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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

कृष्णका दीक्षा लेनेके लिये प्रार्थना करना

कवीरकृष्णगीता ।

५१

एक सत्यकवीर सत्य बोलहीं । और सबे माया बस डोलहीं ॥
धन्य सो सत्यकवीर कंडहारा । नरक परत बहु जीवहिं तारा ॥

दोहा--सर्वमई है साहेव, सबे रूप सत्यनाम ।

गुरुसरूप चित ध्यान धर, और ध्यान बेकाम ॥
धाय विष्णु धर चरण कवीरा । गहीर्ष कर कवीर मिल हीरा ॥

कृष्णवचन ।

कहे कृष्ण मैं नाती तोरा । पिता निरंजन भक्षक गेरा ॥

दोहा--हमरी कौन बतावे, खाये सबे पितु काल ।

आज तारु मेरे आजा, देहौ मोहर टकसार ॥

कवीरवचन ।

कहे कवीर कृष्ण धर धीरा । कोई दिन गति तोहि देहौ वीरा ॥

पान प्रसाद नरियर मिष्ठाना । दीन्ह कवीर कृष्ण कई पाना ॥

सुनहु विष्णु मयशरगकी बाता । सत् सतोषुण मम अंस विधाता ॥

पारसपान प्रसाद यह खाहु । उपजे दृढ अंकुर गुरु पाहु ॥

पान प्रसादके अस प्रतापा । जन्म २ को भिटही पापा ॥

रहे मान कन्या वर जैसी । मनीह मनावे सेंदुर चढ तैसी ॥

विना लिखा सोइ मानद आना । चरणाघृतसे हंस निरवाना ॥

जब लिख बीरा दीन्ह पुन जाहीं । पूरा शिष्य सद्गुरु पंथ माहीं ॥

दोहा--सबे देवता दसकत, मोहर सत्यकवीर ।

विना मोहर सुलतानको, माल न लगे तीर ॥

जिन वनजारे लीन्ह प्रवाना । मोहर देख घटैत भय माना ॥

५२

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा--कहैं कबीर कृष्णसे, मनमो राखो धीर ।
आगे वीरा देव तोहि,हमार अंस तुम वीर ॥

व्यासवचन ।

कहैं व्यास कबीर हर वंसा । सबके मूल कबीर निहसंसा ॥
अपने मन सब सदुरु चेला । सदुरु शिष्य जेहि नाम थिला ॥
हम सब सदुरु निंदे सुनि जेतै । सबके सदुरु कबीर गति देतै ॥
रवि प्रकाश भौ तिगिर नासा । कीतम त्रिगुण तिगिर तन भासा ॥
निर्गुण भक्त प्रकाश रवि जाना । निरगुण सरगुण माहिं समाना ॥
निर्गुण स्वासा सरगुण देहीं । यमसे बांचे कबीर सनेहीं ॥

कबीरवचन ।

दोहा--कहैं कबीर हम सब घट, राम रूप तन स्वास ।
स्वासा पुरुष नार तन, स्वासा विकसत न नास ॥

व्यास सुखदेव वचन

कहैं व्यास सुखदेव कर जोरी । यम तन कांच जीव बंदी छोरी ॥
यह तन विनसत बार न लगे । ना जानो स्वासा कब वागे ॥
कपिलमुनि गाय सो तुमहि बचाया । जो बांचे सो कबीरकी दाया ॥
दीजे सुख पान मोहिं आतुर । सुखे प्रथम चेतै सो चातुर ॥
वाघ निरंजन सब जिव गार्ई । सवा लाख नित खाय कसाई ॥
सो जिव बांचे काल तुम आसा । नाम कबीर जाहिपर बासा ॥

दोहा--एक ठांव बन कपिल मुनि, दूसर स्वास सुखदेव ।
सब जिव प्रासे वाघ यम, तुम कबीर लख लेव ॥
तब कबीर जिव उपजी दाया । मानिद पान सो सबहिं खवाया ॥