कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
अर्जुन और कबीर संवाद
कवीरकृष्णगीता
( ७१ )
अब ऐसी दाय। प्रभु करहू । सब दिन तुम मम हृदय संचरहू ॥
जो तुम मम हिय करहु प्रकाशा। तब छूटे मम यमके त्रासा ॥
तुम विन को जिव राखन हारा । निरंजन जीवाहिं करे अहारा ॥
कहा करौ यमके डर दरपो। काल निरंजनके डर कपो ॥
अब मोहिं देहु सुकके पाना । यम त्रण ताडे करहु निरवाना ॥
हम सब तुम्हरे जाप पोषे । तुम जागे औ सब जग सोषे ॥
कवीरवचन ।
कहे कबीर सुन कृष्ण सुरारी । निर्गुण भक्त करे तेहि तारी ॥
निर्गुण आद अजर सतनामा । सद्गुरु सत्यनाम सुखधामा ॥
अर्जुनवचन ।
कहे अर्जुन सुन श्रीभगवाना । सत्यकबीर कर्ता निरवाना ॥
जीव कबीर साहेबके ठाहर । तेहि यम खाय जो कबीरसे ठाहर
कृष्ण वचन ।
कहे कृष्ण अर्जुन सुन वाणी । सतपद गहो कबहुं नहिं हानी ॥
सबसों कहौ कबीर है पहली । कबीरसो लगु सो रंग गहिली ॥
अर्जुनवचन ।
कहे अर्जुन हम हैं अज्ञानी । जेहि अब कर्म सोई अज्ञानी ॥
सोइ अज्ञानी शुभ पंथ न आनी। भ्रमत फिरे सदा अज्ञानी ॥
श्रीयदुपति मोहि दीन्ह चिन्हाई । तब हम कबीर पुरुष लख पाई ॥
दोहा--अर्जुन भीमाहि औ गले, भये युधिष्ठिर ठाठ।
सबदेवन कुल औ कृष्ण मिल, विनती कराहिं आति गाठ ॥
७२
कबीरकृष्णगीता ।
युधिष्ठिरकृष्णवचन ।
कहैं युधिष्ठिर कृष्ण समेता । सत्यकबीर तुम कृपा निकेता ॥
अब मोहिं सब कहैं तारहु स्वामी । सत्यपुरुष तुम अंतर्धामी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन सांचा सोई । मोहिं विन जीव तरे नहिं कोई ॥
जाकर अंस ताहि दुख व्यापे । आनके अंस आन पहुँचौपे ॥
कहैं कबीर जीव अंसहि मोरा । छलके जार निरंजन चारा ॥
जो सुनरे सत्यनाम गोसाईं । ताके निकट काल नहिं जाई ॥
युधिष्ठिरवचन ।
कहैं युधिष्ठिर दोह कर जोरी । सुक्त पान दये जिव बंदीछोरी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर निज अंस प्रगट कर । सोईं अंस विष्णु अंसमे लपथर ॥
आद अंत औ निर्गुण सरगुण । पांच पचीस औ चौदह त्रिगुण ॥
अजर अमर सो सबके मूला । जासु अंस सोहंग अंकूला ॥
केदल ब्रह्म सोहंगम जीऊ । रमिता सोहंग पै तन धीऊ ॥
क्षीर मथे सो करे सुवास । सो सुवास पर आत्म पास ॥
परआत्म आत्मके करता । सो सब मूल सकलके भरता ॥
सो सत्यनाम अमरपुर माहीं । सब जिव सत्यनामके आहीं ॥
युधिष्ठिरवचन
कहैं युधिष्ठिर तुम सत्यनामा । सत्यकबीर संतन सुखधामा ॥
देहु परवाना अधम उधारो । पांचों पंडव कहैं तुम तारो ॥