरों के साथ
तुम्हारा स्वयं वरण करने के लिए आई है। उसे मयासुर की आकाशचारिणी कन्या और नल-
कूबर की स्त्री सोमप्रभा ने यहाँ पहुँचाया है। उस राजकुमारी ने मुझे आपसे यह निवेदन करने।
के लिए भेजा है कि आप उसे स्वीकार करें। चन्द्र और चन्द्रिका के समान तुम दोनों का सुन्दर
समागम हो' ॥५५-५८॥