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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

सत्यलोकके हंसोंके रूपका वर्णन

१३६

कबीरकृष्णगीता ।

कृष्णवचन ।

इतना सुन कृष्ण कबीरपहँ हेरा । तब कबीर भगटे तेहि बेरा ॥

सत्यनाम कहि शब्द उचारा । अडुत लीला कला विस्तारा ॥

सोभा लोक रोम एक प्रगटा । अडुत चंद सूर भौ घटा ॥

दोहा-सिंहासन पर बैठे, सट्टरु सत्यकबीर ।

अमित कला छबिको कहे, अडुत हंस मन हीर ॥

धन्य भाग्य वैकुंठके, जहँ प्रगटे सत्यनाम ।

सट्टरु देव अनंदही, रजगुण तमगुण धाम ॥

कला गुप्त किये सत्यकबीरा । जैसेको तैसे यतधीरा ॥

सबे देव थरहर पग लागे । परसत चरण सकल भगभागे ॥

अजहरवचन ।

अजहर सबे कहे हरसेती । सबे शरण गहो यही सुनेती ॥

दोहा-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सबन कृष्ण समुझाय ।

फिर यह अवसर कहाँ मिले, गहो कबीरके पाँव ॥

हरषत अजहर लीन्हो पाना । नारि पुरुष एक मत निरवाना ॥

चरणाभूत सबहिन कहँ दीन्ह। सबन माँग प्रीतिसो लीन्ह। ॥

कबीरवचन ।

कहे कबीर सुनो त्रियदेवा । आपन अंस रचहु जग सेवा ॥

ठीका पुरे तुम लोक सिधावो । पितुके सेवा अंस बैठावो ॥

सट्टरु भाकि हृदय महँ राखहु । मात पिता सेवा सत भाषहु ॥

माता पिता सबे भल होई । सट्टरु सेय तरे कुल दोई ॥

काम क्रोध आपा घट काढव । सेवा साध सखा घर बाढव ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१३७

कहैं कबीर सत्यकी चाली । तरे शिष्य ठागे सुर नाली ॥
सत्य कहे होय कारज जिवके । सत्य गहे मिलिहै निज पियके ॥

दोहा-सत्य ताहि कहैं कहिये, रती न मिथ्या जाहि ।

कहैं कबीर कृष्णगीता, विष्णु व्यास चित चाहि ॥

कहैं कबीर सुनो सब कोई । भाषों काया प्रचे सोई ॥
काया सो जो अमर ना रहई । जिवरा योनी नहि औतरई ॥
षोडश शशि सोहंसन भाला । चकित चंद है कलात्रियभाळा ॥
यनिमाली कंठ माल विराजे । कोटिन रवि शशि नखछविछाजे ॥
छत्र सिंहसन जगमग जोती । हंस खान शशि तिहुँ पुर पोती ॥
अमरलोक सो अमर हंसा । अमृतफल भोजन निहंससा ॥
अमर चीर तन विमल विराजे । देह सुवास प्राणमें छाजे ॥
श्वेत भंवर पंकज विन नाला । अभी सिंधुतट कुंज रिसाला ॥
कमोदनि विमलश्वेत उजियारी । मन पृथ्वी तन फल फुलवारी ॥
विमल सुगंध विटप फलपाता । पक्षी केलिकरें रंग राता ॥
त्रिधि विहंगम मय कर जूहा । चंद उदै फल फूल सबूहा ॥
विहसहि हंस महा रस खानी । दसनपांति मन जगमग वाणी ॥
काया अमर सुगंध अंजोरा । योजन शत सुवास धनघोरा ॥
हंस काया अस अमरलोक । परस पुरुष पद हंस निसोका ॥
यह शोभा संक्षेप वखाना । अद्भुत शोभा अकह अंमाना ॥
सत्यनामका लेय परवाना । निराकारका मर्दन माना ॥
सो पावे यह काया भाई । कहैं कबीर जिन मोहि लौलाई ॥
कोट सूर्य छवि हंसन काया । बहुत अंजोर संक्षेप सुनाया ॥