कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 39, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीतः ।
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सचछोक सुख अभूतस्नानी । एके संग रहब दोह प्राणी ॥
तुम्हरे वंश होइहे रांडी । कंथ बेसुख धगडन सो मांडी ॥
मैं पतिव्रता सटुरुके चेली । आप देऊं तो साथ मत हेली ॥
एक कहाँ सो सब सुन राखो । प्रातीह नारद सुख नाम भाषो ॥
नारद कोप कीन्ह परनामा । मोपर कोप न कीजे बाया ॥
जाकर स्वामी भर जग जाई । सुनतहीं रोर करे चिल्लाई ॥
कुंभर बध कहे सुन कपि सुर्षा । रोष जिये तो मरे न पुरुषा ॥
मरे सोइ जो गुरु नहीं कीन्हा । हमरे शिरपर सपर्य चीन्हा ॥
जेते दिना लिखा एक संग । वोही जोत मई धसत पतंगा ॥
ऐसी संगत हमरे पाई । अस सोइ करे ज्ञान जेहि याडे ॥
कैसी संगत तुम्हरी बाला । जसपनिहारिन कलशभरि चाला ॥
दस घरकी तब एकहिं ठाई । कलश भारि २ लीन्ह उठाई ॥
घाट पंथ जित तित भई नारी । ऐसी संगत कृषी हमारी ॥
ऐसी समय कुंभर चलि आये । नारद सुख देख कारिख आये ॥
कुंभर उतर कीन्हे प्रणामा । परम गुरु पितृ मात द्विज रामा ॥
नारद कुंभरसो विनती लाई । हम यह दरश एक बात जनाई ॥
मिथ्या वचन कहा हम आई । तुम्हरे सुयेकी खबर जनाई ॥
कोइ तोह लाग रोवे नहीं भाई । तुव मृतु सुन सबगती कराई ॥
कहैं कुंभर रोवे किहि काहीं । जो रोवे भरना पुनि ताही ॥
सुये कारण नहीं रोइये स्वामी । तब मृत्युका गाडे प्राणी ॥
सुये चलावा मंगल गाई । गुरु साधुकी सेवा लाई ॥
अन्नदान कंचन दिज जाना । मृतुका पहुंचे गुरु निज धामा ॥
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