कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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कबीरकृष्णगीता ।
रोवत नारद सुंदरी उठ नाची । कहे सुंदरी मरना दिन सांची ॥
कहैं नारद सुन सुंदरी पापिन । चूपसुतहतन सुन हंसस कस पापिन
सुन्दरी कहे संगत मय ऐसी । हाटबजारकी सौदा जैसी ॥
एक दुकान गहकी दस मिला । सौदा लेले चले अकेला ॥
को केहि लाग करत है सोगा । अस हम निरमोही लोगा ॥
नारद ज्ञान सुनत मन मूर्च्छा । बहुर नारद सुंदरी कह पूछा ॥
राजहि केर सुभाव जस तोरा । की घट बट सहि कहू रोरा ॥
सुंदरी कहे देख कृषि आंखी । निज चक्षु दोखि कस सांखी ॥
यह कह सुंदरी मंदिल पैठे । सुनि जहैं तहैं जहां जो बैठे ॥
कहे सुंदरी द्विज आये द्वारे । उन संदेश कहि कुंभरही मरे ॥
सुन राजा रानी सुत नारी । निरत करत आये सब द्वारी ॥
नारदकृषि कहैं कीन्ह प्रणामा । कहैं कृषि तुव सुत हरि लिये रामा
सुनत वचन कृषिराय अनंदा । गावहि मंगल लाग करंदा ॥
राजा कहे लाव निरत काली । गावत कुंभरके खाट निकाली ॥
राजाकी रानी उठ गावे । कुंभर बधू सेंदूर चढावे ॥
पायक महाउत आय धाई । मंगल गावहिं गाय बजाई ॥
गावहिं मंगल हंस चलावा । महा अचंभो नारद आवा ॥
नारद उठ राजहि संबोध। रानी कुंभर बंधहिं प्रयोधा ॥
तुव सुत मृत्यु वचन हम बोले । पै तुव सबके वदन न ढोले ॥
कैसे तुम सब हृदय कठोरा । पुत्र मृत्युक सुनकरहु न रोरा ॥
सही राजा तुम बडे धर्म धीरा । पुत्र सुये कर राज प्रचीरा ॥