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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

६९४ कथासरित्सागर

६९४ कथासरित्सागर

तेन स्वाकृतिना दैवात् सङ्गतिं वाञ्छति स्म सा।
स्वाभिप्रायं च सन्दिश्य तस्मै स्वां व्यसृजत्सखीम् ॥७४॥
सा गत्वा तत्सखी तस्य पुंसः साहसरङ्गिनः।
अनिच्छतोऽपि प्रार्थ्यैव यत्नात् सङ्केतकं व्यधात् ॥७५॥
एतद्देवगृहं भद्र विविक्तं पश्यसीह यत्।
अत्र रात्रौ प्रतीक्षेथा राजपुत्र्यास्तवागमम् ॥७६॥
इत्युक्त्वा सा तमामन्त्र्य गत्वा तस्मै तदभ्यधात्।
तेजस्वत्यै ततः सापि तस्थौ सूर्यावलोकिनी ॥७७॥
पुमांश्च सोऽनुमान्यापि भयाद्यत्नात्पलाय्येतः ययौ।
न भेकः पद्मिनीकिञ्जल्कास्वादकोविदः ॥७८॥
अत्रान्तरे च कोऽप्यात्र राजपुत्रः कुलोद्गतः।
मृते पितरि तन्मित्रं राजानं द्रष्टुमाययौ ॥७९॥
स चात्र सायं सम्प्राप्तः सोमदत्ताभिधो युवा।
दायादहृतराज्यादिरेकाकी कान्तदर्शनः ॥८०॥
विवेश दैवात्तमेव नेतुं देवकुले निशाम्।
राजपुत्र्याः सखी यत्र पुंसः सङ्केतमादिशत् ॥८१॥
तं तत्र स्थितमभ्येत्य राजपुत्र्यविभाव्य सा।
निशायामनुरागाच्च स्वयंवरपतिं व्यधात् ॥८२॥
सोऽप्यभ्यनन्दत् तूष्णीं तां प्राप्तो विधिसमर्पिताम्।
संसूचयन्तीं भाविन्या राजलक्ष्म्याः समागमम् ॥८३॥
ततः क्षणाद्राजसुता सा विलोक्यैवमेव तम्।
कमनीयतमं मेने धातारमानुकूल्यितम् ॥८४॥
अनन्तरं कथां कृत्वा यथास्वं संविदा तयोः।
एषा स्वमन्दिरमगादन्यस्तत्रानयन्निशाम् ॥८५॥
प्रातर्गत्वा प्रतीहारमुखेनावेद्य नाम च।
राजपुत्रः परिज्ञातो राज्ञः प्राविशदन्तिकम् ॥८६॥
तत्रोत्सराज्याहारादिदुर्गतस्य स कुलाङ्कुरः।
अङ्गीचक्रे सहायत्वं राजा तस्यारिमर्दने ॥८७॥
मतिं चक्रे च तां तस्मै दातुं प्राणशिरोमणिं सुताम्।
मन्त्रिभ्यश्च तज्ज्ञेभ्योऽभिप्रायं शशंस सः ॥८८॥
अथैतन्मै च राज्ञे तं सुतावृत्तान्तमभ्यधात्।
दत्ता स्वाद्यापिता पूर्वं सर्वैराजसमीयुषा ॥८९॥

षष्ठ लम्बक १९५

षष्ठ लम्बक १९५
दैवयोग से वह उसके साथ अपने रूप की संगति चाहने लगी अर्थात् उस पर
अनुरक्त हो गई। तदनन्तर उसने अपने मनोभाव को सन्देश रूप में सखी द्वारा उसके पास
भेजा श्लेष सुनकर साहस की शंका करते हुए और न चाहते हुए भी राजकुमारी की सखी ने उससे
भवित कर दिया ॥७४-७५॥
हे भद्र यह सामने जो एकान्त मन्दिर देख रहे हो इसमें तुम रात को राजकुमारी के
आने की प्रतीक्षा करना। इस प्रकार का उससे निश्चय करके सखी ने राजकुमारी तेजस्वती से कह
दिया। तेजस्वती भी सूर्य को देखती हुई बैठी रही अर्थात् रात्रि-आगमन की प्रतीक्षा करने
लगी ॥७६-७७॥
वह पुरुष सखी से निश्चय करके भी भय से कहीं भाग गया। सच है मेंढक कमलिनी
के नेकर का स्वाद नहीं जान सकता ॥७८॥
राजवंश में उत्पन्न भीमदत्त नामक एक युवा राजकुमार पिता के मर जाने पर पिता के
मित्र विषमसिंह के पास दैवयोग से इसी सायंकाल वहाँ (उज्जैन में) आया ॥७९॥
वह सुन्दर युवा भाई-बन्धुओं द्वारा राज्य-हरण कर लेने के कारण दुःखित और अकेला
उज्जैन पहुँचा था। उस समय (सायंकाल) राजा से मिलना उचित न जानकर वह उसी शून्य
या एकान्त मन्दिर में ठहर गया जिसमें राजकुमारी की सखी ने उसके प्रेमी पुरुष को आने का
संकेत दिया था ॥८०-८१॥
रात्रि में प्रेम से अन्धी राजकुमारी ने उस मन्दिर में बैठे हुए राजपुत्र को धोखे से अपना
पति बना लिया ॥८२॥
उस बुद्धिमान् राजकुमार ने भी चुपचाप उसका प्रेमाभिनन्दन किया क्योंकि वह उसकी
भावी राज्यलक्ष्मी की सूचना दे रही थी ॥८३॥
तब राजकुमारी ने उसे छल से प्राप्त होने पर भी अत्यन्त सुन्दर देखकर अपने को दैव
वशिन (ठगाई हुई) नहीं समझा ॥८४॥
तदनन्तर इधर-उधर की बात और आदरयुक्त प्रगल्भ करके राजकुमारी अपने भवन
को गई और राजपुत्र ने वहीं रात्रि व्यतीत की ॥८५॥
प्रातःकाल राजपुत्र राजभवन में जाकर द्वारपाल से सूचना दिलाकर राजा के समीप
पहुँचा और उससे परिचित हुआ ॥८६॥
राजपुत्र के राज्यापहरण आदि दुःखों को सुनकर राजा ने उसके शत्रुदमन के लिए
सहायता करना स्वीकार किया। साथ ही पहले से ही देने के लिए तैयार उस अपनी कन्या को
उसे देने के लिए भी राजा ने विचार किया और मन्त्रियों से अपना विचार कहा ॥८७-८८॥
अनन्तर राजकुमारी की अन्तरंग गतियों से भली भाँति परिचित कराई गई रानी ने
भी राजा से कन्या का सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥८९॥

तथा च कथयाम्येतां राजन्नत्र कथां शृणु।

असिद्धानिष्टसिद्धेष्टकार्यतानीयविस्मितम् ।
सततस्तं तम राजानमेको मन्त्री तदाब्रवीत् ॥८९॥
विधिरेव हि जागर्त्ति मन्द्यानामर्थसिद्धिषु ।
असञ्चेतयमानानां सद्भूत्य स्वामिनामिव ॥९०॥
तथा च कथयाम्येतां राजन्नत्र कथां शृणु।

हरिशर्मणो ब्राह्मणस्य कथा

बभूव हरिशर्माख्यः कोऽपि ग्रामे क्वचिद्द्विजः ॥९२॥
स दरिद्रश्च मूर्खश्च भृत्यभावेन दुःखितः ।
पूर्वदुष्कृतभोगाय जातोऽतिबहुबालकः ॥९३॥
सकुडुम्बो भ्रमन् भिक्षां प्राप्यैकं नगरं क्रमात् ।
स्थितये स्थूलदत्तस्य गृहस्य स महाधनम् ॥९४॥
गवादिरक्षकान् पुत्रान् भार्यां कर्मकरीं निजाम् ।
तस्य कृत्वा गृहाभ्यर्णे प्रैष्यं कुर्वन्नुवास सः ॥९५॥
एकदा स्थूलदत्तस्य सुतापरिणयोत्सवः ।
तस्याभूदागतानेकजन्यायात्राजनाकुलः ॥९६॥
सदा च हरिशर्मानि तद्गृहे सकुतुम्बकः ।
आप्लुष्टमांसादिभोजनान्यो ववध सः ॥९७॥
तद्वेलां वीक्षमाणोऽप्य स्मृतः केनापि नात्र सः ।
ततोऽत्राहारनिर्विण्णो भार्यामियब्रवीन्निशि ॥९८॥
दारिद्र्यादिह मौर्ध्यान्च ममेत्थभगौरवम् ।
तदत्र कृत्रिम युक्त्या विज्ञानं प्रमुनग्म्यहम् ॥९९॥
येनास्य स्थूलदत्तस्य भवय गौरवास्पदम् ।
त्व प्राप्तेऽवसरे चास्मै शानिन मां निवेदय ॥१००॥
इत्युक्त्वा तां विधिस्स्यात्र धिया गुप्ते जने ह्य ।
स्थूलदत्तगृहात्तन्न जहे जामातृवाहनम् ॥१०१॥
दूरं प्रच्छन्नमेतेन स्थापितं प्रास्तरञ्च खम् ।
इतस्ततो विधिस्वत्तोऽप्यध्यन्वं जन्या न एभिरे ॥१०२॥
अथाम दूखविश्रस्त ह्यश्वोरगवेषिजम् ।
हरिशर्मवधूरस्य स्थूलदत्तमभाष सा ॥१०३॥
भर्त्ता मनीयो विज्ञानी ज्योतिर्विद्यादिशोधिवः ।
अन्य वा सम्भयरयेनं किमर्थ म न पृच्छयते ॥१०४॥

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११८ कथासरित्सागर

११८ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वा स्थूलदत्तस्तं हरिशर्माणमाह्वयत् ।
प्रभो विस्मृतो हृतेऽश्वे तु स्मृतोऽस्म्यद्येति वादिनम् ॥१०५॥
विस्मरं न क्षमस्वेति प्रार्थितं ब्राह्मणं च सः ।
पप्रच्छ केनापहृतो हयो नः कथ्यतामिति ॥१०६॥
हरिशर्मा ततो मिथ्या रेखाः कुर्वन्नुवाच सः ।
हतो दक्षिणसीमान्ते चोरैः संस्थापितो ह्ययम् ॥१०७॥
प्रच्छन्नस्थो दिनान्ते च दूरं यावन्न नीयते ।
तावदानीयतां गत्वा त्वरितं स तुरङ्गमः ॥१०८॥
तच्छ्रुत्वा धावितैः प्राप्य क्षणात्स बहुभिर्नरैः ।
आनिन्येऽश्वः प्रशंसद्भिर्विज्ञानं हरिशर्मणः ॥१०९॥
ततो ज्ञानीति सर्वेण पूज्यमानो जनेन सः ।
उवास हरिशर्मात्र स्थूलदत्ताश्रिमः सुखम् ॥११०॥
अथ गच्छत्सु दिवसेष्वत्र राजगृहान्तरात् ।
हेमरत्नानि चौरेण भूरि केनाप्यनीयत ॥१११॥
नाज्ञायत यदा चौरस्तदा ज्ञानिप्रसिद्धितः ।
आनाययामास नृपो हरिशर्माणमाशु तम् ॥११२॥
स धानीतः क्षिपन् कालं वक्ष्ये प्रातरिति ब्रुवन् ।
वासके स्थापितो भ्रान्तखिन्नो राज्ञासुरक्षितः ॥११३॥
तत्र राजकुले चासीन्नाम्ना जिह्वेति चेटिका ।
यया भ्रात्रा समं तच्च नीतमभ्यन्तराद्धनम् ॥११४॥
सा गत्वा निशि तत्रास्य वासके हरिशर्मणः ।
जिह्वासया ददौ द्वारि कर्णं तज्ज्ञानशङ्किता ॥११५॥
हरिशर्मा च तत्कालमेकतोऽभ्यन्तरे स्थितः ।
निजां जिह्वां निनिन्दैव मपाविज्ञातवादिनीम् ॥११६॥
मापल्लम्पटया जिह्वे ! किमिदं विहितं त्वया ।
दुराचारे सहस्व स्वमिदानीमिह निग्रहम् ॥११७॥
तच्छ्रुत्वा ज्ञानिनानेन ज्ञातास्मीति भयेन सा ।
जिह्वाख्या चेटिका युक्त्या प्रविश्य तदन्तिकम् ॥११८॥
पतिस्वा पादयोस्तस्य ज्ञानिप्रच्छन्नमब्रवीत् ।
प्रत्यप्सि सा जिह्वाहं त्वया ज्ञातार्थहारिणी ॥११९॥

यह सुनकर स्थूलदत्त ने उस हरिशर्मा को बुलवाया। हरिशर्मा ने कहा—'कल से
भूख हुए मुझे आज घोड़ा खोने पर आपने याद किया' ॥१९५॥
तब 'हमारी भूल को क्षमा करना' ऐसा कहते हुए स्थूलदत्त ने पूछा—हमारा घोड़ा
किसने चुराया यह बताओ' ॥१९६॥
उसके यह पूछने पर हरिशर्मा भूमि पर झूठी रेखाएँ खींचता हुआ बताने लगा कि यहाँ
से दक्षिणी सीमा के पास चोरों ने घोड़ा रखा है ॥१९७॥
यह छिपा हुआ है, सायंकाल होने पर चोर उसे दूर ले जायेंगे ॥१९८॥
यह सुनकर उधर दौड़कर ढूँढ़ते हुए बहुत-से लोगों ने घोड़ा पा लिया और हरिशर्मा के
विज्ञान की प्रशंसा करते हुए उसे घर ले आये ॥१९९॥
तभी से 'विद्वान् है'—ऐसा समझकर स्थूलदत्त से सम्मानित हरिशर्मा जनता में भी
सम्मानित हुआ और सुखपूर्वक वहाँ रहने लगा ॥१००॥
कुछ दिनों के उपरान्त उस नगर के राजा के यहाँ सोना रत्न आदि की चोरी हो
गई। जब चोरों का पता न लगा तब ज्योतिषी के नाम से प्रसिद्ध हरिशर्मा को राजा ने
बुलवाया ॥१०१-१०२॥
बुलवाये हुए हरिशर्मा ने व्यर्थ समय व्यतीत करके कहा कि 'सवेरे बताऊँगा'। तब
राजा ने सुरक्षा के साथ उसे किसी कमरे में ठहरा दिया ॥१०३॥
राजा के यहाँ जिह्वा नाम की एक सेविका थी। उसने अपने भाई की सहायता से राज
महल से चोरी कराकर धन का अपहरण किया था ॥१०४॥
वह जिह्वा चोरी के कारण शंकितहृदय होकर रात को हरिशर्मा के निवास पर
आकर द्वार से कान लगाकर सुनने लगी। उस समय हरिशर्मा कमरे में अकेला बैठा हुआ झूठा
विज्ञान बतानेवाली अपनी जिह्वा (जीभ) की निन्दा कर रहा था ॥१०५-१०६॥
'हे जिह्वा लोभ की लम्पट —तूने यह क्या किया ? दुराकाङ्क्षी अब उसका दंड सहन
कर' ॥१०७॥
यह सुनकर भयभीत सेविका इसने मुझे जान लिया ऐसा सोचकर प्राणदंड के भय से
व्याकुल होकर उसी उपाय में हरिशर्मा के पास पहुँची ॥१०८॥
और उस बनावटी ज्योतिषी के चरणों में गिरकर कहने लगी —'हे ब्राह्मण मैं ही वह
जिह्वा हूँ जिस धनरत्नादि को तुमने जान लिया है ॥१०९॥

नीत्वा तच्च मयास्यैव मन्दिरस्येह पृष्ठतः।
उद्याने दाडिमीस्तम्भो निखातं भूतले घनम् ॥१२०॥
सद्रत्नं मा गृहाण त्वं किञ्चिन्मे हेम हस्तगम्।
एतच्छ्रुत्वा सगर्वः स हरिशर्मा जगाद ताम् ॥१२१॥
गच्छ जानाम्यहं सर्वं भूतं भव्यं भवत्तथा।
त्वां तु नोद्घाटयिष्यामि कृपणां शरणागताम् ॥१२२॥
यच्च हस्तगतं तर्ह्यस्ति तद्दास्यसि पुनर्मम।
इत्युक्त्वा तन्न सा चेटी तथेत्याशु ततो ययौ ॥१२३॥
हरिशर्मा च स ततो विस्मयान्वितमचिन्तयत्।
असाध्यं साधयत्यर्थं हेम्न्याभिमुखो विधिः ॥१२४॥
यदिहोपस्थितेऽन्ये सिद्धोऽस्म्यौत्पातिकैरिव मम।
स्वजिह्वां निन्दतो जिह्वा चौरी मे पतिता पुरः ॥१२५॥
द्यूतैरिव प्रकाश्यन्ते बत प्रच्छन्नपातकाः।
इत्याद्याकलयन्सोऽत्र हृष्टो रात्रिं निनाय ताम् ॥१२६॥
प्रातश्चालीकविज्ञानयुक्त्या नीत्वा स तं नृपम्।
तत्रोद्याने निखातस्य प्रापयामास तद्धनम् ॥१२७॥
चौरं चाप्यपनीतांशं शशंस प्रपलायितम्।
ततस्तुष्टो नृपस्तस्मै ग्रामान्दातुं प्रचक्रमे ॥१२८॥
कथं स्यान्मानुषागम्यं ज्ञानं शास्त्रं विनेदृशम्।
तन्नूनं चौरसङ्केतकृतेयं धूर्तजीविका ॥१२९॥
तस्मादेषोऽन्यया युक्त्या वारमेकं परीक्ष्यताम्।
देव ज्ञानीति कर्णे तं मन्त्री राजानमभ्यधात् ॥१३०॥
ततोऽन्तः क्षिप्तमण्डूकं सपिधानं नवं घटम्।
स्वैरमानाय्य राजा तं हरिशर्माणमब्रवीत् ॥१३१॥
ब्रह्मन् यदस्मिन् घटके स्थितं जानासि तद्वद।
सदद्य ते करिष्यामि पूजां सुमहतीमहम् ॥१३२॥
तच्छ्रुत्वा नाशकालं तं मत्वा स्मृत्वा ततो निजम्।
पित्रा क्रीडाकृतं बाल्ये मण्डूक इति नाम सः ॥१३३॥
विधातुप्रेरितं मुञ्चस्तेनात्र परिवेदनम्।
ब्राह्मणो हरिशर्मा सहसैवैवमब्रवीत् ॥१३४॥

षष्ठ लम्बक ७१

षष्ठ लम्बक ७१
मैंने भय से जाकर इसी भवन के पीछे उद्यान में अनार के पेड़ के नीचे की भूमि में गाड़
दिया है॥१२०॥
तो अब मेरी रक्षा करो और मेरे हाथ में जो सोना है उसे ले लो। यह सुनकर हरिशर्मा
गर्व के साथ कहने लगा॥१२१॥
'तू जा मैं भूत भविष्य सब जानता हूँ। दीन और शरण में आई हुई तुझसे प्रकट न करूँगा।
जो तेरे हाथ में धन है उसे मुझे न देगी तब ऐसा करूँगा' ॥१२२॥
हरिशर्मा से इस प्रकार कही गई दासी उसकी बात मानकर शीघ्र चली गई॥१२३॥
तदनन्तर स्वयं चकित हरिशर्मा ने आश्चर्य से सोचा कि अनुकूल दैव असाध्य बात को
भी सरलता से ही सिद्ध कर देता है ॥१२४॥
देखो मेरे सामने अनर्थ उपस्थित था किन्तु अब निःसन्देह मेरा कार्य सिद्ध हो गया।
अपनी जिह्वा की निन्दा करते हुए चोरिनी जिह्वा सामने आगई॥१२५॥
आश्चर्य है छिपे हुए पाप धोखा से ही प्रकाशित हो जाते हैं इत्यादि बातें सोचते हुए
प्रसन्न हरिशर्मा ने रात्रि व्यतीत की॥१२६॥
प्रातःकाल झूठी रेखा आदि खींचकर, राजा को उस उद्यान में ले गया और गड़ा हुआ
धन निकलवा दिया॥१२७॥
और कह दिया कि चोर कुछ हिस्सा लेकर भाग गया है। इस बात पर सन्तुष्ट राजा
उसे गाँव आदि पुरस्कार में देने को उद्यत हुआ॥१२८॥
तब एक मन्त्री ने राजा के कान में कहा—'ऐसा ज्ञान शास्त्र के बिना मनुष्य के लिए
अप्राप्य है। अतः यह अवश्य ही चोर से बताई हुई धूर्त की जीविका है॥१२९॥
इसलिए किसी अन्य उपाय से भी इस ज्योतिषी की परीक्षा करनी चाहिए' ॥१३०॥
तब राजा ने एक नया घड़ा मँगाकर, उसमें एक मेंढक डालकर बन्द कर दिया और
हरिशर्मा से कहा—॥१३१॥
'ब्राह्मण इस घड़े के अन्दर क्या है? यदि बता दो तो तुम्हारी पूजा विशेष रूप से
करूँगा' ॥१३२॥
यह सुनकर और अपना विनाश-काल जानकर, अपने पिता द्वारा हँसी-हँसी में रखे हुए
अपने मण्डूक नाम को स्मरण कर विलाप करता हुआ दैवप्रेरित हरिशर्मा इस प्रकार
बोल उठा—॥१३३-१३४॥

७२ कथासरित्सागर

७२ कथासरित्सागर
साघोरेव तु मण्डूक शवाकाण्डे घटोऽधुना।
अयशस्य विनाशाय सञ्जातोऽय हठादिह ॥१३५॥
रन्ध्रस्वाहो महाज्ञानी मेकोऽपि विदितोऽमुना।
इति जल्पन्ननन्वात्र प्रस्तुतान्नान्ययाज्जनः ॥१३६॥
ततस्तत्रातिमानान मन्वानो हरिधर्मण ।
तुष्टो राजा ददौ ग्रामान् सहेमच्छत्रवाहनान् ॥१३७॥
क्षणाच्च हरिशर्मा स जज्ञे सामन्तसन्निभः।१
इत्थं दैवेन साध्यन्ते सदर्थाः शुभकर्मणाम् ॥१३८॥
तत्सोमदत्त सदृशं दैवेनेबाभिसारिता।
निजायसदृशं राजंस्तव तेजस्वती सुता ॥१३९॥
इति मन्त्रिमुरबाच्छ्रुत्वा तस्मै राजसुताय ताम्।
राजा विक्रमसेनोऽथ ददौ लक्ष्मीमिवात्मजम् ॥१४०॥
ततः श्वशुरसैन्येन गत्वा जित्वा रिपूंश्च स।
सोमदत्तः स्वराज्यस्थस्तस्थौ भार्यासख मुदम् ॥१४१॥
एवं विधेर्भवति सर्वमिदं विशेषा
त्त्वामीदृशीं घटयितुं क इह क्षमेत।
वत्सेश्वरेण सदृशेन धिनैव देव
कुर्यामिह सखि किमत्र कलिङ्गसेने ॥१४२॥
इत्थं कथां रहसि राजसुता निशम्य
सोमप्रभावदनतोऽत्र कलिङ्गसेना।
सप्ताधिनी शिथिलबन्धुभयत्रपा सा
वत्सैशसङ्गमसमुत्कमना बभूव ॥१४३॥
अथास्तमुपमास्यति त्रिभुवनैकदीपे रवौ
प्रभातसमयागमर्षि कथञ्चिदामन्त्र्य ताम्।
सखीमभिमतोद्यमस्थितमतिं खमार्गेण सा
मयासुरसुता ययौ निजगृहाय सोमप्रभा ॥१४४॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे
मदनमञ्चुकालम्बके चतुर्थस्तरङ्गः ।
१ पाश्चात्यकथास्वपीदृश्यः कथा समालोक्यन्ते । श्रीमत्सरचित 'चतुर्माणिपत्स्य
कथा' नाम्नि पुस्तकेऽपीदृशी कथा समायाति । सर्वास मूलं कथासरित्सागर एव ।

'हे मंडूक, भांप-भांपे और विवश तेरे नाश के लिए यह चर्म कारण हुआ' ।।१३५।।
यह सुनकर प्रसंग की ओर अख लगाकर वहाँ उपस्थित पुरुषों ने कहा—'ओह ! यह
तो महान् ज्योतिषी है। इसने मण्डूक को भी जान लिया' ।।१३६।।
तब प्रसन्न राजा ने उसके कथन को प्रतिभा प्रसूत ज्ञान समझकर थान के छत्र हाथी घोड़े
आदि के साथ ग्राम भी भेंट किए ।।१३७।।
क्षण-भर में वह हरिशर्मा सामन्त राजा के समान हो गया। १ दैव अच्छे कर्मवालों के
साथ स्वयं ऐसे ही मिल कर बैठता है ।।१३८।।
इसलिए दैव ने इस कन्या को भीमदत्त के पास उचित ही अभिगमन करा दिया और
अयोग्य व्यक्ति को भी हटा दिया ।।१३९।।
मन्त्री के मुँह से इस प्रकार कथा सुनकर विक्रममत्त ने धरणी के समान अपनी कन्या
राजपुत्र सामदत्त को दे दी ।।१४० ।।
तदनन्तर सामदत्त भी श्वशुर की सेना के बल से शत्रुओं पर चढ़ाई करके और उन्हें जीतकर
अपने राज्य में अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा ।।१४१।।
हे कलिङ्गसेने दैवगति की विशेषता से ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं। अतः ऐसी सुन्दरी
तुझे वत्सेश्वर से मिलाने में दैव के सिवा और कौन समर्थ है। मैं इस विषय में क्या कर
सकती हूँ ।।१४२।।
इस प्रकार, सोमप्रभा के मुख से एकान्त में कथा सुनकर बन्धुओं के भय और लज्जा को
छोड़कर कलिङ्गसेना वत्सराज के समागम के लिए अत्यन्त उत्कण्ठित हो गई ।।१४३।।
तदनन्तर त्रिभुवन के एकमात्र दीपक सूर्य के अस्त हो जाने पर, प्रातःकाल पुन आने की
अवधि प्रदान करके मयासुर की पुत्री सोमप्रभा अभीष्ट-सिद्धि के लिए उद्यत सखी कलिङ्गसेना
से पूछकर आकाश-मार्ग से घर को चली गई ।।१४४।।
चतुर्थ तरङ्ग समाप्त

१ इस कथा से मिलती-जुलती कहानी, ग्रीस की 'परियों की कहानी' में भी है।
बेनफी का कथन है कि योरप में प्रचलित ऐसी कहानियों का मूल स्रोत कथासरित्सागर
ही है।—अनु

७६ कथासरित्सागर

७६ कथासरित्सागर
साम्यन्ती च सतं सा तं स्वप्ने दृष्टं प्रियं विना।
पृच्छन्त्यै चित्रलेखायै सख्यै सर्वं शशंस तत् ॥१५॥
सापि नामाद्यभिज्ञानं न किञ्चित्तस्य जानती।
योगेश्वरी चित्रलेखा तामुपामेवमब्रवीत् ॥१६॥
सखि देवीवरस्यायं प्रभावोऽत्र किमुच्यते।
किं त्वभिज्ञानशून्यस्ते सोऽन्वेष्टव्यः प्रियः कथम् ॥१७॥
परिजानासि चेत् ते ससुरासुरमानुषम्।
जगल्लिखामि तन्मध्ये तं मे दर्शय येन सः ॥१८॥
आनीयते मयेत्युक्ता सा तथेत्युदिते तया।
चित्रलेखा क्रमाद् विश्वममिखद् वर्णवर्तिभिः ॥१९॥
तत्रोषा सोऽयमित्यस्या दृष्टाङ्गुल्या सकम्पया।
द्वारवत्यां यदुकुलादनिरुद्धमदर्शयत् ॥२०॥
चित्रलेखा ततोऽब्रवीत् सखि धन्यासि यत्त्वया।
भर्त्तामिरुद्धः प्राप्तोऽयं पौत्रो भगवतो हरेः ॥२१॥
योजनानां सहस्रेषु षष्टौ वसति स स्थितः।
तच्छ्रुत्वा साधिकौत्सुक्यवशात्तामब्रवीदुषा ॥२२॥
माद्य चेत्सखि तस्याङ्कं ध्ये श्रीखण्डशीतलम्।
तदत्युद्दामकामाग्निनिर्वग्धां विद्धि मां मृताम् ॥२३॥
श्रुत्वैतच्चित्रलेखा सा तामाश्वास्य प्रियां सखीम्।
तदैवोत्पत्य मनसा ययौ द्वारवतीं पुरीम् ॥२४॥
ददर्श च पृथूत्तुङ्गेर्मन्दिरैरब्धिमध्यगाम्।
कुर्वतीं तं पुनः क्षिप्तमन्याभिश्चिस्तरभ्रमम् ॥२५॥
तस्यां सुप्तं निशि प्राप्य सानिरुद्धं विबोध्य च।
उपानुरागं च तस्मै शशंस स्वप्नदर्शनात्१ ॥२६॥
आदाय चाततद्रूपस्वप्नवृत्तान्तमेव तम्।
सोक्तं सिद्धिप्रभावेण क्षणेनेवाययौ ततः ॥२७॥
एत्य चावेक्षमाणायास्तस्याः सख्याः सबाष्पंगः।
प्रावेशयदुपायास्तं गुप्तमन्तःपुरं प्रियम् ॥२८॥

१ स्वप्नान्तमेवालिख्यं तमानयत् चित्रलेखेति पाठान्तरै।

षष्ठ खण्ड ७०७
स्वप्न में देखे हुए पति को न पाकर व्याकुल हुई। इसीलिए पूछती हुई सखी से
चित्रलेखा से और, सब समाचार कह दिया ॥१५॥
योगेश्वरी चित्रकला भी उसके नाम-धाम आदि का परिचय न जानती हुई उषा को इस
प्रकार कहने लगी ॥१६॥
'हे सखि यह देवी पार्वती के वर का प्रभाव है। इसमें क्या कहा जा सकता है। किन्तु
परिचय से रहित वह तेरा प्रियतम कैसे खोजा जा सकता है? ॥१७॥
'यदि तू उस नहीं पहचानती है, तो मैं संसार के सुन्दर देवनामों असुरों और मनुष्यों के
चित्र बनाती हूँ उनमें तू मुझे उसे पहचान कर दिखा ॥१८॥
'मैं उसे चाहती हूँ। ऐसा कहने पर चित्रलेखा ने भ्रमरा रंग की कूँचिया से सभी सुन्दर
व्यक्तियों के चित्र लिखे ॥१९॥
तब उषा ने काँपती हुई अँगूली से द्वारकापुरी के यदुवंशीय अनिरुद्ध को पहचान
कर दिखाया ॥२०॥
यह देखकर चित्रलेखा बोली—'सखि तू धन्य है, जो तूने भगवान् कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध
को अपना पति प्राप्त किया॥२१॥
वह यहाँ से साठ हजार योजन (२४ कोस) की दूरी पर है। यह सुनकर अधिक
उत्कण्ठा के वश होकर उषा बोली॥२२॥
'सखि यदि आज मैं उनकी चन्दन के समान शीतल गोद में न बैठी तो अति प्रचंड कामाग्नि
से मुझे दग्ध समझो। अर्थात् मर जाऊँगी' ॥२३॥
यह सुनकर चित्रलेखा सखी उषा को धैर्य देकर आकाश में उड़कर द्वारवती नगरी में
पहुँची ॥२४॥
उसने समुद्र के मध्य ऊँचे ऊँचे भवनों से शोभित द्वारकापुरी को देखा जो पर्वत-शिखरों
के समान ऊँचे भवनों से समुद्र-मन्थन करने के लिए पुनः समुद्र में फेंके हुए मन्दराचल के शिखर
का भ्रम उत्पन्न कर रही थी॥२५॥
उस चित्रकला ने वहाँ रात में शयन करते हुए अनिरुद्ध को जगाकर उसके प्रति स्वप्न
देखने से उत्पन्न हुए गाढ़े अनुराग का परिचय दिया ॥२६॥
उसी प्रकार के स्वप्न देखने से उद्विग्न अनिरुद्ध को लेकर वह योगेश्वरी चित्रलेखा
सिद्धि के प्रभाव से क्षण भर में बाण-नगरी में आ गई॥२७॥
वहाँ लाकर अनिरुद्ध को उसका रूप निहारती हुई उषा के भवन में युक्ति द्वारा पहुँचा
दिया॥२८॥
१ भागवत के अनुसार चित्रलेखा नींद अनिरुद्ध को योगबल से उड़ा ले गई थी।

७४ कथासरित्सागर

७४ कथासरित्सागर
पञ्चमस्तरङ्ग
कलिङ्गसेनायाः सोमप्रभायाश्च कथा (पूर्वानुवृत्ता)
ततोऽन्येद्युरुपेतां तां प्रातः सोमप्रभां सखीम्।
कलिङ्गसेना वियन्मातः कथां कुर्वत्युवाच सा॥१॥
मां प्रसेनजिते राज्ञे तातो दास्यति निश्चितम्।
एतच्चात्र मयाम्बातो दृष्टो वृद्धः स च त्वया॥२॥
वत्सेश्वरस्तु यथा रूपे त्वयैव कथितस्तथा।
श्रुतिमार्गप्रविष्टेन हृतं तेन मया मनः॥३॥
तत्प्रसेनजितं पूर्वं प्रदर्श्य नय तत्र माम्।
आस्ते वत्सेश्वरो यत्र किं तातेन किमम्बया॥४॥
एवमुक्तवतीं तां च सोक्ता सोमप्रभाब्रवीत्।
गन्तव्यं यदि तद्यामो यन्त्रेण व्योमगामिना॥५॥
किं तु सर्वं गृहाण त्वं निजं परिकरं यतः।
दृष्ट्वा वत्सेश्वरं भूयो नागन्तुमिह शक्ष्यसि॥६॥
न च त्वं द्रक्ष्यसि पुनः पितरौ न स्मरिष्यसि।
दूरस्थां प्राप्तदयिता विस्मरिष्यसि मामपि॥७॥
नह्येषमहमेष्यामि भर्तृवेश्मनि ते सखि।
तच्छ्रुत्वा राजकन्या सा रुदती तामभाषत॥८॥
तर्हि वत्सेश्वरं तं त्वमिहैवानय मे सखि।
नोत्सहे तत्र हि स्थातुं क्षणमक्क त्वया विना॥९॥
मानिन्ये चानिरुध्य किमपायाच्चित्रलेखया।
जानन्त्यपि तथा चेतो मतस्त्वं तत्कथां शृणु॥१०॥
बाणासुरस्य तनया बभूवोषेति विश्रुता।
तस्याश्चाराधिता गौरी पतिप्राप्त्यै वरं ददौ॥११॥
स्वप्ने प्राप्स्यसि यत्सङ्गं स ते भर्त्ता भवेदिति।
ततो देवकुमाराभं कञ्चित्स्वप्ने ददर्श सा॥१२॥
गान्धर्वविधिना तेन परिणीता तथैव च।
प्राप्ततत्सदृशसम्भोगा प्राबुध्यत निशाक्षये॥१३॥
अबुद्ध्वा सं पतिं दृष्टं दृष्ट्वा सम्भोगलक्षणम्।
स्मृत्वा गौरीवरं सामूत्सात्कुभयविस्मया॥१४॥

षष्ठ लम्बक ७०५

षष्ठ लम्बक ७०५
पञ्चम तरङ्ग
कलिङ्गसेना और सोमप्रभा की कथा (चालू)
तदनन्तर दूसरे दिन प्रातःकाल आई हुई सहेली सोमप्रभा से विश्वस्त बातें करती हुई
कलिङ्गसेना कहने लगी ॥१॥
मेरा पिता मुझे प्रसेनजित् को अवश्य दे देगा यह निश्चित है। यह मैंने अपनी माता से
सुना है और तूने उस वृद्ध प्रसेनजित् को देखा है ॥२॥
वत्सराज को तो रूप (सुन्दरता) में जैसा तूने वर्णित किया है कि उसने कानों के
मार्ग से प्रवेश करके मेरा हरण कर लिया है ॥३॥
इसलिए पहले मुझे प्रसेनजित् को दिखाओ। और, मुझे वहाँ भी ले चलो जहाँ
वत्सराज है। पिता से क्या प्रयोजन और माता से भी क्या करना है ॥४॥
इस प्रकार कहती हुई उत्कंठित कलिङ्गसेना को सोमप्रभा ने कहा—'यदि चलना है तो
यन्त्रचालित आकाशयान से चलें ॥५॥
किन्तु तुम अपने वस्त्र आभूषण और सबलों को साथ ले लो क्योंकि वत्सराज को
देखकर फिर तुम लौट न सकोगी ॥६॥
फिर तुम माता-पिता को न देखोगी और न उन्हें स्मरण ही करोगी अर्थात् सब भूल
जाओगी ॥७॥
और हे सखि न मैं ही तुम्हारे पति के घर आऊँगी'। यह सुनकर आँसू बहाती हुई राज-
कुमारी सखी से बोली ॥८॥
'मेरी प्यारी सखी यदि ऐसा है, तो तुम वत्सराज को ही यहाँ ले आओ। मैं तेरे बिना
यहाँ एक क्षण भी न ठहर सकूँगी ॥९॥
क्या चित्रलेखा ने उपाय करके अनिरुद्ध को उषा के पास नहीं ला दिया था ? इस कथा
को जानती हुई भी तुम मुझसे सुनो ॥१०॥
उषा और अनिरुद्ध की कथा
उषा के नाम से प्रसिद्ध बाणासुर की कन्या थी। उसने गौरी की आराधना की और
गौरी ने उसे पति-प्राप्ति का वरदान दिया ॥११॥
'कि स्वप्न में तुम जिसका संग प्राप्त करोगी वही तुम्हारा पति होगा' ॥१२॥
तब उसने एकबार देवकुमार के समान किसी को स्वप्न में देखा। गान्धर्व विधि से उसके
साथ विवाह आदि किया और प्रातःकाल उठी ॥१३॥
उठने पर स्वप्न में देखे हुए उस पति को न देखकर और सम्भोग के लक्षणों को देखकर
गौरी के वर को स्मरण करके वह आतंक और भय से व्याकुल हो गई ॥१४॥
८९

७६ कथासरित्सागर

७६ कथासरित्सागर
ताम्यन्ती च ततः सा तं स्वप्ने दृष्ट्वा प्रियं विना।
पृच्छन्त्यै चित्रलेखायै सख्यै सर्वं शशंस तत्॥१५॥
सापि नामाद्यभिज्ञानं न किञ्चित्तस्य जानती।
योगेश्वरी चित्रलेखा तामुपायममब्रवीत् ॥१६॥
सखि देवीवरस्यायं प्रभावोऽत्र किमुच्यते।
किं त्वभिज्ञानशून्यस्ते सोऽन्वेष्टव्यः प्रियः कथम्॥१७॥
परिजानासि चेत् ते ससुरासुरमानुषम्।
जगल्लिखामि तन्मध्यं तं मे दर्शय येन सः॥१८॥
आनीयते मयेत्युक्ता सा तथेत्युदिते तया।
चित्रलेखा क्रमाद् विश्वमलिखद् वर्णवर्तिभिः॥१९॥
तत्रोषा सोऽयमित्यस्या हृष्टाङ्गुल्या सकम्पया।
द्वारवत्यां यदुकुलादमिरुद्धमदर्शयत्॥२०॥
चित्रलेखा ततोऽवादीत् सखि धन्यासि यत्त्वया।
भर्त्तानिरुद्धः प्राप्तोऽयं पौत्री भगवतो हरेः॥२१॥
योजनानां सहस्रेषु षष्टौ वसति स त्वितः।
तच्छ्रुत्वा साधिकौत्सुक्यवशात्तामब्रवीदुषा॥२२॥
माद्य चेत्सरिस तस्याङ्गं अये श्रीखण्डशीतलम्।
तदत्युद्दामकामान्निर्दग्धां विद्धि मां मृताम्॥२३॥
श्रुत्वैतच्चित्रलेखा सा तामाश्वास्य प्रियां सखीम्।
तदैवोत्पत्य नभसा ययौ द्वारवतीं पुरीम्॥२४॥
ददर्श च पृथुशृङ्गेमन्दिरेरत्नमम्यगाम्।
कुर्वती त पुन क्षिप्यमन्त्राञ्चितित्तरभ्रमम्॥२५॥
तस्यां सुप्तं निशि प्राप्य सानिरुद्धं विबोध्य च।
उषाऽनुरागं त तस्मै शशंस स्वप्नदर्शनात् ॥२६॥
आदाय भारतरूपस्त्वप्नवृत्तान्तमेव सम्।
सोऽतं सिद्धिप्रभावेण क्षणेनैवाययौ ततः॥२७॥
एत्य चावेक्षमाणायास्तस्याः सख्याः सबर्मना।
प्रावेशयदुपायास्तं गुप्तमन्तःपुरं प्रियम्॥२८॥
१ स्वप्नन्तमेवानिरुद्धं समागमत् चित्रलेखेति ज्ञायते।

षष्ठ लम्बक ७७

षष्ठ लम्बक ७७
स्वप्न में देखे हुए पति को न पाकर व्याकुल हुई। इसीलिए पूछती हुई सखी से
चित्रलेखा ने और, सब समाचार कह दिया॥१५॥
योगेश्वरी चित्रलेखा भी उसके नाम-धाम आदि का परिचय न जानती हुई उषा को इस
प्रकार कहने लगी॥१६॥
'हे सखि यह देवी पार्वती के वर का प्रभाव है। इसमें क्या कहा जा सकता है। किन्तु
परिचय से रहित वह तेरा प्रियतम कैसे खोजा जा सकता है? ॥१७॥
'यदि तू उसे नहीं पहचानती है तो मैं संसार के सुन्दर देवताओं असुरों और मनुष्यों के
चित्र बनाती हूँ उनमें तू मुझे उसे पहचान कर दिखा ॥१८॥
'मैं उसे लाती हूँ।' ऐसा कहने पर चित्रलेखा ने क्रमशः रंग की कूँचियों से सभी सुन्दर
व्यक्तियों के चित्र लिखे॥१९॥
तब उषा ने काँपती हुई अँगुली से द्वारकापुरी के यदुवंशीय अनिरुद्ध को पहचान
कर दिखाया ॥२०॥
यह देखकर चित्रलेखा बोली—'सखि तू धन्य है, जो तूने भगवान् कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध
को अपना पति प्राप्त किया॥२१॥
वह यहाँ से साठ हजार योजन (२४ कोस) की दूरी पर है। यह सुनकर अधिक
उत्कण्ठा के वश होकर उषा बोली॥२२॥
'सखि यदि आज मैं उसकी चंदन के समान शीतल गोद में न बैठी तो अति प्रचंड कामाग्नि
से मुझे दग्ध समझो। अर्थात् मर जाऊँगी' ॥२३॥
यह सुनकर चित्रलेखा सखी उषा को धैर्य देकर आकाश में उड़कर द्वारावती नगरी में
पहुँची॥२४॥
उसने समुद्र के मध्य ऊँचे-ऊँचे भवनों से शोभित द्वारकापुरी को देखा जो पर्वत-शिखरों
के समान ऊँचे भवनों से समुद्र-मन्थन करने के लिए पुनः समुद्र में फेंके हुए मन्दराचल के शिखर
का भ्रम उत्पन्न कर रही थी॥२५॥
उस चित्रलेखा ने वहाँ रात में शयन करते हुए अनिरुद्ध को जगाकर, उसके प्रति स्वप्न
देखने से उत्पन्न हुए गाढ़े अनुराग का परिचय दिया ॥२६॥
उसी प्रकार के स्वप्न देखने में उत्कण्ठित अनिरुद्ध को लेकर वह योगेश्वरी चित्रलेखा
सिद्धि के प्रभाव से रात भर में बाण-नगरी में आ गई॥२७॥
यहाँ लाकर अनिरुद्ध को उसका पथ निहारती हुई उषा के महल में युक्ति द्वारा पहुँचा
दिया॥२८॥
१ भागवत के अनुसार चित्रलेखा सोये अनिरुद्ध को शोणस्तन से उड़ा ले गई थी।

७८ कथासरित्सागर

७८ कथासरित्सागर

सा दृष्ट्वैवानिरुद्धं समुपा साक्षादुपागतम्।
अमृतांशुमिवाम्भोधिबेला नाङ्गेष्ववर्तत ॥२९॥
ततस्तेन समं तस्यौ सखीवत्तेन तत्र सा।
जीवितेनेव मूर्तेन वल्लमेन यमासुखम् ॥३०॥
सम्मानात् पितर चास्याः शुद्ध बाणं जिगाय सः।
अनिरुद्धः स्ववीर्येण पितामहबलेन च ॥३१॥
ततो द्वारवतीं गत्वा तावभिनन्दतू उभौ।
उषानिरुद्धौ भ्राजते गिरिजाशङ्कराविव ॥३२॥
इत्युपायाः प्रियोऽङ्गेव मेलितश्चित्रलेखया।
त्वं सप्रभाबाप्यधिका ततोऽपि सखि मे मता ॥३३॥
तममानय वत्सैशमिह मास्म चिरं कृथाः।
एव कलिङ्गसेनातः श्रुत्वा सोमप्रभाब्रवीत् ॥३४॥
चित्रलेखा सुरस्त्री सा समत्क्षिप्यानयत्परम्।
मानुषी किं विदध्यात् परस्परधि कुर्वती ॥३५॥
सत्वं नयामि तत्रैव यत्र वत्सेश्वरः सस्ति।
प्राप्तप्रसेनजित तं से दर्शयित्वा त्वदर्शिनम् ॥३६॥
इति सोमप्रभोक्ता सा तथेत्युक्त्वा तया सह।

कलिङ्गसेनाया कौशाम्बीयात्रा

कलिङ्गसेना सस्कृप्तं मायायन्त्रविमानकम् ॥३७॥
तदेवारुह्य नमसा सकोपा सपरिच्छदा।
हृतप्रास्थामिका प्रायात् पित्रोरविदिता ततः ॥३८॥
न हि पश्यति तुङ्गं वा दवभ्रं वा स्त्रीजनोऽग्रतः।
स्मरेण नीतः परमां धारां वाजीव सादिना ॥३९॥
श्रावस्तीं प्राप्य पूर्वं च तं प्रसनजित नृपम्।
मृगयानिर्गतं दूराज्जरा पाण्ड ददर्श सा ॥४०॥
श्वाद् व्रजास्मादिति तां दूरादिव निषेधतः।
उडूयमानेन मुहुश्चामरेणोपलक्षिताम् ॥४१॥
सोऽयं प्रसनजिद्राजा पित्रास्मै स्वां प्रदिसिता।
पश्येति सामप्रभया दर्शितं सोपहामया ॥४२॥

उषा साक्षात् आते हुए अनिरुद्ध को देखकर इस प्रकार अपने अंगों से बाहर हो गई
जिस प्रकार चन्द्र-दर्शन से समुद्र की बेला अपनी सीमा से बाहर हो जाती है ॥२९॥
तदनन्तर उषा मन्त्री द्वारा दिये गये मूर्तिमान् जीवन के समान उस प्राणप्यारे अनिरुद्ध
के साथ सुखपूर्वक रहने लगी ॥३०॥
इस बात को जानकर वृद्ध बाणासुर को अनिरुद्ध ने अपने तथा अपने पितामह श्रीकृष्ण
के बल से जीत लिया ॥३१॥
तदनन्तर अभिप्रेतशरीर ये दोनों द्वारकापुरी में जाकर पार्वती और शंकर के समान
प्रसिद्ध हुए ॥३२॥
इस प्रकार उषा को सखी चित्रलेखा ने शीघ्र ही उसके प्रियतम से उसे मिला दिया था।
हे सखि मैं तुम्हें चित्रलेखा से भी अधिक प्रभावशालिनी समझती हूँ ॥३३॥
इसलिए उस वत्सराज को यहाँ ले आओ। विलम्ब न करो। कलिङ्गसेना से ऐसा सुन
कर सोमप्रभा बोली—॥३४॥
'वह चित्रलेखा देवस्त्री थी इसलिए दूसरे पुरुष को उठा लाई किन्तु पर-पुरुष का स्पर्श
भी न करनेवाली मैं यह कार्य कैसे कर सकती हूँ ॥३५॥
इसलिए तुझे ही वहाँ ले जाती हूँ जहाँ वत्सराज है। उससे पहले मैं तुम्हें माँगनेवाले
प्रसेनजित् को भी दिखा दूँगी' ॥३६॥
कलिङ्गसेना की कौशाम्बी-यात्रा
इस प्रकार सोमप्रभा से कही गई कलिङ्गसेना उसकी बात को मानकर उसके साथ माया-
यन्त्र-चालित आकाशयान से अपने सामान और अंतरंग सेवकों के साथ माता-पिता से छिपकर
चली गई ॥३७-३८॥
सच है कामदेव द्वारा वेगवती धारा में पहुँचाई गई स्त्रियाँ ऊँचा-नीचा नहीं देखतीं
जिस प्रकार सरपट चाल से चलते हुए घोड़े का सारथी ऊँचा-नीचा नहीं देख पाता ॥३९॥
पहले श्रावस्ती नगरी में पहुँचकर शिकार के लिए निकले हुए और वृद्धावस्था से पीले
पड़े हुए प्रसेनजित् को उसने दूर से ही देखा ॥४०॥
उस राजा के दोनों ओर डुलाये जाते हुए चँवर, मानों सोमप्रभा को 'इस वृद्ध से दूर
रहो'—इस प्रकार कहकर दूर से ही निषेध कर रहे थे ॥४१॥
हँसती हुई सोमप्रभा ने कलिङ्गसेना से उस राजा को दिखाते हुए कहा—'देखो यही
वह वृद्ध प्रसेनजित् राजा है। जिसे तुम्हारा पिता तुम्हें दे रहा है ॥४२॥

जरयाय वृतो राजा का वृणीतेऽपरा त्वमुम्।
तदितः सखि शीघ्रं मां नय वत्सेश्वरं प्रति ॥४३॥
इति सोमप्रभां प्रोक्त्वा तत्क्षण सा तया सह।
कलिङ्गसेना व्योम्नैव कौशाम्बी नगरीं ययौ ॥४४॥
तत्रोद्यानगत सा तं वत्सेशं सख्युदीरितम्।
ददर्श दूरात् सोत्कण्ठा चकोरीवामृतत्विषम् ॥४५॥
सा तद्वुत्फुल्लया दृष्ट्या दृश्यस्तेन च पाणिना।
प्रविष्णोऽथ पथानेन मामत्रेत्यब्रवीदिव ॥४६॥
सखि सङ्गमयाद्यैव वत्सराजेन मामिह।
एनं विलोक्य हि स्थातुं न शक्ता क्षणमप्यहम् ॥४७॥
इति चोक्तवतीं सा या सखी सोमप्रभाब्रवीत्।
अद्याशुभं मया किञ्चिन्निमित्तमुपलक्षितम् ॥४८॥
तदिदं दिवस तूष्णीमुद्यानेऽस्मिन्नलक्षिता।
अधितिष्ठस्व मा कार्षी सखि दूरं गतागतम् ॥४९॥
प्रातरागत्य युक्तिं वा घटयिष्यामि सङ्गमे।
अधुना गन्तुमिच्छामि भर्तुश्चित्तगृहे गृहम् ॥५०॥
इत्युक्त्वा तामवस्थाप्य ययौ सोमप्रभा ततः।
वत्सराजोऽपि चोद्यानात् स्वमन्दिरमवाविशत ॥५१॥
ततः कलिङ्गसेना सा तत्रस्था स्वमहत्तरम्।
यथा सर्वं स्वसन्देशं गत्वा वत्सेश्वरं प्रति ॥५२॥
प्राहिणोल्लाङ्घिनिपिच्छापि स्वसख्या शकुनज्ञया।
स्वतन्त्रार्थमनवाञ्छो युवतीनां मनोरमः ॥५३॥
स च गत्वा प्रतीहारमुखेनावद्य तत्क्षणम्।
महत्तर प्रविष्टोऽथ वत्सराजं व्यजिज्ञपत् ॥५४॥
राजन्नस्ति नृदस्तस्य रागस्तत्प्रणिधापने।
सुता कलिङ्गसेनाख्या श्रुत्वा स्वां रूपसम्पदम् ॥५५॥
स्वयंवरार्थमिह ते सम्प्राप्ता त्यक्तबान्धवा।
मायायन्त्रविमानेन सानुगा व्योमगामिना ॥५६॥
आनीता गन्धचारिण्या सख्या सोमप्रभाह्वया।
मद्यामुद्यानलग्ना न लङ्घयेदथार्यया ॥५७॥
तया विज्ञापनायाः प्रेषितः स्वीकुरुष्व ताम्।
युवयोरस्तु यागार्थं कौमुदीवन्यायिव ॥५८॥

षष्ठ लम्बक ७११
'यह राजा जराक्रान्त (बुढ़ावस्था से घिरा हुआ) है। अब इसे कौन दूसरी स्त्री वरेगी ?
इसलिए सखि मुझे यहाँ से शीघ्र वत्सराज की ओर ले चल' ॥४३॥
सोमप्रभा से इस प्रकार कहकर कलिङ्गसेना उसी समय कौशाम्बी नगरी को गई ॥४४॥
वहाँ पर उद्यान में बैठे हुए और सोमप्रभा द्वारा दिखाये गये वत्सराज को उसने ऐसे देखा
जैसे चकोरी चन्द्रमा को देखती है ॥४५॥
कलिङ्गसेना खिली हुई आँखों से उसे देखती हुई हृदय पर हाथ रखकर मानों यह कहने
लगी कि 'यह आँखों के मार्ग से यहाँ कैसे घुस गया है ?' ॥४६॥
'यदि आज ही तू मुझे इससे मिला दे। मैं इसे देखकर अब एक क्षण भी नहीं ठहर
सकती' ॥४७॥
कलिङ्गसेना के ऐसा कहने पर सोमप्रभा बोली- आज मैंने कुछ अशुभसूचक शकुन
देखा है ॥४८॥
इसलिए आज के दिन तुम इस उद्यान में छिप कर रहो। अति दूर तक जाना-आना न
करना। एक ही स्थान पर चुपचाप बैठी रहो ॥४९॥
प्रातःकाल आकर तुम दोनों को मिलाने का कोई उपाय करूंगी। अपने स्वामी के हृदय
की घर में बनी हुई है सखी ! मैं तो अभी अपना घर जाना चाहती हूँ ॥५०॥
ऐसा कहकर और उसे उद्यान के एकान्त स्थान में ठहराकर सोमप्रभा चली गई।
और वत्सराज भी उद्यान से भवन को चला गया ॥५१॥
तब शकुन जाननेवाली सखी सोमप्रभा से रोके जाने पर भी कलिङ्गसेना ने अपने प्रतीहार
को वास्तविक बातें बताकर वत्सराज के पास सन्देश देकर भेजा और निवेदन किया—॥५२-५४॥
हे राजन् ! तक्षशिला के राजा कलिङ्गदत्त की कन्या कलिङ्गसेना तुम्हें अत्यधिक
सुन्दर समझकर अपने बन्धु-बान्धवों को छोड़कर, यन्त्रचालित विमान से अपने अनुचरों के साथ
तुम्हारा स्वयं वरण करने के लिए आई है। उसे मयासुर की आकाशचारिणी कन्या और नल-
कूबर की स्त्री सोमप्रभा ने यहाँ पहुँचाया है। उस राजकुमारी ने मुझे आपसे यह निवेदन करने।
के लिए भेजा है कि आप उसे स्वीकार करें। चन्द्र और चन्द्रिका के समान तुम दोनों का सुन्दर
समागम हो' ॥५५-५८॥