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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

कपिल मुनि वचन (निज वृत्तान्त)

३४

कबीरकृष्णगीता ।

अर्जुन भीम कृष्ण पग लगे । निहचछ सोयते अब जाये ॥
कृष्ण युधिष्ठिर कहैं इसारा । अधम उधारन नाम कबीरा ॥
राम नाम कबीर प्रकाशा । राम कबोर दोष एक अवासा ॥

युधिष्ठिर वचन ।

कहैं युधिष्ठिर सुनहु स्वामी । आज कहों तोहि अंतर्धारिनी ॥
जा दिन कहा तुव पुर्षा तारे । बुढ़े नरकते जाय विकारे ॥
तब तुव आज्ञा सिरपर राखा । बांये अंगुली नरकमहैं नांखा ॥
पांव पकड़ मोहिं पित्रन रैंचे । नाम कबीर सुमर तब बांचे ॥
और नाम बहु सुमरेहुं जाई । तजहिं न पित्र मोहिले जाई ॥
तब मैं सचकबीर पुकारा । तत्तिछिण भयउँ नरकते न्यारा ॥
तबसे हम कबीरको चीन्हा । कबीर कहत भये अघते भिन्ना ॥
जबहिं हम युधिष्ठिर ऐसी कहा । तबहिं कपिलमुनि उठकर गहा ॥

कपिलमुनि वचन ।

धन्य युधिष्ठिर कह दुलराये । तुमहु लख कबीर कहैं पाये ॥
कबीर आप हैं समर्थ साई । जाकी रची सकल दुनिआई ॥
आपन बढाई विष्णुहिं दीन्हा । आप दास भये अस अधीना ॥
एक दिन व्यास निरंजन ईशा । औरहिं भया चितवे यम दीसा ॥
सवा लाख सँग पहुँचे जाई । सूर्य दैय यम चला गौसाई ॥
तब कबीर कहैं कीन्ह चिकारा । भिन्यर के मोहि निरंजन डारा ॥
दूतहिं कहा हंस केहि आना । भाष बेग नतो करौ निदाना ॥
बोला श्रीहर दूत होय आगे । डरहिं दूत सब कांपन लागे ॥

कबीरकृष्णगीता ।

३५

इन नहिं कीन्ह कबीरपुकारा । निरसत जोत तहाँ हम मारा ॥
यहां आय कबीर गोहरायै । वहाँ जोगके गर्भ खुलायै ॥
जोग भोग नहिं जानो भाई । कबीर नाम भज काल न खाई ॥
तबहिं निरंजन दूतहिं बुझावा । यहि धारि डार तुरत तब नावा ॥

दोहा—इतना कहा निरंजन, तत्क्षण प्रगट कबीर ॥
किन मम हंस दुखावा, केहि भारी भौ शरीर ॥
दूत अंध भय पैल पुराने । चल न सके बलहीन तुलाने ॥
देख कबीर निरंजन नीरा । धाय कबीरके चरणन गीरा ॥
थरहर कहे चूक नहिं मोरा । अलग हंस बैठारडं तोरा ॥
सतकबीर सुनि कपिलहि पूछा । कहा कपिल कुछ नाहिं विगूचा ॥
दोहा—तब कबीर दाय़ा करि, मोहे ले चलेउ लियाय ॥

कहे काल मैं चेशो ते ये, तुम राखो मम ठान ॥
तब हम कबीर उर धारा । कहे कबीर भये जभते न्यारा ॥
कहे कपिल सुनि सुन हो भीमा । धन्य कबीर निरंजन सीमा ॥
जहां निरंजन कहैं सब धावे । वहाँ अंत जीवन झरकावे ॥
कहैं कपिल सुनि सुन सहदेवा । विरले पावे कबीरको भेवा ॥
अब हम लेव कबीर प्रवाना । भज कबीर निज घर कहैं जाना ॥
सुने कबीर के महिमा भारी । इच्छा दर्श सबन चित धारी ॥
अर्जुन विनति कृष्णसों करही । हमहुं सतकबीर पगु धरही ॥
कहे कृष्ण तुम हमहीं चीन्हा । अबही कस साहेब चित दीन्हा ॥

३६

कवीरकृष्णगीता ।

हम कहैं तुम मानुष कर जाना । तुम नहिं वचन हमारा माना ॥
अजुन कह तोहे मोहन छूटा । मोह मार सिद्ध सुनि लूटा ॥
जेठा बढा जो कहै सिखाई । मानिये ताको सीस नवाई ॥
राय युधिष्ठिर कबीर गुण कहा । हमहू कहा सो चित नहिं रहा ॥
हम सब कहैं कबीर सिखावा । मनसे मोह प्रगट सब भावा ॥
दीन्ह निरंजन कहैं बिलोका । जीवन सुखदे तुमाहिं निसोका ॥
सकल जीव औ सतकी दाया । जोत अष्टंगी पुरुष निरमाया ॥
दीन्ह निरंजन कहैं जागरी । ओइ पुरुष सोइ सत्तकवीरा ॥
सतलोकवासी अविचल नामा । अविचल नाम कबीर सुखधामा ॥
सत्तकवीर हम सबहि सिखावा । राम निरंजन जगहि ददावा ॥
राम निरंजन प्रगट विस्तारी । कृष्ण अज औ हर संसारी ॥
इन सब कहैं लूटवे हर साजा । क्षौर असवारी पीछे राजा ॥
जो निरगुणकी सब महिमा पावे । तोसरगुणके कोइ निकट न आवे
निरगुण कबीर त्रिगुणते न्यारा । निरंजन त्रिगुण सरगुण पक्षारा ॥
निरंजन कहैं जग निरगुण कहता । निरगुण तो जोइन नहिं वहता ॥
निरंजन तो जोइन मह आये । तन धर कृतम नरक भुगतये ॥
क्रीतम सखा त्रिगुण कियो कर्ता । कर्ता हर्ता भर्ता नहिं मरता ॥
जो कर्ता आपहि भर जाई । तो तेहि क्रीतम कहिये भाई ॥
निरंजन तो तन धर २ मूवा । आदि कर्ता कहु कैसे हूवा ॥
आदि कर्ता सो सत्तकवीरा । जो नहिं गले न जरे शरीरा ॥
अकह अगह छाया तन नाहीं । स्वासा से तस रंग लखाही ॥

कवीरकृष्णगीता ।

( ३७ )

स्वासा पूंजी सवके भाई । सो स्वासा कवीर निरमाई ॥
स्वासा देह लिये संगे चले । निकसत स्वासा देह महि मिले ॥
देहीं त्रिगुण राय निरंजन । स्वासा अंस कवीर दुख भंजन ॥
स्वासा आद पवन है भाई । नासिका वाट सो आवहिं जाई ॥
नासिका निकट सो दरसे आतम । आतम दरस दरसे परमातम ॥
छचीस नीर और पवन पचासी । ताते न्यारा सोहंग अविनासी ॥
सोहंग जीव सुखसागर केरा । तन धर भुगते दुःख घनेरा ॥
केदली ब्रह्मके नाम सोहंगा । जाको मूल सो शब्द विहंगा ॥
जीवके नाम केदल ब्रह्म कहिये । विहंग प्रचै कवीर मिल छहिये ॥
रोरा नल कुमत अठ गांठी । गुरुके ज्ञानन भिमके साठी ॥
दोहा—अजुर्न भीम सकल मिला, कीन्ह कवीर प्रणाम ॥
सतकवीर जीवरक्षक, जै २ कवीर सतनाम ॥

निरंजन दरवारकर दूता । पाती ले आव अवधूता ॥
विष्णुहिं धाय पाती तिन दान्हा । विष्णु वांच विहसे प्रवीना ॥
फुरमाई राजाके आई । विष्णु वांचके सबहिं सुनाई ॥
पत्री निकसा चाहिय जलपाना । पुण्यमान औ जिव बलवाना ॥
भीमसु तबहीं भीमकहैं हेरा । दूत धाय गल गहा भीमकेरा ॥
घैचेउ लट पाछे करि आना । सुरक बांध ले कीन्ह पयाना ॥
भीमको अकल सबहीं भूला । मूसहिंले मंजार जस झूला ॥
कहैं कृष्ण सुन भीम हठीला । कहाँ गयो बलरंग भयो ठीला ॥
कहैं कृष्ण सुन भीम गहीरा । गाढ रक्षक सत्कवीरा ॥