कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
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निरंजन और विष्णुका संवाद व चौरासीका वर्णन
कवीरकृष्णगीता ।
१५
व्यासदेववचन ।
कहैं व्यास अस साहेब नीका । जमके आस मिटे जो जिवका ॥
ठाकुरसो विनवें सुनि व्यासा । कौन कवीर आवे तुव पास ॥
जब मैं सुमरों दीन दशाला । सट्टरु कवीर मगटे क्पाळा ॥
कहैं व्यास तुम ठाकुर मोरा । बेग मिठाव कवीर बंदीछोरा ॥
सुखदेवके मन उपजी इच्छा । कवीरकेर मैं लेऊं दीक्षा ॥
दान पुण्य बहु तीरथ जोगा । सचनाम विन भये सब रोगा ॥
माया मोह कछु काम न आवे । सट्टरु विना नर नरकसिंघावे ॥
धन सट्टरु सतनाम कबीरा । जम जालियको भेटे पीरा ॥
विष्णु वचन ।
कहा विष्णु महाविष्णु सो जाई । महाविष्णु निरंजन राई ॥
सुखदेव व्यास औ देव अनेका । कबीरहिं सट्टरु किये चहे ठेका ॥
निरंजन वचन ।
कहैं निरंजन गुताहिं राखो । कहु काहूके आगे न भाषो ॥
कबीर जोगजीत औतारा । तिन तो सीस हमारा मारा ॥
दोहा--मैं अछुंगी आसेऊं, जोग हने मम शीश ।
रूप रेख विन भयउं तब, नाम मोर जगदीश ॥
जेहिते कूर्म बिने शिर नाई । कोट विनति कै सीस दिबाई ॥
मोर सीस देहौ सत्त कबीरा । तबते डर भरहरे शरीरा ॥
जो कोइ सत्त कबीर पथ चहई । तेहिमें आपन माथ निरबहई ॥
सट्टरु कबीरकेर यह शीती । शरण गहे तेहि नहिं बेधीती ॥
१६
कबीरकृष्णगीता ।
कोट जनमके पापी होई । भमे तीर्थ अवमल चहे धोई ॥
पाप न छूटे कोट उपाई । कछुहरि शरण पाप दुर जाई ॥
अवनाथक सतनाम कबीरा । जाके निहचल अजर शरीरा ॥
कबीर शरण जिव पहुँचा चाहे । पौत चला कछु रहे सो राहे ॥
और जहांलग जीव जहाना । सब कबीरके मैं गुरु बखाना ॥
जैसे गऊ गोरणिया राखे । पौसै गऊ कबहुँ रस चाखे ॥
गोरस रास गऊ रवाणीके । सांझ सकारे छाँछ महीके ॥
जैसे मैं कबीरके चेरा । कबीर पुरुष मम पिता सुखेरा ॥
मैं कपूत सब बंधु सयाना । वे सब निकट मैं दूर समाना ॥
मैं अपराधी दरश बिहूना । पुरुष दरश विन मंदिर सूना ॥
जहँ मैं रहों सुन्य तेहि नाऊ । तुम विनपुरष सुन्य सब ठाऊँ ॥
धन्य जीव जो सद्गुरु सेवे । सद्गुरु सेय परम पद लेवे ॥
परमपद सोई भवते न्यारा । भौसागर तुम कष्ट अपारा ॥
तीन लोक तव करिहों राजू । जब कबीरसों करिहों साजू ॥
हमरे पिता त्रिगुणके आजा । सतकबीर सुमरै जिव काजा ॥
दोहा—जो समर्थके जीव हैं, सो नाम कबीरके लेंय ।
तिनकी सेवा तुम करो, सुफल कबीर कहैं सेय ॥
सुनके विष्णु कृष्ण औ रामा । पुलकित भये तब विष्णु सुजाना
पूछा निरंजन कस खुशियाला । कबीर नाम सुन गात रिसाला ॥
कहैं विष्णु हम अति पुलकाने । हमपर दया कबीर बहु ठाने ॥
कहैं निरंजन तेहि बड भागी । दीन्हो जाय कबीर सोहागी ॥
कवीरकृष्णगीता ।
१७
कहैं निरंजन विष्णु सपूता । सवा लक्ष भक्ष देहो पूता ॥
विष्णु वचन ।
कहैं विष्णु सब तुम्हरीं दाया । नित्य काट देउँ आपन काया ॥
इक आज्ञा प्रभु मोकहूँ करहूँ । मैं सद्गुरु कवीर पग धरहूँ ॥
गुरुकी भक्त भात पितु सेवा । साधुसेवा फल बैठे लेवा ॥
निरंजनवचन ।
कहैं निरंजन मन हर्षाई । सद्गुरु करो कवीरको जाई ॥
सद्गुरु प्रगट दुनिया दिखलाई । जाते लोग न जाने भाई ॥
यह सब समुझ बूझ हर्षाये । जाय सबन सानंद सुनाये ॥
अब तुमसब मिल राधहु ध्याना । हमहूँ सत्त कवीरहि जाना ॥
कवीरके ऊपर और नहीं कोई । आप कवीर पुरुष हैं सोई ॥
तीन लोक सबते अधिकारा । जोत स्वरूप निरंजन निराकारा ॥
सेवक सम लघु आपहिं जाना । एक कहिन कोउ बहुतक जाना ॥
कवीर भजे सो मोहि गुनदाना । सत्त पुरुष निर्भय निर्वाना ॥
प्रगट राम कृष्ण निराकारा । सब मिल गुप्त कवीर अधारा ॥
अमी बुंद सो सत्तकवीरा । विषय निरंजन नीर शरीरा ॥
प्रेम भक्त नहीं छिपत छिपाये । गुरुसो अधिक कौन अस जाये
सरगुणके प्रेमाधिक गुरूवा । जन्मत भरत भये अति हन्ना ॥
सत्त कवीर अखंड सुखदाता । तिनके भक्त दुख जाय निपाता ॥
जो कवीर कहिहै सो करई । गुरुकी दयाभात पितु तरई ॥
शुकदेव मुनिका अपने अनेक जन्मोंका वृत्तान्त कहना
१८
कबीरकृष्णगीता ।
विष्णुवचन ।
कहैं विष्णु तुम धीरज धरहू । सब मिल स्तुति कबीरके करहू॥
कहैं कृष्ण सुन सुखदेव व्यासा । कहहुँ चौरासी करे विलासा ॥
डारत निरंजन शोकँह चौरासी । सच कबीर काटे जबफांसी ॥
दस चौबीस जन्म भौ मोरा । दया कीन्ह कबीर बंदी छोरा ॥
तुम सब भ्रम आये चौरासी । चौरासी दुख कहुँ संग यासी ॥
चौरासी कर लेतहिं नाथा । सुखदेव व्यास त्रसित अति जामा
कहैं कृष्ण तुम काहे कंपे । सुचिछत होय धराणि किमि चंपे॥
व्यास सुखदेववचन ।
कहैं व्यास सुखदेव सुन रामा । का तुम लेहु चौरासी नामा ॥
नाम लेत चौरासी केरा । अबही कंप उठा जिव मेरा ॥
चौरासी लक्ष योनि दुखरासी । मम अरिजनसों परेउँ चौरासी ॥
चौरासीका सुनहुँ विलासा । पंछी योनि जम लावहिं फांसा ॥
लेय बझाय उखारिस पांखी । पांव टोर लेसी बस आंखी ॥
कोइ दुइ चार दिवस यह हाला । काहूकेर तुरत होय काला ॥
भूँज २ कर तेहि फिर खाई । काहु तरे काहु भूँज पकाई ॥
जाहि मार जो करे अहारा । सो तेहि मोर सौ २ बारा ॥
हभहु हारिल सुवना भयऊ । लासा लगायबझाय जमलयऊ ॥
जीवत एक २ पंख उखारेसि । जियतहिं प्राण बाज सुखडारेसि ॥
तीसर दिन जिव निकसे भाई । घर २ भिन्न जीवत कट जाई ॥
यह संक्षेप कष्ट बरणाई । सज पंछी तन भ्रमेउ भाई ॥
शीत कृष्ण सहि भवन बिहुना । पत्थर मार करे सब चूना ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१९
बरसे पानी बहे समीरा । तरुवर डोले अतहि गंभीरा ॥
चरन जाउं डरपौ दिन राती । जस भंजर टोरे कोइ छाती ॥
भयउं वृक्ष तब छीले छाला । कोइ जर काट करे वेहाला ॥
गउ भयेऊं तब दुख कछु थोरा । पुछमान गउ वृक्ष अंजौरा ॥
बकरा भया चला बल देने । फांसी लगाय गरा गहि लीन्है ॥
खैंचे जाय वेदरद कसाई । भोथा शस्त्र सो गला कटाई ॥
अधमरा काट दिहिसभोहिडारी । छूटे न प्राण महादुख भारी ॥
लेकर विप्र गये घर अपना । काटेसि गर छिन मिटी कल्पना ॥
चीन्तूर भयेउं वसेउ तेहिमाहीं । टोय निकरेसी रुधिर पियाहीं ॥
मलत २ मारेसि अध मरके । दीन्हैसि डार हाहूतमह धरके ॥
बडे कष्ट छूटा तहैं प्राणा । सर्पखान जिव जाय समाना ॥
जहैलग सर्पखान जो जितनी । भमैंउं सब अजगर अवजोनी ॥
अजगर तन अतिभये मितभारी । लूक आग तन निशिदिन जारी ॥
भूखन मरही प्यासन मरही । तेहिपर अष्ट काल निशि जरही ॥
भारी देह चला नहिं जाई । दलमैं परे अहार भक्ष खाई ॥
दस हजार कोइ बीस हजार । सहस्र पांच शत कोइ जियारा ॥
अस जीवनसो मरना भले । पाख बीते कछु भोजन मिले ॥
जिया जंतु जो सोहैं धावे । स्वास संग खैंचि सुँह आवे ॥
महाकष्ट दुख अगम अथाहा । धन्य गुरु जिन तह निरवाहा ॥
सरगुणके गुरुको क्या देश । सोई देय कहुँ पास जो जैसा ॥
निगुण भक्त बिना गत नाही । मिला कबीर सब त्रिखा बुझाहीं ॥
और सुनहु चौरासी पीरा । भिक्षा माहिं भयऊं तब कीरा ॥
२०
कबीरकृष्णगीता ।
मर भिक्षा मह फिर तन धरई । सतनाम विन भर्षेत फिरई ॥
नरक भर्षाहिँ औ नरक निवास। भिक्षा सेज भोग कविलासा ॥
भिक्षा कीराते सूकर भयऊँ । चमकत फिरोँ नरक भष रहऊँ ॥
भयउं भान तब हाड टटोरा । भिक्षा भखी जन्म दुख झोरा ॥
एक दलिदर मोकहैं पाला । सीसलाय पालेसि योहिँ काला ॥
पुष्ट भयऊँ अहार जब बाढा । पापी भक्ष देन तब छांडा ॥
आप खाय भर पेट अघाई । शास एक योहिँ देय ललचाई ॥
खाय पेट भर उठे तब झारी । कबहुँक देय शास एक मारी ॥
ताते भान पाले मत कोई । जो पाले सो भक्ष देय सोई ॥
भक्ष नहीं देय परे अघरानी । सबयो एकै राम बरानी ॥
भयऊँ वाघतबकियेऊँतनघाता । मै नहिँ कीन्हसो कीन्ह विधाता ॥
करता काल करावे आपे । जीव श्राप हे अघ अस्थापे ॥
कर्ता काल निरंजन स्वामी । गढे भरे तन अंतरजामी ॥
जीवहिंदुखसुख बहुविधि देही । सुख किंचित दुख खान भरेही ॥
सतकवीर हैं सबके मूला । तिनके भक्त भिटे दुख शूला ॥
पुनि मै भयउं सिद्ध अघ यासी । सरे ढोर आसेउं अघरासी ॥
दोहा—और कहाँ लग बरणों, चौरासीदुख मूल ॥
सत् कबीर मिले जब, मेटे सब दुख शूल ॥
कहै कृष्ण हम नीके जाना । हमहुँ लेव कबीर प्रवाना ॥
हमहुँ पिता सो विनती कीन्हा । पान लेन कहै आज्ञा दीन्हा ॥
सतकवीर जब दाया करहीं । आपन जान मो देउ धारही ॥
यह कह उत्तर दिशि शिर नावा । नारद सुनि तब बात चलावा ॥
गुरुकी महिमा
कवीरकृष्णगीता.
२१
नारद वचन ।
प्रभु तुम कहेउ प्रथम हम ईशा । पुन बूझा तो निरंजन सीसा ॥
सीस जाय अब अंते लागा । सत्कवीर सीस अब जागा ॥
बिन कवीर मुक्ति जिव नहीं । योग यज्ञ बहु जतन कराहीं ॥
यह दंडवत तुमकाकंह कीन्हा । ताकर मोहि बतावो चीन्हा ॥
विष्णुवचन ।
सुन नारद हरि कहैं बुझाई । गुरु पितु मात साधु सिर नाई ॥
सत्कवीर कहैं कीन्ह प्रणामा । आय दरश दीजे सुखधामा ॥
कवीरके शिष्य राजा निरमोहा । ताहि प्रणाम कीन्ह बहु छोहा ॥
धन्य राजा निरमोहकी वाणी । हर्ष विशेष कछु लाज न हानी ॥
नारद उवाच ।
कह नारद मैं देखों राजा । तिनके दरश होय मम काजा ॥
धन्य निरमोह जेहि कृष्ण सराहा। उनके दरश करें चित चाहा ॥
आज्ञा करहु जो श्रीयदुराई । तो निरमोह दरश कर आई ॥
आज्ञा किये दरश गये करहु । दरश निरमोह जियत जिव तरहु ॥
राजा निरमोहकी कथा ।
चले ऋषी दरश निरमोहा । सभा निरमोह तर गये निरमोहा।
नृप निरमोहके एकहिं बारा । गयेउं कुटम चार सुत बारा ॥
नारद जाय द्वार होय वैसे । ससै शुल भूप धर जैसे ॥
सुंदरी एक अब कहा बुझाई । नृपकर सुत नियते मर जाई ॥
ले संदेश नृप सुतके आयऊं । भये परले ऋषि रौर करायऊं ॥
२२
कबीरकृष्णगीता ।
रोवत नारद सुंदरी उठ नाची । कहे सुंदरी मरना दिन सांची ॥
कहैं नारद सुन सुंदरी पापिन । चूपसुतहतन सुन हंसस कस पापिन
सुन्दरी कहे संगत मय ऐसी । हाटबजारकी सौदा जैसी ॥
एक दुकान गहकी दस मिला । सौदा लेले चले अकेला ॥
को केहि लाग करत है सोगा । अस हम निरमोही लोगा ॥
नारद ज्ञान सुनत मन मूर्च्छा । बहुर नारद सुंदरी कह पूछा ॥
राजहि केर सुभाव जस तोरा । की घट बट सहि कहू रोरा ॥
सुंदरी कहे देख कृषि आंखी । निज चक्षु दोखि कस सांखी ॥
यह कह सुंदरी मंदिल पैठे । सुनि जहैं तहैं जहां जो बैठे ॥
कहे सुंदरी द्विज आये द्वारे । उन संदेश कहि कुंभरही मरे ॥
सुन राजा रानी सुत नारी । निरत करत आये सब द्वारी ॥
नारदकृषि कहैं कीन्ह प्रणामा । कहैं कृषि तुव सुत हरि लिये रामा
सुनत वचन कृषिराय अनंदा । गावहि मंगल लाग करंदा ॥
राजा कहे लाव निरत काली । गावत कुंभरके खाट निकाली ॥
राजाकी रानी उठ गावे । कुंभर बधू सेंदूर चढावे ॥
पायक महाउत आय धाई । मंगल गावहिं गाय बजाई ॥
गावहिं मंगल हंस चलावा । महा अचंभो नारद आवा ॥
नारद उठ राजहि संबोध। रानी कुंभर बंधहिं प्रयोधा ॥
तुव सुत मृत्यु वचन हम बोले । पै तुव सबके वदन न ढोले ॥
कैसे तुम सब हृदय कठोरा । पुत्र मृत्युक सुनकरहु न रोरा ॥
सही राजा तुम बडे धर्म धीरा । पुत्र सुये कर राज प्रचीरा ॥
कवीरकृष्णगीता ।
२३
नृपाति वचन ।
कहे नृप ऋषिसौ कहैं सो साँचा । राज करनको देही काँचा ॥
हम सबके संगत दिन चारा । मरनो रोर न धन वित धारा ॥
आन मरे तो रोइये भाई । मरन आप अमर रहि जाई ॥
गुरुमुख मरे रोवे नहिं भाई । साकट मरे विकल होय जाई ॥
गुरुमुख भये काल भौ नासा । साकटके गले जमको फाँसा ॥
बहुरि समुन्नत ताही नहिं रोई । दाया सतसाहेबके होई ॥
सतसाहेब सतनाथ कबीरा । तिनके हम सेवक रणधीरा ॥
हमरे साहेब यह कह दीन्हा । जीव सुये चिंता नहिं कीन्हा ॥
चिंता सोइ सुमरिये नामा । सब चिंता येटे सतधामा ॥
जो आये हमहू तन धारी । रहेन कोइ राम कृष्ण नरहारी ॥
गुरुसेवा सोई शुभ कामा । और सकल जग काम अकामा ॥
गुरु जब मिले सद्गुरु पूरा । जीव बचावे जमसो सूरा ॥
जालिम काल निरंजन बाँका । त्रिध देवा निस लावहिं आसा ॥
सबकहैं खाय निरंजन राई । बांचे सचकवीर लौलाई ॥
ऐसे संगत हमरे स्वामी । कैसे संगत कहु नृप नामी ॥
कहैं निरमोह सुनो ऋषिदेवा । उतरे पार लोग एक सेवा ॥
जो जहँके तहँवा चलि जाहीं । कोउ काहूको पूछत नाहीं ॥
आपन २ समर्थ साथा । आदनाम समर्थ सुखदाता ॥
समर्थ गुरु साधुकी सेवा । तजे आस सब देवी देवा ॥
तीर्थ व्रत तप योग यज्ञधर्मा । गुरु विन मरे कालबरवंधा ॥
गुरु सोई जो अंतहु भीठा । जन्म मरण गुरु लागिह सीठा ॥
२४
कवीररुणगीता ।
पुन नारद रानीकहैं पूछा । सुत विन तोर गोद भयो छूछा ॥
गुरु विन राम नाम नहिं पावा । रामचंद्र गुरु नाम लखावा ॥
कहैं रानी गहुं नृपके पाऊं । छूछा सोईजो गुरु न कराऊ ॥
गुरु विन राम नाम नहिं पावा । रामचंद्र गुरुनाम लखावा ॥
हमरे स्वाधी सिरपर आहीं । गुरु साधन बल हर्ष कराहीं ॥
कहा कृपी तैं डाइन आही । तेही पुत्र स्वाय निज चाही ॥
सही ऋषितै निहचे यह भाषा । ऐसी बोले सहे तुव साखा ॥
मात पिता जो सुतकहैं खाले । कहु जन्म छटी प्रतिपाले ॥
जैसे निरंजन पाले वाले । ऐसी चाल तुमहिं कहैं चाले ॥
हमरे साहेब सत्कव्वीरा । अमित प्राप्त तेही अजर शरीरा ॥
सो पालक बालक निराकाला । ताहिगिसल तुमवो अस चाला ॥
निरंकार बहु तन धर मूवा । पुरुषके वंश निरंजन तूवा ॥
दश अवतार महा दगपाला । हरि हर अज धर खाये काला ॥
कवीरके हंससे काल निनारा । सो पहुँचे सतपुरुष दरवारा ॥
सत् पुरुष सोई सत्कव्वीरा । कोइ जन भूले देख शरीरा ॥
ऐसी मम संगत ऋषिराई । कैसी संगत कहहु बुझाई ॥
जश पंछी लिये वृक्ष बसेरा । चुगन चले जित कित तब फेरा ॥
को केहि पूछ कुशल औ क्षेमा । ऐसो पुन निरयोह व्रत नेमा ॥
पुन नानाविध भावना कीन्हा । एक रती कछु मोह न चीन्हा ॥
नारद पूछा कुंभर बियाही । तुव मन बहुर जारके पांही ॥
कहैं बहुर नृपके सिर नाहीं । सास बंद गुरु स्वाधी सुख चाही ॥
हमरे स्वामी सुवा न मरि हैं । तजके देह अमर तन धरिहैं ॥
कवीरकृष्णगीतः ।
३५
सचछोक सुख अभूतस्नानी । एके संग रहब दोह प्राणी ॥
तुम्हरे वंश होइहे रांडी । कंथ बेसुख धगडन सो मांडी ॥
मैं पतिव्रता सटुरुके चेली । आप देऊं तो साथ मत हेली ॥
एक कहाँ सो सब सुन राखो । प्रातीह नारद सुख नाम भाषो ॥
नारद कोप कीन्ह परनामा । मोपर कोप न कीजे बाया ॥
जाकर स्वामी भर जग जाई । सुनतहीं रोर करे चिल्लाई ॥
कुंभर बध कहे सुन कपि सुर्षा । रोष जिये तो मरे न पुरुषा ॥
मरे सोइ जो गुरु नहीं कीन्हा । हमरे शिरपर सपर्य चीन्हा ॥
जेते दिना लिखा एक संग । वोही जोत मई धसत पतंगा ॥
ऐसी संगत हमरे पाई । अस सोइ करे ज्ञान जेहि याडे ॥
कैसी संगत तुम्हरी बाला । जसपनिहारिन कलशभरि चाला ॥
दस घरकी तब एकहिं ठाई । कलश भारि २ लीन्ह उठाई ॥
घाट पंथ जित तित भई नारी । ऐसी संगत कृषी हमारी ॥
ऐसी समय कुंभर चलि आये । नारद सुख देख कारिख आये ॥
कुंभर उतर कीन्हे प्रणामा । परम गुरु पितृ मात द्विज रामा ॥
नारद कुंभरसो विनती लाई । हम यह दरश एक बात जनाई ॥
मिथ्या वचन कहा हम आई । तुम्हरे सुयेकी खबर जनाई ॥
कोइ तोह लाग रोवे नहीं भाई । तुव मृतु सुन सबगती कराई ॥
कहैं कुंभर रोवे किहि काहीं । जो रोवे भरना पुनि ताही ॥
सुये कारण नहीं रोइये स्वामी । तब मृत्युका गाडे प्राणी ॥
सुये चलावा मंगल गाई । गुरु साधुकी सेवा लाई ॥
अन्नदान कंचन दिज जाना । मृतुका पहुंचे गुरु निज धामा ॥
३
२६
कबीरकृष्णगीता ।
अविनाशी राम सोइसत कबीरा । सो मम सतगुरु अजर शरीरा ॥
ऐसी संगत हमरी पांडे । हम सब जीवहिं जाने भांडे ॥
कहो कुंअर अस संगत तोरी । सुनहु ऋषी अस संगत मोरी ॥
जैसे पथिक बसे सराई । प्रात भये अपने पथ जाई ॥
कोउ काहूको बात न पूछा । प्राण गये जस काया छूछा ॥
हम सबके जीवन सतनामा । सतसंगत गुरु भक्त विथामा ॥
नारद उठ परिक्रमा कीन्हा । तब चूप सुतहिं जो बैठक दीन्हा ॥
ऋषी विनय कर पाक कराई । नाना व्यंजन परसे जवाई ॥
दोहा-बिदा भये ऋषि नृपते, आप नगर महद्देख ।
हर्ष विस्मय ऋषि चित्तमें, कला निरमोह अलेख ॥
एक चमार चलेउ पुर माहीं । सोई मृत्यु कहैं रोवत नाहीं ॥
तहां जाव नारद भये ठाढा । कृत्य करत मृतुक ले काढा ॥
तब ऋषि पूछा सभरहि जाई । कस नहिं रोवस मनुष भराई ॥
हाडी कहै रोवहिं कोहि लागी । गुरु मुख होय मुख अतुरागी ॥
साकट भरे काल मुख जाई । गुरुमुख तनतज हरिपहैं जाई ॥
राजा भयो कबीरको शिष्या । हम सब रामचरण चित लिख्या ॥
राम भजे सो साधुकी चाली । भिला कबीर भिटा जंजाली ॥
जो जन्मे तेहि मृत्यु कर लेखो । महितन अच्छत जियत ना देखो ॥
जिन प्रभु दिया तिनहिं हरलिथा । मरन जियनकी सोच न किया ॥
ऐसी संगत आय हमारी । कैसी संगत कहो विचारी ॥
ऐसी संगति ऋषि सुनि मोरी । तिरबो अस जस लकडी जोरी ॥
सच्चे गुरुकी पहिचान
कवीरकृष्णगीता ।
२७
छूटे भँवर होय दोय दीशा । दोमहँ एक रोक नहिं दीसा ॥
कुशल काहुकहँ पूछहिं भाई । ऐसी संगत हमरि गोसाईं ॥
दोहा सुन नारद अचरज भये, हरि पहुँ कीन्ह पयान ।
हरिसे चरित्र कहा सब, धन निरमोह सुजान ॥
ऋषि उवाच ।
कहँ ऋषि सुन दीन दयाला । नृप निरमोह जियत कलिकाला ॥
अस २ संत आहिं जग माहीं । धन्य जो सतकवीर जेहि छाहीं ॥
अस योहि दया करो भगवाना । वस्ती तज वन करहिं पयाना ॥
कुल परिवार झूठ हम जानी । सत्तनाम एक सार बखानी ॥
कृष्ण वचन ।
कहँ कृष्ण वन किभि चलि जाहू । गुरुके गूह निज भाकि कमाहूँ ॥
हम ब्रह्मा सुत सब ते जेठे । जगमें और सकल मम हेठे ॥
कहँ कृष्ण जो करता आवे । बिन गुरु ते उबार नहिं पावे ॥
तुम कितने आहू किह माहीं । मम निरवाह गुरु बिन नाहीं ॥
गुरु बिन साकट प्रेत समाना । साकटके सिर जमको थाना ॥
धरती कहँ साकट है भारी । औ प्राणी भारी बेविचारी ॥
जस चंदा बिन रैन औधरी । तस साकट ले जिव जन घेरी ॥
रवि न दिवस ईश बिन सैना । गुरु बिन साकट अंध जन नैना ॥
बिन देवल देवस्थल जैसे । बिन गुरुके प्राणी है तैसे ॥
बिन दीपक जस घर औधियारा । तस गुरु बिन साकट जम चारा ॥
कहँ नारद गुरु का कहँ करऊं । जेहिने तुम्हरे चित संचरऊं ॥
२८
कबीरकृष्णगीता ।
कहैं कृष्ण गुरु कर निरबंदा । नारी तजै तजै कुल दंदा ॥
विष्णव गृह त्यागीं वैरागी । ऐसे गुरुके शरणन लागी ॥
गुरु कबीर पंथतन धारी । सदुरुके सब जिव निस्तारी ॥
सदुरु सत्कबीर निरवाना । जाके त्रास काळ भय माना ॥
अब तो गुरु तुम प्रातहिं करहु । प्रात प्रथम मिलै तेहि पण धरहु ॥
दोहा-नारद गवने निज मठ, प्रात जाय गुरु कीन्ह ।
मछवा मिलै पंथ महँ, तासो दीक्षा लीन्ह ॥
दीक्षा ले वैकुंठ पगु धारे । हरिके आगे वचन उचारे ॥
गुरु कियौपै जातके हीना । तुव आज्ञा मछवा गुरु कीन्हा ॥
कहैं कृष्ण गुरु कहैंपै लाऊ । अब ऋषि तुम चौरासी जाऊ ॥
बेगि जाहु तुम गुरुके पास । अपने औगुण करहु प्रकाशा ॥
तब गुरु आज्ञा जैसी होई । किये निसतार सुनहु ऋषि सोई ॥
चले ऋषि तेहि जग महँ आथे । बहुर तहां गुरु दर्शन पाथे ॥
चरण सीस दे विनती लाई । मोहिसे अवगुण भयउ गोसाई ॥
कैसे अवगुण बेगि सो कहहु । गुरुसे कह अंतर अवकरहु ॥
गुरुसे कपट करे गुरु जिंदा । साधु द्रोह नर यमके बंदा ॥
सुनत ऋषि थरहर पगु धरेऊ । केहि अवगुणसे प्रगट कहेऊ ॥
भयउ दया तुम दीक्षा दीन्हा । ठाकुर मोसन पूछन लीन्हा ॥
कहहु ऋषी गुरु कैसन कीन्हा । तब हम कहैं गुरु कीन्ह कर्थाना ॥
ऐसे कहि हम वचन अधीना । हमरे जोग नहीं गुरु ध्याना ॥
औपै नीच जातपै आना । * * * * *
नारदके गुरु करने और चौरासी भोगसे छूटनेकी कथा
कवीरकृष्णगीता ।
२९
यह सुन कृष्ण कहा मोहि सेती । जात मनुष्य गुरु कहे अनेती ॥
तुम ठाकुर कहो कौन सजाई । कहे नारद तुम कहो बुझाई ॥
कृष्ण कहा भरमो चौरासी । तब छूटे ऋषि यम गर फांसी ॥
ताते तुम पहुँ आयउँ स्वामी । कहो सो करहुँ मैं अंतयंगिनी ॥
अब तुम कहो कृष्णसों जाई । क्षित चौरासी लिख दिसलाई ॥
तब हरि लिखें पृथ्वी चौरासी । लोट पोट कर छटे फांसी ॥
चले ऋषि गुरु कहैं सिर नाई । ठाकुरसे गये विनती लाई ॥
लिख देव स्वामी मम चौरासी । बूझ लेव तब भर्मउ दासी ॥
लिखा कृष्ण भूतल अघरवानी । लोटहिं नारदमुनि विलखानी ॥
कहे कृष्ण तुम यह का काहूँ । महि महीं लोट रेहे तुम करहूँ ॥
भरमो चौरासी हरि सुन वैना । हरि भर आये जल धर नैना ॥
कहें ऋषी यह बुध किन दीन्हा । कहें ऋषी गुरु मोक्ष मम कीन्हा ॥
कहा कृष्ण अस गुरु परतापा । गुरुसम जग हित नहिं पितुभाता ॥
पिता निरंजन गुरुसम मोरा । गुरु दुरवासा ऋषि गतघोरा ॥
सदृढ़ सचकवीर हमारे । कवीरके शरण इकोतर तारे
दोहा—कहें कृष्ण सुन नारद गुरु, बढेके द्विजराज ।
कह ऋषि गुरु सबते बढे, गुरु गरीब निवाज ॥
गुरुसम काहु न देख गोसाई । करता पितु जननी ओ भाई ॥
गुरु हैं सवपर ईश गोसाई । कहें कृष्ण नारद समुझाई ॥
नारद ऋषि उठ चरणन लागे । श्रीपति तुम मोहि कीन्ह सुभागे ॥
जो हम ब्रह्मा सुत बड ज्ञानी । गुरु विन इतने बात न जानी ॥
३०
कबीरकृष्णगीता ।
धन्य गुरु अब धन्य सो कहिये । जासु चिन्हाये गुरुपद लहिये ॥
यथमहि रजगुण गुरुकी महिमा । सुनहु सतोयुण गुरुकी महिमा ॥
तमगुण गुरुकी कहहुँ सुभाऊ । देवी पंथकर चाल लखाऊ ॥
देव निरंजन पंचम कहिये । जोत अकाश होय दरशन लहिये ॥
छठयें जीव सतयें सतनामा । सत्यनाम संतन सुखधामा ॥
संतके प्राण सब जीव सुखदाई । सोई सत कबीर गोसाई ॥
एक जीव त्रिगुण दरशावे । इंगला पिंगला सुखमन भावे ॥
दोहा-वौये इंगला दहिने पिंगला, मध्यसुषुम्णा नार ।
तापर मनपर मन निज मन है, सोई रूप हमार ॥
निज मनपर तिहासन साजा । तापर सतकबीर विराजा ॥
तहैं न काल जंजाल न व्यापा । नहिं तहैं पुन्य नहीं तहैं पापा ॥
तहां न रवि शाशिके उजियारी । एक रोम विध कोट चिकारी ॥
पांच पचीस तीन नहिं तहां । त्रिगुण न नाम कबीरसो जहां ॥
रूप स्वरूप सो निर्मल काया । अजरहिरंवर हंस रहाया ॥
दोहा-एक हंसकी शोभा, रवि शाशिको कोटन तूल ।
तहां सो सत्यकबीर विराजे, सब जीवनके मूल ॥
पूरण पुन्यमान जिव होई । सतकबीर कहैं सेवे सोई ॥
लखन कोट माहीं एक जीवा । सो करिहैं कबीरको पीवा ॥
जेहि होय दाम सो खाय मिठाई । मकरा घांस रंक ले खाई ॥
तैसे दाम सहज सतदाया । पूरण पुण्य सदुरु पद पाया ॥
सदुरु सत्यकबीर जिव व्याही । जीव व्याह अयरलोकलै जाही ॥
सुपथ कुपथका वर्णन व त्रिगुणी जीवका वर्णन
कवीरकृष्णगीता ।
३१
अमरलोक सुख वराणि न जाई । छिप एक महमें गये अघाई ॥
अजर सुक चाहे जो कोई । सो सद्गुरु कवीर शिष्य होई ॥
बिना कवीर सांच कहु नाहीं । तीन लोकसो आवहि जाई ॥
सत्कवीर सो सचनिवासी । सत्यलोक अमरपुरवासी ॥
जीव दयाको जन पगु धारा । दासा तन धरि शब्दपुकारा ॥
दास कहाय प्रगट भये काशी । शिष्य कहाय रामानंद विलासी ॥
सन्यासीसे भये वैरागी । रामदत्त रामानंद अनुरागी ॥
कवीर ब्रह्म आपन जगआदा । तिन गुरु कीन्ह बाध भरजादा ॥
पाछे तब हमहूं गुरु कीन्हा । तब गुरु कीन्ह सबन भल दीन्हा ॥
रामानंद आनंद सरूपी । जन कवीर परमानंद रूपी ॥
रामानंद कला एक मोरा । सत्यकवीर समर्थ बंदीछोरा ॥
बडा नवे छोटा अभिमाना । शीतल ज्ञानकोध अज्ञाना ॥
ताते अमरपद चीन्है भाई । सुपंथ चले सो कवीर घर पाई ।
कछु सुपंथ कछु पंथे चाहे । सो तो रामचरणचित्त आहे ॥
झूठे लंपट चोर छिनारा । यह लक्षण रजगुण निरवारा ॥
क्रोध कपट पारसंड बढाई । यह तम गुण जीव दुखदाई ॥
सतगुण सत् कपट नहिं भावे । प्रेम भक्त गुरु दर्शन पावे ॥
गुरुदर्शन प्रभुदर्शन मानो । साधु दर्श गुरु दर्श बखानो ॥
सत्कवीर सतगुणके मूला । उनकी पटतर कोई नहिं तूला ॥
और सवे छल छुद्र समाना । रागद्वेष मान अभिमाना ॥
कहैं कृष्ण मोहि मन वच सेवे । हरदम नाम ह्यारा लेवे ॥
पाण्डव और कृष्ण संवाद
३२
कवीरकृष्णगीता ।
दया क्षमा सत गहे सो पंथा । दीन दुखी पातक भगवंता ॥
गुरु साधमहैं मोकहैं देखे । घात द्रोह तज पंथ परेखे ॥
भेटो आप मृतककी नाई । प्रेत पिशाच असुर औतरई ॥
रहे जो पुण्य सो प्राणी । रामनाम भज वरतन जानी ॥
नरतन पाय जो भजे कबीरा । कवीर भेंट मिटे तनपीरा ॥
शिव तमगुणकी भक्तिजो करई । प्रेत पिशाच असुर औतरई ॥
देवि भक्त चौरासी वासा । भक्त करे तन परे यम फांसा ॥
शूकर भान गिद्ध मंजारी । परे चौरासी मांस अहारी ॥
दिन रस चेटक भूत यसाना । नामभक्त बिन यमघर थाना ॥
जाहि ज्ञान जाके मन थाका । आतम परमातम पंथ ताका ॥
परआतम सब आतम कीन्हा । बिरलेआतम परमातम चीन्हा ॥
जिन चीन्हा तिन्ह सद्गुरु सेवा । सद्गुरु सत्कवीर निज भेवा ॥
नारद मगन भये सुन वाणी । धन्य कवीरजो कीन्ह वखानी ॥
अर्जुनउवाच ।
अर्जुन पूछे सीस नवाई । अवलग्न हय नहीं पूछ गोसाई ॥
को कवीर कहवाते आये । जाकी ऐसी स्तुति लाये ॥
भक्त कवीर जो रहे एक तोरा । तुमते कौन बड़ा सुन मोरा ॥
युधिष्ठिरवचन ।
कहैं युधिष्ठिर सुनहु महिंदा । गुरु साधकर जितकर निंदा ॥
गुरुके निंदा साधुके खोटी । जुरेनसे जन वस्तर रोटी ॥
ताकर वंश होय निर्दंशा । जो साधुके निंदा परसंसा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
३३
भीम वचन ।
कहे भीम अर्जुन भल कहा । सुना कबीर जुल्हा एक रहा ॥
ताकी एतिक करे बड़ाई । तब सहदेन बोले रिस आई ॥
तुम कबीर कह सके बूझा । अबहिं तोहिं गुरुमत नहिं सुझा ॥
कबीर नाम करता आविनासी । कबीर भजे तेहि छूटे चौरासी ॥
नकुल वचन ।
कहे नकुल भक्त कहा गोसाईं । जेहि मधु तारे सो तर जाई ॥
सुनिके कृष्ण कहा सुन भीमा । अर्जुन पठे तिनहु नहिं चीन्हा ॥
दोहा—सोई कबीर तुम चीन्हहु, जेहि शिष्य घंट बजाय ॥
द्वार भक्त सुदरसन, डोम स्वपच बरणाय ॥
कबीर सोई जाको अस शिष्या। हम सब जीव कबीर घर भीषा ॥
जोलहा आद जासु जगताना । सुरझे साथ साकट अरुझाना ॥
चंदसूर जाके दोय तारा । करि गह काया बिनहि रिसारा ॥
इंगला पिंगला चले दोय घोटी । मध्य सुषुम्णा हांथ जोटी ॥
सरसों तीन साठ लग जानी । अर्ध उर्ध दोय खूँटी तानी ॥
तानी ताना भरनी सुत स्वासा । निहचल बिनहि कबीरा दासा ॥
धरती अकाश पवन औ पानी । रचा कबीर सकल रजधानी ॥
फिरहिं जगतमहँ आप छिपाये । भक्त सुक पथ इनाहिं चलाये ॥
जासे तबहिं निरंजन राई । हम तुम कौन गलीमहँ भाई ॥
संकट माहिं कबीर सहाई । बंदी छोर कबीर गोसाईं ॥
करताका कोइ अंत न पावे । तरे सोई जो भक्त कमावे ॥
कपिल मुनि वचन (निज वृत्तान्त)
३४
कबीरकृष्णगीता ।
अर्जुन भीम कृष्ण पग लगे । निहचछ सोयते अब जाये ॥
कृष्ण युधिष्ठिर कहैं इसारा । अधम उधारन नाम कबीरा ॥
राम नाम कबीर प्रकाशा । राम कबोर दोष एक अवासा ॥
युधिष्ठिर वचन ।
कहैं युधिष्ठिर सुनहु स्वामी । आज कहों तोहि अंतर्धारिनी ॥
जा दिन कहा तुव पुर्षा तारे । बुढ़े नरकते जाय विकारे ॥
तब तुव आज्ञा सिरपर राखा । बांये अंगुली नरकमहैं नांखा ॥
पांव पकड़ मोहिं पित्रन रैंचे । नाम कबीर सुमर तब बांचे ॥
और नाम बहु सुमरेहुं जाई । तजहिं न पित्र मोहिले जाई ॥
तब मैं सचकबीर पुकारा । तत्तिछिण भयउँ नरकते न्यारा ॥
तबसे हम कबीरको चीन्हा । कबीर कहत भये अघते भिन्ना ॥
जबहिं हम युधिष्ठिर ऐसी कहा । तबहिं कपिलमुनि उठकर गहा ॥
कपिलमुनि वचन ।
धन्य युधिष्ठिर कह दुलराये । तुमहु लख कबीर कहैं पाये ॥
कबीर आप हैं समर्थ साई । जाकी रची सकल दुनिआई ॥
आपन बढाई विष्णुहिं दीन्हा । आप दास भये अस अधीना ॥
एक दिन व्यास निरंजन ईशा । औरहिं भया चितवे यम दीसा ॥
सवा लाख सँग पहुँचे जाई । सूर्य दैय यम चला गौसाई ॥
तब कबीर कहैं कीन्ह चिकारा । भिन्यर के मोहि निरंजन डारा ॥
दूतहिं कहा हंस केहि आना । भाष बेग नतो करौ निदाना ॥
बोला श्रीहर दूत होय आगे । डरहिं दूत सब कांपन लागे ॥