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सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

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कबीरकृष्णगीता ।

मर भिक्षा मह फिर तन धरई । सतनाम विन भर्षेत फिरई ॥
नरक भर्षाहिँ औ नरक निवास। भिक्षा सेज भोग कविलासा ॥
भिक्षा कीराते सूकर भयऊँ । चमकत फिरोँ नरक भष रहऊँ ॥
भयउं भान तब हाड टटोरा । भिक्षा भखी जन्म दुख झोरा ॥
एक दलिदर मोकहैं पाला । सीसलाय पालेसि योहिँ काला ॥
पुष्ट भयऊँ अहार जब बाढा । पापी भक्ष देन तब छांडा ॥
आप खाय भर पेट अघाई । शास एक योहिँ देय ललचाई ॥
खाय पेट भर उठे तब झारी । कबहुँक देय शास एक मारी ॥
ताते भान पाले मत कोई । जो पाले सो भक्ष देय सोई ॥
भक्ष नहीं देय परे अघरानी । सबयो एकै राम बरानी ॥
भयऊँ वाघतबकियेऊँतनघाता । मै नहिँ कीन्हसो कीन्ह विधाता ॥
करता काल करावे आपे । जीव श्राप हे अघ अस्थापे ॥
कर्ता काल निरंजन स्वामी । गढे भरे तन अंतरजामी ॥
जीवहिंदुखसुख बहुविधि देही । सुख किंचित दुख खान भरेही ॥
सतकवीर हैं सबके मूला । तिनके भक्त भिटे दुख शूला ॥
पुनि मै भयउं सिद्ध अघ यासी । सरे ढोर आसेउं अघरासी ॥

दोहा—और कहाँ लग बरणों, चौरासीदुख मूल ॥

सत् कबीर मिले जब, मेटे सब दुख शूल ॥
कहै कृष्ण हम नीके जाना । हमहुँ लेव कबीर प्रवाना ॥
हमहुँ पिता सो विनती कीन्हा । पान लेन कहै आज्ञा दीन्हा ॥
सतकवीर जब दाया करहीं । आपन जान मो देउ धारही ॥
यह कह उत्तर दिशि शिर नावा । नारद सुनि तब बात चलावा ॥