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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

प्रथम लम्बक ११५

प्रथम लम्बक ११५
उसी प्रकार प्रकट हुए शिवजी से मैंने सांसारिक भोगों की लिप्सा छोड़कर उनके गण
होने का वर माँगा ॥११० ॥
गिरिजापति शंकर भगवान् ने मुझे यह आदेश दिया कि चूंकि तुमने वन में उत्पन्न
हुए पुष्पों की मालाओं से मेरी पूजा की है, अतः तुम माल्यवान् नामक मेरे गण
होओ॥१११॥
तदनन्तर पवित्र मानव-शरीर को छोड़कर मैं तुरन्त शिवजी का गण बन गया। इस प्रकार
स्वयं शिवजी ने मेरा नाम माल्यवान् रखा था ॥११२॥
मैं पार्वती के शाप से इस मर्त्यलोक में पुनः मनुष्यत्व को प्राप्त हुआ। हे काणभूत !
अब तुम शिवजी की कही हुई उस कथा को कहो, जिससे मेरी और तुम्हारी—दोनों की
शापावस्था समाप्त हो ॥११३॥
महाकवि श्री सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का
सप्तम तरंग समाप्त

अष्टम तरंग

इस प्रकार गुणाढ्य के अनुरोधसे काणभूति ने अपनी पिशाच-भाषा में सात विद्याधरोंवाली
वह दिव्य कथा सुनाई जो उसने पुष्पदन्त (वररुचि) से सुनी थी ॥१॥
गुणाढ्य ने सात वर्षों में—सात लाख छन्दों में—पैशाची भाषा में कही गई कथा को
लिखा ॥२॥
इस कथा को कहीं विद्याधर हरण न कर लें और घोर जङ्गल में स्याही न मिलने के
कारण महाबुद्धिमान् गुणाढ्य ने उसे अपने रक्त से लिखा ॥३॥
इस कथा का सुनने के लिए आये हुए सिद्ध विद्याधर आदि से भरा हुआ आकाश ऐसा
मालूम होता था जैसे चँदोवा टँगा हो ॥४॥
गुणाढ्य द्वारा उस समस्त महाकथा के लिख जाने पर उसे देखकर काणभूति शापमुक्त
होकर अपनी पूर्वगति को प्राप्त हुआ अर्थात् यक्ष हो गया ॥५॥
काणभूति के साथ जो उनके साथी पिशाच इस दिव्य कथा को सुन रहे थे, वे भी
इसे सुनकर स्वर्ग चले गये ॥६॥
तदनन्तर महाकवि गुणाढ्य ने यह सोचा कि इस बात को अन्य बताते हुए
पार्वती ने मुझसे कहा था कि पृथ्वी पर इस कथा का प्रचार करना। सो अब
मैं इसका प्रचार कैसे करूँ और इसे किसे समर्पित करूँ जो इसका प्रचार कर
सके ॥७-८॥

१५

११४ कथासरित्सागर

११४ कथासरित्सागर
अथैको गुणदेवाख्यो नन्दिदेवाभिधः परः ।
तमूचतुरुपाध्याय शिष्यावनुगतावुभौ ॥९॥
तत्काव्यस्यार्पणस्थानमेकः श्रीसातवाहनः ।
रसिको हि वहेत्काव्यं पुष्पामोदमिवानिलः ॥१०॥
एवमस्त्विति तौ शिष्यावन्तिकं तस्य भूपतेः ।
प्राहिणोत्पुस्तकं दत्वा गुणाढ्यो गुणशालिनौ ॥११॥
स्वयं च गत्वा तत्रैव प्रतिष्ठानपुराद् बहिः ।
कृतसङ्केत उद्याने तस्थौ देवीविनिर्मिते ॥१२॥
तच्छिष्याभ्यां च गत्वा तत्सातवाहनभूपतेः ।
गुणाढ्यकृतिरेषेति दर्शितं काव्यपुस्तकम् ॥१३॥
पिशाचभाषां तां श्रुत्वा तौ च दृष्ट्वा तदाकृती ।
विद्यामदेन सासूयः स राजन्यमभाषत ॥१४॥
प्रमाणं सप्तलक्षाणि पैशाचं नीरसं वचः ।
शोणितेनाक्षरन्यासो धिक्पिशाचकथामिमाम् ॥१५॥
ततः पुस्तकमादाय गत्वा ताभ्यां यथागतम् ।
शिष्याभ्यां तद्गुणाढ्याय यथावृत्तमकथ्यत ॥१६॥
गुणाढ्योऽपि तदाकर्ण्य सद्यः खेदवशोऽभवत् ।
तत्त्वज्ञेन कृतावज्ञः को नामास्तं न तप्यते ॥१७॥
सशिष्यश्च ततो गत्वा नातिदूरं शिलोच्चयम् ।
विविक्तरम्यभूभागमग्निकुण्डं व्यधात्पुरः ॥१८॥
तत्राग्नौ पत्रमेकैकं शिष्याभ्यां साश्रु वीक्षितः ।
वाचयित्वा स चिक्षेप श्रावयन्मृगपक्षिणः ॥१९॥
नरवाहनदत्तस्य चरितं शिष्ययोः कृते ।
ग्रन्थलक्षं कथामेकां वर्जयित्वा सदीप्सिताम् ॥२०॥
तस्मिंश्च तां कथां दिव्यां पठत्यपि दहत्यपि ।
परित्यक्ततृणाहाराः शृण्वन्तः साश्रुलोचनाः ॥२१॥
आसन्नभ्येत्य तत्रैव निश्चला बद्धमण्डलाः ।
निर्जिताः पशवः सारङ्गवराहमहिषादयः ॥२२॥
अत्रान्तरे च राजाभूदस्वस्थः सातवाहनः ।
दोषं चास्यावदन् वैद्या दुष्कमांसोपभोगजम् ॥२३॥

प्रथम लम्बक ११५

प्रथम लम्बक ११५
तदनन्तर गुणदेव और नन्दिदेव नामक गुणाढ्य के दो शिष्यों ने गुरु गुणाढ्य
से कहा ॥९॥
इस काव्य के समर्पण का एकमात्र स्थान राजा सातवाहन है। वह रसिक है। वह, फूलों
की सुगन्ध को वायु जिस प्रकार फैला देती है उसी प्रकार इसका प्रसार और प्रचार कर
सकता है ॥१० ॥
'यही ठीक है'—ऐसा कहकर गुणाढ्य ने पुस्तक देकर उन दोनों गुणी शिष्यों को राजा
सातवाहन के पास भेज दिया ॥११॥
और स्वयं प्रतिष्ठान-नगर के बाहर देवी-उद्यान में मिलने का संकेत करके ठहर
गया ॥१२॥
गुणाढ्य के दोनों शिष्यों ने राजा सातवाहन के पास जाकर 'यह गुणाढ्य की रचना है' ऐसा
कहकर वह उत्तम काव्य दिखाया ॥१३॥
उस पिशाच-भाषा को सुनकर और उन दोनों शिष्यों को पिशाचाकार देखकर विद्या-
मदान्ध राजा ने द्वेष के साथ कहा—सात लाख छन्द, नीरस पिशाच-भाषा और रक्त से अक्षरों
का लेखन—ऐसी इस पिशाच-कथा को धिक्कार है ! ॥१४-१५॥
तब उन शिष्यों ने पुस्तक ले जाकर, जो कुछ हुआ था सब उस गुणाढ्य को सुना
दिया ॥१६॥
यह सब सुनकर गुणाढ्य को अत्यन्त खेद हुआ। तत्वज्ञ गुणग्राही व्यक्ति के द्वारा अपमान
होने पर किसका हृदय संतप्त नहीं होता ॥१७॥
गुणाढ्य भी शिष्यों को साथ लेकर समीपवर्ती पर्वत पर चला गया और एक साफ़-सुथरे
एकान्त स्थान में उसने एक अग्निकुण्ड बनाया ॥१८॥
गुणाढ्य बृहत्कथा के एक-एक पत्र को पढ़कर और मृग-पक्षियों को सुनाकर उसे आग
में बहा देता था। शिष्य आँखों से आँसू बहाकर उसकी ओर देखते थे ॥१९॥
शिष्यों के अनुरोध से नरवाहनदत्त-चरित नामक एक भाग को उसने बचा लिया जो
एक लाख श्लोकों में था ॥२०॥
जब गुणाढ्य उस दिव्य कथा के एक-एक पत्र को पढ़ रहा और जला रहा था उस समय
जंगल के सभी पशु-हिरन सूअर, भैंसे आदि—झुंड में निश्चल होकर और घास चरना छोड़
कर आँसू बहाते हुए कथा को सुन रहे थे ॥२१-२२॥
इसी बीच राजा सातवाहन अस्वस्थ हो गया। वैद्यों ने बताया कि इसका कारण सूखे
मांस का भोजन है ॥२३॥

आक्षिप्तास्तन्निमित्तं च सूपकारा बभाषिरे।
अस्माकमीदृशं मांसं ददते लुब्धका इति ॥२४॥
पृष्टाश्च लुब्धका ऊचुर्नातिदूरे गिरावितः।
पठित्वा पत्रमेकैकं कोऽप्यग्नौ क्षिपति द्विजः ॥२५॥
तत्समेत्य निराहारा शृण्वन्ति प्राणिनोऽखिलाः।
नान्यतो यान्ति तन्तेषां शुष्कं मांसमिदं क्षुधा ॥२६॥
इति व्याधवचः श्रुत्वा कृत्वा तानेव चाग्रतः।
स्वयं स कौतुकाद्राजा गुणाढ्यस्यान्तिकं ययौ ॥२७॥
ददर्श स समाकीर्णं जटाभिरनवभासतः।
प्रशान्तशेषदापाग्निधूमिकाभिरिवाभितः ॥२८॥
अथैनं प्रत्यभिज्ज्ञाय सवाष्पमृगमध्यगम्।
नमस्कृत्य च पप्रच्छ तं वृत्तान्तं महीपतिः ॥२९॥
सोऽपि स्वं पुष्पदन्तस्य राज्ञे शापादिवेष्टितम्।
ज्ञानी कथावतारं समाचख्यौ भूतभाषया ॥३०॥
ततो गणावतारं च मत्वा पादानतो नृपः॥
ययाचे तां कथां तस्माद्दिव्यां हरमुखोद्गताम् ॥३१॥
अथोवाच स तं भूपं गुणाढ्यः सातवाहनम्।
राजन् षड्ग्रन्थलक्षानि मया दग्धानि षट् कथाः ॥३२॥
लक्षमेकमिदं त्वस्ति कथैका सैव गृह्यताम्।
मच्छिष्यौ तव चात्रतौ व्याख्यातारौ भविष्यतः ॥३३॥
इत्युक्त्वा नृपमामन्त्र्य त्यक्त्वा योगेन तां तनुम्।
गुणाढ्यः शापनिर्मुक्तः प्राप दिव्यं निजं पदम् ॥३४॥
अथ तां गुणाढ्यदत्तामादाय कथां बृहत्कथां नाम्ना।
नृपतिरगाद्निजनगरं नरवाहनदत्तचरितमयीम् ॥३५॥
गुणाढ्यनन्दिदेवौ तत्र च तौ तत्कथाकवेः शिष्यौ।
स्थिति-कनक-वस्त्र-वाहन-भवन-धनैः सर्वभजत् सः ॥३६॥
ताभ्यां सह च कथां तामाश्वास्य च सातवाहनस्तस्याः।
तद्भाषायावतारं वक्तुं पत्र प्रथापीठम् ॥३७॥
सा च चित्ररसनिर्भरा कथा विस्मृतामरकथा कुतूहलात्।
तद्विधाय नगरे निरन्तरां ख्यातिमत्र भुवनत्रये गता ॥३८॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथामुखलम्बके अष्टमस्तरङ्गः।
समाप्तश्चायं कथामुखलम्बकः प्रथमः।

राजा को सूखा मांस खिलाने के लिए डाँटे गये रसोईदारों ने कहा कि इसमें हमारा क्या
अपराध है? बहेलिये जैसा मांस लाते हैं वही हम पकाते हैं ॥२४॥
शिकारी बहेलियों ने पूछने पर कहा कि यहाँ से समीप ही एक पहाड़ की चोटी पर कोई
ब्राह्मण एक-एक पत्र पढ़कर अग्नि में फेंक रहा है ॥२५॥
इसलिए जंगल के समस्त प्राणी एकत्र होकर और निराहार रहकर उसे सुनते हैं। कहीं
चरने के लिए नहीं जाते इसीलिए उनका मांस सूख गया है ॥२६॥
राजा व्याधों के इस प्रकार के वचन सुनकर और उन्हें ही आगे करके अत्यन्त कौतूहल
के साथ गुणाढ्य के पास गया ॥२७॥
राजा ने वनवास के कारण बढ़ी हुई जटाओं से आवृत गुणाढ्य को इस प्रकार देखा
मानों भस्मलेप धारण-रूपी अग्नि की पतली धूम-रेखाएँ लटक रही हैं ॥२८॥
आँसू बहाते हुए मृग-पक्षियों के मध्य बैठे हुए गुणाढ्य को पहचानकर राजा ने नमस्कार
किया और सब समाचार पूछा। गुणाढ्य द्वारा बृहत्कथा का वृत्तान्त सुनकर और गुणाढ्य को
माल्यवान् नामक शिव-गण का अवतार जानकर राजा पैरों पर गिर पड़ा और उसने शिवजी के
मुख से निकली हुई वह दिव्य कथा उससे माँगी ॥३०-३१॥
गुणाढ्य ने राजा सातवाहन से कहा—'राजन्, छह लाख श्लोकों में लिखी गई छह
कथाएँ मैंने जला दीं ॥३२॥
एक लाख श्लोक की एक कथा यह बची है—इसे ले लो। मेरे ये दोनों शिष्य इस कथा के
व्याख्याता होंगे ॥३३॥
ऐसा कहकर और योग-समाधि द्वारा अपने मानव-शरीर का त्याग कर शाप-मुक्त
गुणाढ्य ने अपने पूर्व पद को प्राप्त किया ॥३४॥
तदनन्तर राजा सातवाहन गुणाढ्य द्वारा दी गई नरवाहनदत्त-चरितमयी बृहत्कथा नामक
वह कथा प्रसन्नतापूर्वक लेकर अपने नगर में आया ॥३८॥
राजा ने नगर में आकर, गुणाढ्य के शिष्य गुणदेव और नन्दिदेव को भूमि धन वस्त्र
वाहन भवन धन आदि देकर उनकी सेवा की ॥३९॥
राजा सातवाहन ने उन दोनों शिष्यों की सहायता से उस कथा के प्रचार के लिए उसका
देश-भाषा में अनुवाद कराकर कथापीठ की रचना की ॥४०॥
विचित्र रसों से परिपूर्ण एवं देव-कथाओं को भुला देनेवाली यह कथा नगर में निरन्तर
प्रसिद्ध होती हुई क्रमशः सारे भूमण्डल में प्रसिद्ध हो गई ॥४१॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्टविरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का अष्टम तरंग समाप्त
कथासरित्सागर का प्रथम लम्बक समाप्त

कथामुख नाम द्वितीयो लम्भकः

कथामुख नाम द्वितीयो लम्भकः
५८ गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना
त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्।
प्रसह्य रसयन्ति ये विगतविघ्नलब्धोदयं
धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते॥
प्रथमस्तरङ्गः
सहस्रानीककथा
गौरीनखपरिश्वङ्ग विमो स्वेदाम्बु पातु वः।
नेत्रान्निमील्या कामेन बाणशास्त्रमिवाहितम्॥१॥
कैलासे धूर्जटेर्वक्त्रात्पुष्पदन्तं गणोत्तमम्।
तस्माद् वररुचीभूतात् काणभूतिं च भूतले॥२॥
काणभूतेर्गुणाढ्यं च गुणाढ्यात्सातवाहनम्।
यत्प्राप्तं शृणुतै तच्च विद्याधरकथाद्भुतम्॥३॥
अस्ति वत्स इति ख्यातो देशो दर्पोच्छ्रितश्रिये।
स्वर्गस्य निर्मितो धात्रा प्रतिमल्ल इव क्षितौ॥४॥
कौशाम्बी नाम तत्रास्ति मध्यभागे महापुरी।
लक्ष्मीविलासवसतिर्भूतलस्येव कर्णिका॥५॥
तस्यां राजा शतानीकः पाण्डवान्वयसम्भवः।
जनमेजयपुत्रोऽभूत्पौत्रो राज्ञः परीक्षितः॥६॥
अभिमन्युप्रपौत्रश्च यस्याविपुष्टयोर्जुनः।
त्रिपुरारि भुजस्तम्भ दृष्ट दोर्दण्डविक्रमः॥७॥
अभवद् भूरिभूतस्य राज्ञी विष्णुमती तथा।
एका रत्नानि सुपुवे न तावदपरा सुतम्॥८॥

कथामुख नामक द्वितीय लम्बक

कथामुख नामक द्वितीय लम्बक
(मङ्गल-श्लोक का अर्थ ग्रन्धारम्भ के प्रथम पृष्ठ पर देखना चाहिए)
प्रथम तरङ्ग
राजा सहस्रानीक की कथा
पार्वती के प्रथम आलिङ्गन के समय उत्पन्न शिवजी के स्वेद-कण आपकी रक्षा करें जो
स्वेद-कण ऐसे मालूम होते हैं मानों कामदेव ने शिवजी के नेत्र की अग्नि के भय से उनपर वारुणास्त्र
छोड़ा हो¹॥१॥
कैलाश में शिवजी के मुख से पुष्पदन्त गण को, पृथ्वी पर वररुचि के रूप में अवतीर्ण पुण्य
दन्त से काणभूति को, काणभूति से गुणाढ्य को और गुणाढ्य से राजा सातवाहन को क्रमशः
प्राप्त इस विद्याधर-कथा² रूपी अमृत को सुनिए ॥२, ३॥
स्वर्ग के अभिमान को दूर करने के लिए विधाता द्वारा सची के समान पृथ्वी पर निर्माण
किया गया वत्स नामक देश है॥४॥
उस देश के मध्यभाग में अत्यन्त समृद्ध कौशाम्बी नाम की नगरी भूमि की कर्णिका
(कर्णभूषण) के समान है॥५॥
उस नगरी में पाण्डव-वंश में उत्पन्न शतानीक नामक राजा राज्य करता था जो जनमेजय
का पुत्र, परीक्षित् का पौत्र और अभिमन्यु का प्रपौत्र था। इस वंश का आदि पुरुष अर्जुन था
जिसने शिवजी के स्तम्भ के समान बाहुदण्डों का पराक्रम देखा था॥६-७॥
उस शतानीक की दो रानियां थीं। एक (पृथ्वी) रत्नों को उत्पन्न करती थी, किन्तु
दूसरी ने पुत्र को उत्पन्न नहीं किया॥८॥
१ शिवजी के तृतीय नेत्र की अग्नि-ज्वाला से कामदेव भस्म हो गया था। अतः पुनः
उनके संवग के समय उसने आप बुझाने के लिए अग्नि-विरोधी वारुणास्त्र का रखना आवश्यक
समझा जो जलमय है। नववधू के नव समागम में स्वेद का अधिक मात्रा में होना स्वाभाविक है।
अतः, कवि ने उस पर जलमय वारुणास्त्र की सुन्दर उत्प्रेक्षा की है।
२ श्रद्धेय और प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा कही गई बातें आदरणीय होती हैं, ऐसी
शिष्ट-परम्परा है। उसी के अनुसार इस विद्याधर-कथा की प्रामाणिकता के लिए गुणाढ्य ने उसकी
महत्त्वपूर्व परम्परा की सूचना दी है कि यह कथा मेरी कल्पित नहीं प्रत्युत इसका उद्गम भगवान्
शिव के मुख से हुआ है।—अनु.

कथामुखं नाम द्वितीयो लम्बकः

कथामुखं नाम द्वितीयो लम्बकः
१५ गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना
त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्।
प्रसङ्ग रसयन्ति य विगतविघ्नलब्धर्द्धय
धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ये ॥

प्रथमस्तरङ्गः
सहस्रानीककथा
गौरीनवपरिष्वङ्गे विभो र्स्वेदाम्बु पातु वः।
नेत्राग्निभीरुणा कामेन वारुणास्त्रमिवाहितम् ॥१॥
कैलास धूर्जटेर्वक्त्रात्पुष्पदन्त गणोत्तमम्।
तस्माद् वररुचीभूतात् काणभूतिं च भूतले ॥२॥
काणभूतेर्गुणाढ्यं च गुणाढ्यात्सातवाहनम्।
यत्प्राप्तं शृणुतेदं तच्च विद्याधरकथामृतम् ॥३॥
अस्ति वत्स इति ख्यातो देशो दर्पोपशाम्यये।
स्वर्गस्य निर्मितो धात्रा प्रतिमल्ल इव क्षितौ ॥४॥
कौशाम्बी नाम तत्रास्ति मध्यभागे महापुरी।
लक्ष्मीविलासकसतिर्भूतलस्येव कर्णिका ॥५॥
तस्यां राजा शतानीकः पाण्डवान्वयसम्भवः।
जनमेजयपुत्रोऽभूत्पौत्रो राज्ञः परीक्षितः ॥६॥
अभिमन्युप्रपौत्रश्च यस्यादिपुरुषोऽर्जुनः।
त्रिपुरारि भुजस्तम्भ धृष्ट दोर्दण्डविक्रमः ॥७॥
कलत्रं भूरभूत्तस्य राज्ञी विष्णुमती तथा।
एका रहसि सुषुवे स तावदपरा सुतम् ॥८॥

कथामुख नामक द्वितीय लम्बक

कथामुख नामक द्वितीय लम्बक
(मङ्गल-श्लोक का अर्थ ग्रन्थारम्भ के प्रथम पृष्ठ पर देखना चाहिए)
प्रथम तरंग
राजा सहस्रानीक की कथा
पार्वती के प्रथम आलिङ्गन के समय उत्पन्न शिवजी के स्वेद-कण आपकी रक्षा करें जो
स्वेद-कण ऐसे मालूम होते हैं मानो कामदेव ने शिवजी के नेत्र की अग्नि के भय से उनपर बाणत्रास
छोड़ा हो¹॥१॥
कैलास में शिवजी के मुख से पुण्यवन्त गण को पृथ्वी पर वररुचि के रूप में अवतीर्ण पुण्य
गण से काणभूति को काणभूति से गुणाढ्य को और गुणाढ्य से राजा सातवाहन को क्रमशः
प्राप्त इस विद्याधर-कथा² रूपी अमृत को सुनिए ॥२-३॥
स्वर्ग के अभिमान को दूर करने के लिए विधाता द्वारा उसी के समान पृथ्वी पर निर्माण
किया गया वत्स नामक देश है ॥४॥
उस देश के मध्यभाग में अत्यन्त समृद्ध कौशाम्बी नाम की नगरी भूमि की कर्णिका
(कर्णभूषण) के समान है॥५॥
उस नगरी में पाण्डव-वंश में उत्पन्न शतानीक नामक राजा राज्य करता था जो जनमेजय
का पुत्र परीक्षित का पौत्र और अभिमन्यु का प्रपौत्र था। इस वंश का आदि पुरुष अर्जुन था
जिसने शिवजी के स्तम्भ के समान बाहुदण्डों का पराक्रम देखा था ॥६-७॥
उस शतानीक की दो रानियाँ थीं। एक (पृथ्वी) रत्नों को उत्पन्न करती थी किन्तु
दूसरी ने पुत्र को उत्पन्न नहीं किया ॥८॥
१ शिवजी के तृतीय नेत्र की अग्नि-ज्वाला से कामदेव भस्म हो गया था। अतः पुनः
उनके संगम के समय उसने आग बुझाने के लिए अग्नि-विरोधी बाणशस्त्र का रचना आवश्यक
समझा जो जलमय है। नववधू के नव समागम में स्वेद का अधिक मात्रा में होना स्वाभाविक है।
अतः, कवि ने उस पर जलमय बाणशस्त्र की सुन्दर उत्प्रेक्षा की है।
२ श्रद्धेय और प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा कही गई बातें आदरणीय होती हैं ऐसी
शिष्ट-परम्परा है। उसी के अनुसार इस विद्याधर-कथा की प्रामाणिकता के लिए गुणाढ्य ने उसकी
शृङ्खलापूर्ण परम्परा की सूचना दी है कि यह कथा मेरी कल्पित नहीं प्रत्युत इसका उद्गम भगवान्
शिव के मुख से हुआ है।—अनु.

एकदा मृगयासङ्गाद् भाग्यवशाच्चास्य भूपतेः ।
अभूच्छाण्डिल्यमुनिना समं परिचयो वने ॥९॥
सोऽप्य पुत्रार्थिनो राज्ञः कौशाम्बीमेत्य साक्षितम् ।
मन्त्रपूतं चरं राज्ञीं प्राधायन्मुनिसत्तमः ॥१०॥
सनस्तस्य सुतो जज्ञे सहस्रानीकसंज्ञकः ।
शुशुभे स पिता तेन विनयन गुणो यथा ॥११॥
यवराज्ञं क्रमात्कृत्वा शतानीकोऽथ तं सुतम् ।
सम्भोगैरैव राजाभून्न तु भूभारखिन्नधीः ॥१२॥
अथासुरैः समं युद्धे प्राप्ते साहाय्यकञ्च्छया ।
दूतमस्त्यं विमुञ्चोभूदिन्द्रो यत्प्रण मातलिः ॥१३॥
सतां युगन्धराख्यस्य हस्ते धूपम्य मन्त्रिणः ।
सुप्रतीकाभिधानस्य मुख्यमन्तान्तरस्य च ॥१४॥
समर्प्य पुत्रं राज्यं च निहन्तुममुरान् रणे ।
शक्रान्तिकं शतानीकः सह मातलिना ययौ ॥१५॥
अगुणन् यमदंष्ट्रानीन्यहन्प्रत्यति यागवे ।
हत्वा तत्रत्यं गत्वाशं प्राप भूत्युं स भूपतिः ॥१६॥
मातन्यानोयवेहं च देवी तं नृपमन्वगात् ।
राज्यलक्ष्मीश्च तत्पुत्रं सहस्रानीकमश्रयत् ॥१७॥
पित्र्यं तस्मिन्गतान्द्रे पित्र्यं सिंहासनं नृपः ।
भरन् शक्ता गजा दिक्षु भनिमाययुः ॥१८॥
सन्तं चरा गृह्णन्तु वियोगिप्रशयोगतम् ।
न्यस्य गङ्गाशनात्स विनाय प्रत्यं मातलिम् ॥१९॥
स तत्र मन्दनं दक्षान् क्रीडन् कामिनीगणान् ।
दृष्ट्वा वियोगिनिभार्यार्थी राजा शर्मविवाविन्दत् ॥२०॥
विद्याधामभिश्राय गन्धर्वाणां यागवे ।
गन्धर्वश्च विशाखः प्रादुर्बभूव तव योगतः ॥२१॥
उत्पन्ना किरिणो भार्या तुल्या सा पूर्वनिर्मिता ।
इयं च शृणु वृत्तान्तमथ स वक्तुमारभत् ॥२२॥
मृगावतीविवाहप्रबन्धः
पुरं त्रिभुवने श्लाघ्यामलकाख्यं जगत्त्रयम् ।
रिपुभ्यो नाम यस्याश्च ममरूश्चाप्युपागमत् ॥२३॥

द्वितीय लम्बक १२१

द्वितीय लम्बक १२१
एक बार शिकार खेलने के सिलसिले में उस राजा का वन में शाण्डिल्य मुनि के साथ परिचय
हुआ ॥९॥
शाण्डिल्य मुनि ने कौशाम्बी में आकर पुत्र की इच्छावाले राजा की रानी को मन्त्र से
पवित्र चरु¹ खिलाया ॥१०॥
शाण्डिल्य मुनि की कृपा से शतानीक को सहस्रानीक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उससे पिता
ऐसा शोभित हुआ जैसे विनय से गुण शोभित होता है ॥११॥
क्रमशः शतानीक सहस्रानीक को युवराज बनाकर, केवल राज्यसुख भोगने के लिए
राजा रह गया। राज्यकार्य की चिन्ता से मुक्त हो गया था ॥१२॥
कुछ समय के अनन्तर असुरों के साथ युद्ध प्रारम्भ होने पर इन्द्र ने सहायता की इच्छा से
उसके लिए अपने सारथी मातलि को दूत बनाकर भेजा ॥१३॥
तब शतानीक राज्य-शासन का समस्त भार युगन्धर नाम के मुख्यमन्त्री सुप्रतीक नामक
प्रधान सेनापति तथा युवराज सहस्रानीक पर देकर मातलि के साथ इन्द्र के समीप गया ॥१४-१५॥
इन्द्र के देखते-देखते यमदंष्ट्र आदि बहुत-से असुरों को उस युद्ध में मारकर वह राजा शतानीक
स्वयं भी मर गया ॥१६॥
मातलि द्वारा उसका शव राजधानी में ले आने पर महारानी उसके साथ सती हो गई
और राजलक्ष्मी ने उसके पुत्र सहस्रानीक का आश्रय किया। (अर्थात् सहस्रानीक राजा
बन गया) ॥१७॥
आश्चर्य है कि सहस्रानीक के पिता के सिंहासन पर बैठते ही भार से राजाओं के सिर
झुक गये अर्थात् सिंहासन को भग्न होना चाहिए, किन्तु राजाओं के सिर नम्र हो गये यह आश्चर्य
है ॥१८॥
असुर-विजय के उपलक्ष्य में किये गये उत्सव के समय इन्द्र ने अपने मित्र के पुत्र सहस्रानीक
को मातलि द्वारा (रथ भेजकर) स्वर्ग में बुलवाया ॥१९॥
स्वर्ग में रहते हुए सहस्रानीक प्रियतमाओं के साथ नन्दन-वन में विहार करते हुए
देवताओं को देखकर, अपने लिए अनुरूप पत्नी की चाह में कुछ शोकयुक्त-सा हो गया ॥२०॥
इन्द्र ने राजा शतानीक के मनोभाव को समझकर कहा—'राजन्! शोक न करो
तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी ॥२१॥
राजन् ! तुम्हारे पूर्वजन्म की भार्या जो तुम्हारे अनुरूप है, पृथ्वी पर जन्म ले चुकी है।
इस वृत्तान्त को कहता हूँ सुनो' ॥२२॥
रानी मृगावती के विवाह की कथा
प्राचीन समय में पितामह (ब्रह्मा) का दर्शन करने के लिए मैं उनकी सभा में गया था।
मेरे ही पीछे विधूम नाम का एक वसु भी सभा में आ गया ॥२३॥
१ चावल, चीनी और दूध मिला हुआ हवन-द्रव्य।
१६

१२२ कथासरित्सागर

१२२ कथासरित्सागर

स्थितेष्वस्मासु तत्रैव विरिञ्चि द्रष्टुमप्सराः।
आगादलम्बुषा नाम वातविस्रंसितांशुका ॥२४॥
तां दृष्ट्वैव स कामस्य वशं वसुरपागमत्।
साप्यप्सरा भगिर्यासीत्तद्रूपाकृष्टलोचना ॥२५॥
तदालोक्य ममापद्यन्मुखं कमलसम्भवः।
अभिप्रायं विदित्वास्थ तावहं शप्तवान् क्रुधा ॥२६॥
मर्त्यलोकेऽवतारेऽस्तु युवयोरविनीतयोः।
भविष्यथश्च तत्रैव युवां भार्यापती इति ॥२७॥
स वसुस्त्वं समुत्पन्नः सहस्रानीकभूपते !
शतानीकस्य तनयो भूषणं शशिनः कुले ॥२८॥
साप्यप्सरा ह्ययोध्यायां कृतवर्मनृपात्मजा।
जाता मृगावती नाम सा ते भार्या भविष्यति ॥२९॥
इतीन्द्रवाक्यपवनेनेद्धभूतो हृदि भूपतेः।
हृत्स्नेहे तस्य भृगिति प्राज्वलन्मदनानतः ॥३०॥
सतं सम्मान्य शक्रेण प्रेषितस्तद्रथेन सः।
सह मातलिना राजा प्रतस्थे स्वां पुरीं प्रति ॥३१॥
गच्छन्तं चाप्सरा प्रीत्या समुवाच तिलोत्तमा।
राजन्वक्ष्यामि तं किञ्चित्प्रतीक्षस्व मनागिति ॥३२॥
तदश्रुत्वैव हि ययौ स तां ध्यायन्मृगावतीम्।
ततः सा लज्जिता कोपात्तं शशाप तिलोत्तमा ॥३३॥
यया हृतमना राजन्न शृणोषि वचो मम।
तस्याश्चतुर्वत्सरसमा वियोगस्ते भविष्यति ॥३४॥
मातलिस्तच्च शुश्राव न च राजा प्रियोत्सुकः।
ययौ रथेन कौशाम्बीमयोध्यां मनसा पुनः ॥३५॥
ततो युगन्धरादिभ्यो मन्त्रिभ्यो वासवाच्छ्रुतम्।
मृगावतीगतं सर्वं शशंसोत्सुकया धिया ॥३६॥
याचितुं तां स कन्यां च ह्यतिष्ठतु कृतवर्मणः।
मयोध्यां प्राहिणोद्दूतं बास्नेपासहो नृपः ॥३७॥
कृतवर्मा च तद्भूताच्छ्रुत्वा सम्पदामभ्यधात्।
हृपदेिव्य शतावत्यै ततः साप्यममब्रवीत् ॥३८॥

द्वितीय लम्बक १२५

द्वितीय लम्बक १२५
हमारे वहाँ बैठे रहते ही अलम्बुषा नाम की एक अप्सरा ब्रह्मा के दर्शनार्थ वहाँ आई,
उसका वस्त्र वायु से कुछ खिसक गया इधर-उधर हो गया ॥२४॥
उसे देखकर वह विभूम वसु कामातुर हो गया और वह (अलम्बुषा) भी उसके रूप की
ओर आँखों के खिंच जाने से स्तब्ध-सी (ठगी-सी) रह गई ॥२५॥
उन दोनों की इस स्थिति को देखकर ब्रह्मा ने मेरी ओर देखा। मैंने भी उनके अभिप्राय को
समझकर, क्रुद्ध होकर उन दोनों को शाप दिया ॥२६॥
शाप यह दिया कि 'तुम्हारा जन्म मर्त्यलोक में पति-पत्नी के रूप में होगा। इस शाप के
कारण हे राजन्, तुम चन्द्रवंश में राजा शतानीक के पुत्र हुए और वह अप्सरा अयोध्या के
राजा कृतवर्मा की मृगावती नामक कन्या के रूप में अवतीर्ण हुई है। वही तुम्हारी
पत्नी होगी' ॥२७-२८-२९॥
राजा के स्नेहयुक्त हृदय में पहले से ही सुलगता हुआ मदनानल इन्द्र की बातों से प्रेरित
होकर तुरन्त प्रज्वलित हो उठा ॥३०॥
तदनन्तर इन्द्र के द्वारा भली भाँति स्वागत प्राप्त करके इन्द्र के ही रथ से भेजा गया राजा
सहस्रानीक मातलि के साथ अपनी नगरी को लौट आया ॥३१॥
जाते हुए राजा से तिलोत्तमा नाम की अप्सरा ने प्रेमपूर्वक कहा—'हे राजन् ! जरा
ठहरो, मैं तुमसे कुछ कहूँगी' ॥३२॥
मृगावती के ध्यान में निमग्न राजा ने तिलोत्तमा का कथन नहीं सुना। इसलिए उसने
कुपित होकर राजा को शाप दिया ॥३३॥
'हे राजन् ! जिस मृगावती में आकृष्टचित्त होकर तू मेरी बात नहीं सुन रहा है, उसका
तुझे चौदह वर्षों तक वियोग होगा' ॥३४॥
तिलोत्तमा के शाप को मातलि ने सुना, राजा ने नहीं। प्रिया के लिए उत्सुक वह राजा
रथ से कौशाम्बी और मन से अयोध्या पहुँचा ॥३५॥
राज्य में पहुँचकर राजा ने मृगावती के सम्बन्ध में इन्द्र से सुना हुआ समस्त वृत्तान्त उत्सुक
मन से युगन्धर आदि मन्त्रियों को कह सुनाया ॥३६॥
और विलम्ब को न सहन कर सकनेवाले राजा ने उस कन्या (मृगावती) की मैंगनी के
लिए अयोध्या में राजा कृतवर्मा के समीप दूत भेजा ॥३७॥
दूत द्वारा सहस्रानीक के सन्देश को सुनकर राजा कृतवर्मा ने हर्ष में यह संवाद अपनी रानी
कलावती से कहा ॥३८॥

१२४ कथासरित्सागर

१२४ कथासरित्सागर
राजन्महस्रानीकाय देयावश्यं मृगावती।
इममर्थं च मे स्वप्ने जाने कोऽप्यवदद्द्विजः ॥३९॥
अथ दृष्टो मृगावट्या नृत्तगीतादिकौशलम्।
रूपं चाप्रतिमं तस्मै दूतायादर्शयन्नृपः ॥४०॥
ददौ तां च स कान्तानां वल्लभा मेकमास्पदम्।
कृतवर्मा सुतां तस्मै राज्ञे मूर्तिमिवेद्वीम् ॥४१॥
परस्परगुणावाप्त्यै स श्रुतप्रज्ञयोरिव।
अभूत्सहस्रानीकस्य मृगावट्याश्च सङ्गमः ॥४२॥
अथ तस्याचिराद्राज्ञो मन्त्रिणां जज्ञिरे सुताः।
जज्ञे युगन्धरस्यापि पुत्रो यौगन्धरायणः ॥४३॥
सुप्रतीकस्य पुत्रश्च रुमण्वानित्यजायत।
योऽन्य नर्मसुहृत्तस्य पुत्रोऽजनि वसन्तकः ॥४४॥
ततस्तस्यापि विवसे सहस्रानीकभूपतेः।
बभार गर्भमापाण्डुमुखी राज्ञी मृगावती ॥४५॥
ययाचे साच भर्तारं दर्शनावृतलोचनम्।
दोहदं रुधिरापूर्णशीलावापीनिमज्जनम् ॥४६॥
स चेच्छां पूरयन् राज्ञ्या लाक्षाविरसनिर्भरम्।
चकार धार्मिको राजा बापीं रक्तामृतामिव ॥४७॥
तस्यां स्नान्तीमकस्माच्च लाक्षालिप्तां निषत्य ताम्।
गरुडान्त्रयः पक्षी जहाराभिपदङ्कया ॥४८॥
पक्षिणा क्वापि नीतां तामन्वेष्टुमिव तत्क्षणम्।
ययौ सहस्रानीकस्य धैयं विह्वलचेतसः ॥४९॥
प्रयानुरक्तं चेतोऽपि नूनं तस्य पतत्रिणा।
जह्रे यन्न स निस्सञ्ज्ञः पपात भुवि भूपतिः ॥५०॥
क्षणाच्च व्यध्वसन्नेऽस्मिन् राज्ञि बुद्ध्या प्रमावतः।
अवतीर्य द्युमार्गेण तं मातलिराययौ ॥५१॥
स राजानं समाश्वास्य सर्वार्थं प्राग्यथा धृतम्।
तस्मै तिलोत्तमाशापं कथयित्वा ततोजगम् ॥५२॥
हा प्रिये पूर्णकामा सा जाता पापा तिलोत्तमा।
इत्यादि च स शोकार्तो विप्रलाप महीपतिः ॥५३॥

द्वितीय लम्बक १९५

द्वितीय लम्बक १९५
रानी ने भी कहा कि 'राजन् ! मृगावती को सहस्रानीक के लिए अवश्य देना चाहिए।
यह बात स्वप्न में मुझे किसी ब्राह्मण ने कही है ऐसा मालूम होता है' ॥३९॥
रानी की सम्मति प्राप्त कर प्रसन्नचित्त राजा ने दूत को मृगावती का याचना माना तथा
उसका अप्रतिम रूप दिखाया ॥४०॥
अनुकूल समय में राजा कृतवर्मा ने कमनीय ललित कलाओं की एकमात्र आधार चन्द्रमा
की मूर्तिमयी प्रतिमा के समान सुन्दरी उस कन्या मृगावती को विधिपूर्वक राजा शतानीक के
लिए दे दिया ॥४१॥
जिस प्रकार शास्त्र और बुद्धि का संगम परस्पर आदान-प्रदान के लिए होता है उसी
प्रकार सहस्रानीक और मृगावती का समागम भी परस्पर गुणों के आदान-प्रदान के लिए हुआ ॥४२॥
कुछ समय के अनन्तर राजा के मन्त्रियों के पुत्र उत्पन्न हुए। प्रधान मन्त्री युगन्धर का पुत्र
यौगन्धरायण सेनापति सुप्रतीक का पुत्र रुमण्वान् और राजा के नर्म सचिव (विदूषक) का पुत्र
वसन्तक नामक हुआ ॥४३-४४॥
कुछ दिनों के अनन्तर राजा सहस्रानीक की पीत मुखवाली पत्नी मृगावती ने भी गर्भ
धारण किया ॥४५॥
गर्भ-धारण के अनन्तर रानी ने रुधिर से भरी हुई तड़ाग-वापी में गोता लगाने की इच्छा
उस राजा से प्रकट की जिस (राजा को) देखते-देखते उसकी आँखें तृप्त नहीं होती थीं ॥४६॥
धार्मिक राजा सहस्रानीक ने रानी की इच्छा-पूर्ति के लिए लाख आदि लाल वस्तुओं के
लाल रस से भरी बावली बनवाई जो रक्त से भरी मालूम होती थी ॥४७॥
उस लाल वापी में स्नान करती हुई लाल लाख के रस से लिपटी हुई रानी को देखकर
गरुड़-वंश के किसी पक्षी १ ने मांसपिंड समझकर उठा लिया ॥४८॥
महावीर्यवान पक्षी द्वारा उड़ाकर ले जाई गई रानी को ढूंढ़ने के लिए व्याकुलचित्त
राजा सहस्रानीक का धैर्य नष्ट हो गया ॥४९॥
उस पक्षी ने केवल रानी को ही नहीं रानी के प्रति अनुरक्त राजा के चित्त का भी हरण
कर लिया। इसी कारण राजा मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर गया ॥५०॥
कुछ समय के अनन्तर राजा के सचेत होने पर अपने प्रभाव से स्थिति को समझकर मातलि
आकाश-मार्ग से उतरकर राजा के पास आया ॥५१॥
मातलि ने राजा को आश्वासन देते हुए पूर्व समय में तिलोत्तमा द्वारा दिये गये शाप का
वृत्तान्त और चौदह वर्ष की अवधि का समाचार सुनाया। राजा के कुछ स्वस्थ होने पर मातलि
पुनः स्वर्ग को चला गया ॥५२॥
'हा प्रिये अब उस पापिन तिलोत्तमा का मनोरथ पूर्ण हो गया'—इस प्रकार शोक-विह्वल
राजा विलाप करता रहा ॥५३॥
१ अरेबियन नाइट्स में सिंदबाद जहाजी की कहानी में ऐसे पक्षी का वर्णन आता है।
कुछ लोग इसे कल्पित पक्षी मानते हैं। पर्वतों में ऐसे पक्षी दीखते हैं; जो बड़े-बड़े साँपों और
पशुओं के बच्चों को उठा ले जाते हैं। —अनु.

१२६ कथासरित्सागर

१२६ कथासरित्सागर
विज्ञातद्यापवृत्तान्तो बोधितश्च स मन्त्रिभिः।
कथञ्चिज्जीवितं दध्रे पुन' सङ्गमवाञ्छया ॥५४॥
तां च राज्ञीं स पक्षीन्द्रः क्षणात्रीत्वा मृगावतीम्।
जीवन्तीं वीक्ष्य तत्याज देवादुदयपर्वते ॥५५॥
त्यक्त्वा तस्मिन्गते चाथ राज्ञी शोकमयाकुला।
ददर्शनात्मानमात्मानं दुर्गेमाद्रितटस्थितम् ॥५६॥
एकाकिनीमकवस्त्रां क्रन्दन्तीमथ तां वने।
ग्रासीकर्तुं प्रवृत्तोऽभूदुत्थायाजगरो महान् ॥५७॥
निहत्याजगरं तं च शुमोदकां क्षमव सा।
दिव्येन मोहिता पुंसा दृष्टनष्टेन कनचित् ॥५८॥
ततो वनगजस्याग्रे सा स्वयं मरणार्थिनी।
आत्मानमक्षिपत्सोऽपि ररक्ष दययेव ताम् ॥५९॥
चित्रं यच्छ्वापदोऽप्येनां पतितामपि गोचरे।
नावधीन्मघवा किं हि न भवदीश्वरेच्छया ॥६०॥
अथ प्रपाताभिमुखी बाला गर्भभराल्लसा।
स्मरन्ती तं च भर्तारं मुक्तकण्ठं रुरोद सा ॥६१॥
तच्छ्रुत्वा मुनिपुत्रोऽथ तत्रैकस्तां समाययौ।
आगतः फलमूलार्थं कृपा मूर्तिमतीमिव ॥६२॥
स च पृष्ट्वा यथानृत्तमाश्वास्य च कृशाम्पन्।
जमदग्न्याश्रमं राज्ञीं निनायैनां दयार्द्रधीः ॥६३॥
तत्र मूर्त्तमिवोद्दाम जमदग्निं ददर्श सा।
तेजसा स्थिरबालाके कुर्व्वाणमुदयाचलम् ॥६४॥
गोत्रेण तां परिज्ञातां मुनिराधीतवत्सलः।
राज्ञीं वियोगदुःखार्त्तां दिव्यदृष्टिरभाषत ॥६५॥
इह ते जनिता पुत्रि ! पुत्रः शतपरः पितुः।
भविष्यति च भर्त्ता ते सङ्गमो मा शुचं कृथाः ॥६६॥
इत्युक्त्या मुनिना साध्वी सा जगाद मृगावती।
प्रापमेत्यस्थितिं तस्मिन्प्राणां च प्रियसङ्गमे ॥६७॥
उदयनजन्मक्रथा
तत्रैषा न्यवसन्नन्दं दयापनीयमनिन्दिता।
मन्दकुक्षिगियापारं पुत्ररत्नमसूत सा ॥६८॥

द्वितीय लम्बक १२७

द्वितीय लम्बक १२७
तिलोत्तमा के शाप का समाचार जानता हुआ और मन्त्रियों द्वारा समझाया-बुझाया गया
राजा किसी प्रकार आश्वस्त हुआ ॥५४॥
उधर वह पक्षिराज भी रानी को उड़ाकर ले गया किन्तु जीवित देखकर उसने उदय
पर्वत पर उसे (रानी को) छोड़ दिया ॥५५॥
छोड़कर पक्षी के चले जाने पर, शोक और भय से व्याकुल रानी ने दुर्यम पर्वत पर अपने
को अनाथ पाया ॥५६॥
अनन्तर एक वस्त्र पहने हुई जंगल म रोती हुई उस एकाकिनी रानी को खाने के लिए
एक भारी अजगर तैयार हुआ ॥५७॥
सहसा दिखकर अन्तर्हित हुए किसी दिव्य पुरुष ने अजगर को मारकर उस शुभ भविष्य-
वाली रानी की रक्षा की ॥५८॥
रानी ने दुख के कारण स्वयं मरने की इच्छा से जंगली हाथी के सामने अपना शरीर
फेंक दिया (अपने को डाल दिया) किन्तु मानों दया से उसने भी रानी की रक्षा की ॥५९॥
आँखों के सामने पड़ी हुई रानी को इस जन्तु (हाथी) ने नहीं मारा यह आश्चर्य है !
ईश्वर की इच्छा से क्या नहीं हो सकता ॥६०॥
इसके अनन्तर गर्भभार से अलसायी हुई और पतन (गिरकर प्राण देने) के लिए तैयार
वह कोमल बालिका फूट-फूटकर रोने लगी ॥६१॥
उसके करुण क्रन्दन को सुनकर फल-मूल संग्रह करते हुए एक मुनिपुत्र ने मूर्तिमती शोक-
रेखा के समान उस रानी को देखा ॥६२॥
दयालु मुनिकुमार रानी से सब वृत्तान्त सुनकर और उस किमी प्रकार धीरज बँधाकर,
जमदग्नि ऋषि के आश्रम में ले गया ॥६३॥
वहाँ पर उसने मूर्तिमान् आश्वासन के समान तेज से उदयाचल पर मानों बालार्क को स्थिर
करत हुए जमदग्नि को देखा ॥६४॥
शरणागतों पर दया करनेवाले दिव्यदृष्टि ऋषि ने पैरों पर पड़ी हुई एवं वियोग-दुःख से
पीड़ित रानी को कहा—'बेटी ! अपने पिता के वंश को चलानेवाला तेरा पुत्र इसी आश्रम में
उत्पन्न होगा और पति के साथ तेरा समागम भी होगा। अब शोक मत करो' ॥६५-६६॥
जमदग्नि मुनि द्वारा इस प्रकार आश्वस्त पतिव्रता मृगावती ने प्रिय पति के समागम की
आशा के साथ-साथ उस आश्रम में निवास स्वीकार किया ॥६७॥
उदयन के जन्म की कथा
कुछ दिनों के बीतने पर सदाचारिणी मृगावती ने सार्वभौम मदाचार के समान अनेक गुणों
से युक्त पुत्ररत्न उत्पन्न किया ॥६८॥
१ उस पर्वत पर मुनि अपने तेजस्वी भामण्डल से उदीयमान सूर्य की भाँति चमकते
रहते थे। — अनु

१२८ कथासरित्सागर

१२८ कथासरित्सागर
धीमानुदयनो नाम्ना राजा भावी महायशाः।
भविष्यति च पुत्रोऽस्य सर्वविद्याधराधिपः ॥६९॥
इत्यन्तरिक्षाद्वभूत्सस्मिन्त्वामे सरस्वती।
आदधाना मृगावत्याश्चित्तविस्मृतमुत्सवम् ॥७०॥
क्रमादुदयनः सोऽथ वावृद्धेऽस्तस्मिंस्तपोवने।
अवधत निजे साध वयस्येरिव सद्गुणैः ॥७१॥
कृत्वा क्षत्रोचितान् सर्वान्संस्काराञ्जमदग्निना।
व्यनीयत स विद्यासु धनुर्वेदे च धीयमान् ॥७२॥
हृष्ट्वा च स्वकरामाता तस्य स्नेहान्मृगावती।
सहस्रानीकनामङ्क चकार कटक करे ॥७३॥
हरिणाक्षटने जातु भ्राम्यन्नुदयनोऽथ सः।
शबरेण हठात्क्रान्तमटव्यां सर्पमैक्षत ॥७४॥
सदयं सुन्दरे तस्मिन्सर्पे स शबर च सः।
उवाच मुच्यतामेष सर्पो मघवचनादिति ॥७५॥
ततः स शवरोऽवादीज्जीविकेयं मम प्रभो।
कृपणोऽहं हि जीवामि भुजंगं खलयन् सदा ॥७६॥
विषन्न पक्ष्मे पूर्व मन्त्रौषधिबलादयम्।
दष्टम्बश्च मया लब्धश्चिन्वतेतां महाटवीम् ॥७७॥
धृत्वत्युदयनस्त्यागी दत्त्वास्मै शबराय तम्।
कटकं जननीदत्त स त सर्पममोचयत् ॥७८॥
गृहीतकटके याते शबरे पुरतो गतिम्।
कृत्वा स भुजंगः प्रीतो जगादोदयनं तदा ॥७९॥
वसुनमिरिति ख्यातो ज्येष्ठो भ्रातास्मि वासुकेः।
इमां वीणां गृहाण त्वं मत्तः संरक्षितास्त्वया ॥८०॥
तन्त्रीनिघोर्परम्यां च श्रुतिमागविभाजिताम्।
ताम्बूलीश्च सहाम्लानमालातिलकयुक्तिभिः ॥८१॥
तद्युक्तो जमदग्नेस्तं नागोत्क्षिप्तः स धायमम्।
मागादुदयनो मातुर्दृशि वयस्विवामृतम् ॥८२॥
मभ्रान्तरे स शबरोऽप्यटवीं प्राप्य पर्यटन्।
भादायोदवनात्प्राप्तं कटकं तद्विक्रयवशात् ॥८३॥

द्वितीय लम्बक १२९

द्वितीय लम्बक १२९
पुत्र के उत्पन्न होते ही मृगावती के चित्त को आश्चर्य और हर्ष देनेवाली आकाशवाणी
हुई—'यह उदयन नाम का महायशस्वी राजा उत्पन्न हुआ है। इस (रानी) का बालक समस्त
विद्याधरों का राजा होगा' ॥६९-७०॥
तब वह बालक उदयन उस तपोवन में अपने साथ उत्पन्न हुए मित्रों के समान सद्गुणों के
साथ-साथ बढ़ने लगा ॥७१॥
जमदग्नि ऋषि ने उसके सभी क्षत्रियोचित संस्कार करने के अनन्तर उसे सभी विद्याओं
में और धनुर्वेद (शस्त्रविद्या) में शिक्षित किया ॥७२॥
उसकी माता मृगावती ने स्नेह के कारण सहस्रानीक के नाम से अंकित कंकण (हाथ के
कड़े) को अपने हाथ से निकालकर उसके हाथ में पहना दिया ॥७३॥
किसी समय हिरण के शिकार के प्रसंग में घूमते हुए उदयन ने जंगल में एक शबर¹ (एक
भील) के द्वारा बलपूर्वक पकड़े हुए सर्प को देखा ॥७४॥
उस सुन्दर सर्प पर दयालु होकर उदयन ने किरात (शबर) से कहा—'मेरे कहने से
तुम इस साँप को छोड़ दो' ॥७५॥
तब उस जंगली ने कहा—'स्वामी यह मेरी जीविका का साधन है। मैं अत्यन्त निर्धन
व्यक्ति हूँ। 'साँपों को खेलाता हुआ जीवित रहता हूँ ॥७६॥
पहले सर्प के मर जाने के कारण मैंने सारे जंगल में ढूँढ़ते-ढूँढ़ते बड़ी कठिनाई और मन्त्र
तथा ओषधि के बल से इसे पाया और पकड़ा है' ॥७७॥
सँपेरे की बात सुनकर त्यागी उदयन ने माता का दिया हुआ कड़ा सँपेरे को
(साँप के बदले में) दे दिया और उसने साँप को छोड़ दिया ॥७८॥
कंकण लेकर सँपेरे के चले जाने पर प्रसन्न वह सर्प उदयन के सम्मुख मनुष्य-रूप में खड़ा
होकर प्रणाम करके कहने लगा ॥७९॥
'मैं वसुनेमि नामक नाग वासुकि नाग का बड़ा भाई हूँ तुमने मेरी रक्षा की है अतः
मुझसे अत्यन्त रमणीय स्वरवाली और श्रुतिमात्रों से विभक्त यह वीणा ग्रहण करो। साथ ही
कभी न कुम्हलानेवाली यह माला तथा तिलक-युक्ति के साथ कभी न सूखनेवाली यह पान की
लता भी ग्रहण करो ॥८०-८१॥
उदयन उस वीणा को लिये हुए माता की आँखों में मानों अमृत बरसाते हुए जमदग्नि
के आश्रम में आया ॥८२॥
इस बीच वह सँपेरा भी जंगल में घूमता-घामता दैवयोग से उदयन द्वारा प्राप्त उस सुन्दर
कंकण को बाजार में बेचता हुआ पकड़ा गया ॥८३॥
१ 'शबर' एक प्रकार की जाति है, जिसे सँपेरा भी कहते हैं।
१७

१६० कथासरित्सागर

१६० कथासरित्सागर
विक्रीणानश्च तत्तत्र राजनामाङ्कमापणे ।
वष्टभ्य राजपुरुषैर्निन्ये राजकुलं च सः॥८४॥
कुतस्त्वयेदं कटकं सम्प्राप्तमिति तत्र सः।
राज्ञा सहस्रानीकेन स्वयं शोकादपृच्छत ॥८५॥
अथोदयाद्रौ सर्पस्य ग्रहणात्प्रभृति स्वकम्।
कटकप्राप्तिवृत्तान्तं शबरः स जगाद तम् ॥८६॥
तच्छ्रुत्वा शबराद्दृष्ट्वा दयितावलयं च तम्।
विचारडोलामारोहत् सहस्रानीकभूपतिः ॥८७॥
क्षीणः शापः स ते राजन्नुदयाद्रौ च सा स्थिता।
जमदग्न्याश्रमे भार्या सपुत्रा ते मृगावती ॥८८॥
इति दिव्या तदा वाणी नन्दयामास तं नृपम्।
विप्रयोगनिदाघार्तं वारिधारेव बर्हिणम् ॥८९॥
अथोरुकष्टाद् दीर्घे कथमपि दिनेऽस्मिन्नवसिते
तमश्वाग्रं कृत्वा शबरमपरेद्युः स नृपतिः ।
सहस्रानीकस्तां सरभसमवाप्तुं प्रियतमां ।
प्रतस्थे तत्सैन्यं । सममुदयशैलाग्रमपदम् ॥९०॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथामुखलम्बके
प्रथमस्तरङ्गः।

द्वितीयस्तरङ्गः
गत्वाथ दूरमध्वानं राजा वसतिमग्रहीत् ।
दिने तस्मिंस्त कस्मिंश्चिदरण्यसरस्तटे ॥१॥
शयनीयगतः श्रान्तस्तत्र संचारमागतम्।
माय सङ्गतकं नाम जगाद शनकैर्नृपः ॥२॥
कथामाख्याहि मे काञ्चिद्धृदयस्य विनोदिनीम्।
मृगावतीमुखाम्भोजदर्शनोत्सवकाङ्क्षिणः ॥३॥
अथ सङ्गतकोऽवादीद्यत् किं तप्यसे वृथा।
आसन्न एव देव्यास्ते क्षीणशापः समागमः ॥४॥
संयोगा विप्रयोगाश्च भवन्ति बह्वो नृणाम्।
तथा चात्र कथामेकां कथयामि शृणु प्रभो ॥५॥