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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

गुरु और गुरुओंका वर्णन

५४

कबीरकृष्णगीता ।

तुरक अजानिल्ल हिंदू धर्मराई । है भक्षक रक्षक नहि भाई ॥
आप अजानिल्ल अलह कहलावा । अलह अलाहकी रूप छिपावा ॥
जीव का करे काल छल कीन्हा । जीव भुलाने खसम न चीन्हा ॥
जीवके खसम सो अमर कबीरा । विन परचे धरे धर चीरा ॥
देवा देवी जार गवारा । सटुरु खसम सो अमर भतारा ॥
असछी सटुरु सत्य कबीरा । नकली सटुरु बहु भौ भीरा ॥
बोरहिं शिष्यको नरक मंझारा । कहहिंके भौजल पार उतारा ॥
वेद पुराण कुराण पढ़ै सब । गुरुभत त्याग मनमत गहै सब ॥
वोर छोर गायत्री माहीं । सत्य दया तेहि माहे दढाहीं ॥
पंडित काजी यमके अगुवा । आप बाल बालें पछ लगुवा ॥
द्विजके कहे चले संसारा । सो द्विज मनमत बात अपारा ॥
कलयुग आवत है चल भाई । लै २ पान लोक बलि जाई ॥
करिहै निरंजन कलिय विचारा । वट२ कुमत उपजहि संसारा ॥
ब्राह्मण कलिमें मछरी खैहैं । विष्णु देह धर नरके जैहैं ॥
धरिहैं निरंजन रूप मलीक्षा । गऊ विगहिं दुख देहिं अदीक्षा ॥
बडा प्रपंच करि है जिव लागी । अनंत रूप धर नट बट पागी ॥

दोहा—चोरी और छिनारी, आमिष भष जिव घात ।

यह सब करिहैं निरंजन, जीवन वड उत्पात ॥

काजी रूप निरंजन पांडे । एके काल दोऊ घर भांडे ॥
एके विष्णौ दुतिय दूबे । त्रिविध तिवारी पांडे चौबे ॥
छठयें सतयें अठयें नौवें । दसयें दस प्रकार द्विज सोमे ॥

कबीरकृष्णगीता ।

५५

नौवैं नौ नारी प्रमोधा । दसवैं दस द्वार जिन सोधा ॥
अठवैं अष्ट कमल जो भिन्ना । सतयै सत्य वाक गहि लीना ॥
षट्ये षड्स त्यागे भाई । पाठै पचर्यै वेद पढाई ॥
चौवै चार वेद जो राता । तिवारी त्रिगुण देव भगु माता ॥
दूवै दुवधा दूर बहावे । एक असल सत्यनाम समावे ॥
एक सो जन कबीर विष्णो गता । दयाशील पतिपाल अगतगत ॥

व्यास सुखदेव वचन ।

कहे सुखदेव व्यास कर जोरी । कहहु चौरासी केतिक खोरी ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुनो सब कोई । चार खान चौरासी लक्ष होई ॥
नौ लख जलमो जीव समाना । चौदह लक्ष पंछी परवाना ॥
ऊमि कीट सत्ताइस लाख । तीस लाख स्थावर भाषा ॥
चार लाख मालुष तन जाना । मालुष देह परमपद जाना ॥
चार खान अब सुनहु व्यासा । चौरासी चार निरंजन फांसा ॥
अंडज पिंडज ऊष्मज अंकुरा । चार खान जिव एकहिं पूरा ॥
पुरुष दीन्ह जिव अम्बर चोला । इच्छारूपी उडुगण खोला ॥
सौ चोला को निरंजन पैन्हा । नरक कलमा काया जिव दीन्हा ॥
भये असतो निरंजन जबते । आनके आप लियो अब जबते ॥
कुमत असत जिव घात निरंजन । जिव पालक सतनाम सो सज्जन ॥
आपन जनमल ताहु दुखदाई । त्रियसुत निराकार निज खाई ॥
कहेो जीव कैसेके बांचे । सत्यनाम विन यमघर नांचे ॥