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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

राजा दण्डपालके पुत्रोंकी कथा

कवीरकृष्णगीता ।

६३

कवीरवचन ।

कहैं कवीर सुन विष्णु व्यासा । सुनहुकपिलसुनिपतिव्रतभासा ॥
पुरब कुण्ड होय पतिव्रता । प्ररब कुर होय बहु भरता ॥
बहु भरता बेविचारी नाऊं । पतिव्रता शुभ चार कपाऊं ॥
राजा एक रहो दुगपाला । ताके गृह जन्मे दोह वाला ॥
कीन्ह व्याह दोनोंके ताता । बेविचारीकेमनस्वामीगहिंरता ॥
बेविचारीके स्वामी अनारी । कोहवर कछु न दीन्ह चिन्हारी ॥
सुभिचारी पतिव्रताके स्वामी । मनमो तर्क कीन्ह गुरु त्राणी ॥
पतिव्रताके स्वामी मन कहा । मैं जैहों देसंतर जहां ॥
तिबइ कीन्ह देहु कछु आजू । तब पुन होइहै दंपत काजु ॥
दंपति की पुरुषहिं कहिये । गुरुविनसुचिकबहुँनहिंलहिये ।
गुरु सोई जो अंतहु भीठा । जन्ममरणगुरु विननहिं छूटा ॥
कहैं कुंभर सुन त्रिय पतिव्रता । चलि हैं दिसंतर तुम्हरे भरता ॥
अपने हांथ खवावहु मोही । भोजन चीन्ह देऊं मैं तोही ॥
मोर नाम ले वहू नृप अइहैं । हमार नाम ले तोहि खुले हैं ॥

दोहा--ताते कछु प्रशादके, मोकहैं आन कराव ।

जो आवे सो पुनि तेही, पूछिहौ भोजन प्रभाव ॥

सुनतहिं दुलहिन विकल भई मन । स्वामीके पग गिर करुणाकर ॥
बहुरि जोर युग कर युग रोई । तुम विन मोहिरक्षक नहिं कोई ॥
मोहि तजि पिया कितहु जनि जाहू । तुम विन मोर करे को निबाहू
मात पित बंधु परिजन जेते । पिय विन करकटदुर्जन भये तेते ॥

६४

कबीरकृष्णगीता।

मोहि त्रियहि गाडेहि चाहे डारी । केहि कारण पिय दिसंतर सारी ॥
व्याह करन चाहे सब कोई । नारि निवाह करे कोई कोई ॥
कहैं कुंअर सुभचार वैविचारी । सुनहु सुरत धर सीख हमारी ॥
कच्चा कली बन मधुकर योगू । तबलग मधुकर चिंताहि वियोगू ॥
हमरी तुम्हरी सुरत एक जानो । पिय गुरु वचन हृदयपर आनो ॥
नर होथ नारीके रँग राता । तिनको कोई न पूछे वाता ॥
नार सोइ जो कान न छोडे । मर्द सोइ जो एकोन न छोडे ॥
और काज हमरे कछु नाहीं । गुरु खोजन दिसंतर जाहीं ॥
गुरु विन काज कबहुँ नहिं होई । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर सम कोई ॥
करता आप जो तन धर आवे । तो गुरु विन नहिं जग यस पावे ॥
ना जग यश ना यमते छूटे । गुरु विन निराकार यम लूटे ॥
गुरु सोई जो निरंजन मारा । सो गुरु भौजल तारनहारा ॥
अमरलोक ले जिव पहुँचावे । त्रिगुण त्यागले चौथे मिलावे ॥
सोई गुरु जो अंतहू मीठा । गुरुते जन्म मरण सब छूटा ॥
ताते अब चित धीरज धरहू । मानहु वचन तुमहु गुरु करहू ॥
यह जीव है कहे सुष घरकैरा । कहे वेद सतलोक जिवढैरा ॥
सत्यलोकते सब जिव आया । निरंजनके डहन समावा ॥
निरंजनसो अधिक जो होई । ताके सुमरण बांचे लोई ॥
जाके ढर ढरे काल निरंजन । परम जोत सो काल शिर भंजन ॥
करुणा मैं कहाय जग प्रगटे । तिनके त्रास निरंजन हटे ॥
सोई अचिंत सत सुकृत सदुरु । सोई मुनींद्र त्रेता शुभ पग धरू ॥

कबीरकृष्णगीता ।

६५

दोहा—सोइ समरथ सत्यनामहै, तेहि प्रथम नाम कबीर ।

कलिके जिव तारन कारण, प्रगटहिं दास कबीर ॥

दास कबीर कलिमहैं कहाई । सत्यपुरुष जग प्रगटहिं आई ॥

तब यम सो छूटा हम भाई । जो कबीरके शरण समाई ॥

सुन पतवरता स्वामी कहई । गुरु विन मिथ्या सब जग अहई ॥

यात पिता सुत संपत्त दारा । स्वामी तन धन जोवन छारा ॥

जीवके स्वामी सांचा सोई । सो कबीर सदुरु दुख खोई ॥

हमहू लेव कबीर पंथ सीखी । तुमहू लेव कबीर हिय लीखी ॥

पतिव्रतावचन ।

कह पतिव्रता सुनो प्रभु स्वामी । कतहुँ स्त्री कहे पियसे दुरवानी ॥

स्त्रीके गुरु पुरुष जग कहई । पिया प्रताप निरभैं निरवहई ॥

पतिव्रता गुरु स्वामी सिखावा । और सबन गुरु भक्त हदावा ॥

कुंभर वचन ।

कहैं कुंभर हम तनके स्वामी । तुम अरधंगी व्याही वार्थी ॥

जीवके स्वामी सत्यकबीरा । तास शरण जिव व्यापे न पीरा ॥

करुणा मैं कबीरकी कला । कबीरके भक्त आद जे माला ॥

जो कबीर कलियुग ना प्रगटे । चले ना भक्त काल न हटे ॥

काल दोहाई कबीरके माने । और काहु यम नाहिं गुदाने ॥

बाले हरिश्चंद्र मोरध्वज राजा । जिनके सदा धर्म वरत साजा ॥

पांचो पंडव नरक गक्षो चाको । दानी करण महा अति बांको ॥

कहैलग कहौ तिहुपुर धर्मधारी । छलके सबहिं निरंजन भारी ॥

६६

कबीररुप्णगीता ।

जो कोइ शरण कबीरके लाग। ताकर दुख संकट सब भागा ॥
जिमि जग पतिव्रता शुभचारी । आदि पतिव्रता सद्गुरु व्रतधारी ॥
दोहा-सत्यकबीर विना जीव सब, कतहुँ संच न पाय ।
कहैं स्वामी सुन गुरुमुखी, पिय सत्यकबीर लौलाय ॥
स्वाधीके सिखापन ठियमहैं गुना। सुधावंत पिये लिखा दुख दूना ॥
पिया पगु टेक उठी श्रह ताका । रंगमहल मिल उरदक फांका ॥
जेहरकेर चुलह तिन कीन्हा । प्राणदानरूप घृत दीन्हा ॥
दीपक अग्नि वस्तर चूलह वारी । विनवर थार राख दल हारी ॥
ले स्वाधीके सन्मुख ठाडी । सलिता हगते वार अति बाडी ॥
“आज्ञा पाय धरेउ पिय आगे। बराबर दुइ भाग किहु कुंअर सुभागे ॥
एक आप लिय एक त्रिय दीन्हा। अपेण कर पुन भोजन कीन्हा ॥
दे खरचा पुन बीरा दीन्हा । सुख जूठन कुल्ला तब कीन्हा ॥
भये संतुष्ट जूठन देव दासी । हरिंत लेहु जो मिलि अविनाशी ॥
चरणोदक पुन प्रथमहिं लीन्हा । महाप्रसाद तब भोजन कीन्हा ॥
सुखसागर पिय दरश सुजानी । पिय विराहिन पिय दरश लुभानी ॥
लौंग जायफल पान मिलाई । बीरा रच देइ पियाहिं खवाई ॥
कहा कुंअर अब आज्ञा देहू । हम गवने तुव प्रतिव्रत लेहू ॥
यह सुन कुहकी मार धन रोई । कुहक सुनत धाय सब कोई ॥
मात पिता कह कुंअर नेवेली । गरे हार कर कुंअर चवेली ॥
रोई आन दुख बूझ सपाना । कहैं कुंअर चूप बोलिय आना ॥
हम कह परि ओर कछ धंधा । तुम सबके मन पापके संधा ॥
कुंअर सो बुध जान सब बूझा । कहा बुझाय तबे सब सूझा ॥

कवीरकृष्णगीता ।

६७

दोहा-ठांव २ सब सैना कहु, कुँअर सोइ अलसाय ।

पहिला भिन्न सार अगम पंथ, कुँअर धरे उठपांय ॥

निकसा कुँअर सत्तगुरु भापी । गुरु कर फिर आयो अस भापी ॥
निसरा कुँअर दिसंतर भारी । कुँअर जाग एक सर सेज पारी ॥
उठि अकुलाय अंगना भइ ठाई ॥ पियकी प्रीति अंतर्गत बाडी ॥
माय बाप कैंहें डांक जगावा । मम अभाग पिय तरिथ सिधावा ॥
रोर करे दुलहिन पिय लागी । पियके बोल हिये उठ वृह आगी
सये विकल होय रोवन लागे । कहैं नृपत कस रोवहु अभागे ॥
पठवहु मानुष पर आती । कुँअर होय पितु बंधु जमाती ॥
धाय बहुत खोज नहि पाये । नृपत समोव कुँअर समुझाये ॥
पतिवरताके स्वामी पूरा । सर्वस माग चेताय तेहि सुरा ॥
बेविचारी कर स्वामी कांचा । चीन्ह कछू नहि बोलिस वांचा ॥
वहां दिसंतर गयो कौने काजा । बेविचारी लिहे गौ दुतिय राजा ॥
बारह वर्ष बीत जब पूरा । आन कुँअर आवत वाजे तूरा ॥
कियो नृपत सन्मान बहूता । कस तन ठहरे ताके पूता ॥
पहिले पहर तेहि कुँअर बुलावा । पतिव्रता पट अंतर दियावा ॥

दोहा-पतिवरतासुं दुहि कहा, पूछ कुँअरकी बात ।

कौन वस्तु तुम खावो, पतिव्रता संग रात ॥

भगली कुँअर कहे भष भाता । बराबरी झकभास सुहाता ॥
कहे पतिव्रता यह नहि मम स्वामी । विदाई नहि कहैं लसकर जाही ॥
यही भांति भूप बहु भगली । पतिवरतहि ठग सके न नकली ॥

६८

कबीररुग्णगीता ।

भूप अनेक कांक्ष बहु आये । हांथ न लगी जाहि पछताये ॥
नृपत पद पतिव्रता राती । पिय आज्ञा किया चहे पिय माती
गुरु करेको अंकुर कीन्हा । पुन पिये प्रति अबोझा दीन्हा ॥
जब पिय आवैं देखों आंखी । तब गुरु करौं कबीर सत भाषी ॥
गुरु प्रतीत तुरंत मिल स्वामी । धन्य सहृदु गुरु अंतर्थाभी ॥
बाजत गाजत आव बराता । सुनके कोथ भयउं तब ताता ॥
तब पुत्री कहैं गारी दीन्हा । धन सर्वस नाहक खर्च कीन्हा ॥
सुना कुंभरि पिय करे अवाई । अधिक गीत कब पिय पद पाई ॥
पिता पहाँ दुलहिन चलि गयऊ । पूछ पिता पुत्री कस आयऊ ॥
कहे पतिव्रता संभाषण करहू । नहिं तो द्रव्य मम गहना धरहू ॥
सुन पितइ पठय नौवारी । किहुं सनमाने जेता धारी ॥
बहुरि दीप बार कुंभरि बुलाये । माला तिलक झलक झलकाये ॥
सतकबीर करुणा वै बोले । तब पतिव्रतते श्रवण खोले ॥
पूछे सुंदरी कहु नृपवारा । कोहवर जैवे कौन प्रकारा ॥
परदा सात चदर देहु अंतर । निज पिया नाम जपहिं उरमंदर ॥
कहैं कुंभर जानहिं अरधंगा । दुइ बरा पायऊं एके संग ॥
यह सुन पतिव्रता पगु लागी । परदा सात भरसपट त्यागी ॥
परे चरण पिय छुये न ताहीं । पूछे विष्णव भये कि नाहीं ॥
कहे पतिव्रता यह मन आज । जिहि पियसों पग हो तेहि पाऊ ॥
कहे कुंभर साकट जेहि नारी । तेहि संग बूडे पुरुष अनारी ॥
यह कहि कुंभर चला अपना दल । साकट हांथ न उचित लेन जल ॥

कबीरकृष्णगीता ।

६९

पीछे लाग चली पतिव्रता । बहुर उचर दीन्हा तेहि भरता ॥
हम अब जात आह बरिआता । गुरु करव तो होन तुव साथा ॥
कहे कन्या गुरुदेव बोलाई । हमहू शरण सत्यनाभके जाई ॥
कहे कुंभर गुरुबंधु संग मोरे । तुरत पान लेहु तिनका तोरे ॥
भये जो मंगल अधिक उछाहा । तन गउवा मन जीवके व्याहा ॥
पतिव्रता कहे पियपद लागी । चल मंदिर मोहि करहु सुभागी ॥
तबलग मोर छुवा जिन खाहू । जो लगि मोहि गुरु शरण दिवाहू ॥
सुनत वचन पतिव्रता केरी । पाऊं परे कुँअर पगु वारी ॥
पतिव्रता गृह चल भौ स्वाभी । हर्ष चले पाछे पिय बानी ॥
मंदिर जाय पलंग सुभ डासा । फूल विछौना अधिक सुवासा ॥
पलंग बैठ पिय वचन उचारा । परआत्म कह दीन्ह अहारा ॥

दोहा—राजा कीन्ह सन्मान सब पुन, कीन्ह आरती साज ।
आरती होत सो मंगल, अनवन बाजन बाज ॥

सिंहासन बैठे कडिहारा । नरिअर मोर हंस निस्तारा ॥
तिनका जमते वेग तोडावा । दे प्रवाना जीव सुकावा ॥
पुन दे तिलक चरणोदक दीन्हा । कागते हंस रूप कर लीन्हा ॥
चरण टेके कीन दंडवत साता । सट्टुर दियो सीस तब हांथा ॥
दीन्ह प्रसाद नारियर गरी । बहुर प्रसाद नवहु देहु फेरी ॥
पुन सट्टुर तेहि सिखापन दीन्हा । सदा रहहु पिय चरण अधीना ॥
पतिव्रता सुन शब्द सिखापन । गुत प्रगट एक ब्रह्म पुरातन ॥
सत्यनामप्रति पिय गुण जानी । पतिव्रता पिय पद लपटानी ॥