सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 47

कबीरकृष्णगीता ।

३३

भीम वचन ।

कहे भीम अर्जुन भल कहा । सुना कबीर जुल्हा एक रहा ॥
ताकी एतिक करे बड़ाई । तब सहदेन बोले रिस आई ॥
तुम कबीर कह सके बूझा । अबहिं तोहिं गुरुमत नहिं सुझा ॥
कबीर नाम करता आविनासी । कबीर भजे तेहि छूटे चौरासी ॥

नकुल वचन ।

कहे नकुल भक्त कहा गोसाईं । जेहि मधु तारे सो तर जाई ॥
सुनिके कृष्ण कहा सुन भीमा । अर्जुन पठे तिनहु नहिं चीन्हा ॥
दोहा—सोई कबीर तुम चीन्हहु, जेहि शिष्य घंट बजाय ॥
द्वार भक्त सुदरसन, डोम स्वपच बरणाय ॥

कबीर सोई जाको अस शिष्या। हम सब जीव कबीर घर भीषा ॥
जोलहा आद जासु जगताना । सुरझे साथ साकट अरुझाना ॥
चंदसूर जाके दोय तारा । करि गह काया बिनहि रिसारा ॥
इंगला पिंगला चले दोय घोटी । मध्य सुषुम्णा हांथ जोटी ॥
सरसों तीन साठ लग जानी । अर्ध उर्ध दोय खूँटी तानी ॥
तानी ताना भरनी सुत स्वासा । निहचल बिनहि कबीरा दासा ॥
धरती अकाश पवन औ पानी । रचा कबीर सकल रजधानी ॥
फिरहिं जगतमहँ आप छिपाये । भक्त सुक पथ इनाहिं चलाये ॥
जासे तबहिं निरंजन राई । हम तुम कौन गलीमहँ भाई ॥
संकट माहिं कबीर सहाई । बंदी छोर कबीर गोसाईं ॥
करताका कोइ अंत न पावे । तरे सोई जो भक्त कमावे ॥