सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 30

१६

कबीरकृष्णगीता ।

कोट जनमके पापी होई । भमे तीर्थ अवमल चहे धोई ॥
पाप न छूटे कोट उपाई । कछुहरि शरण पाप दुर जाई ॥
अवनाथक सतनाम कबीरा । जाके निहचल अजर शरीरा ॥
कबीर शरण जिव पहुँचा चाहे । पौत चला कछु रहे सो राहे ॥
और जहांलग जीव जहाना । सब कबीरके मैं गुरु बखाना ॥
जैसे गऊ गोरणिया राखे । पौसै गऊ कबहुँ रस चाखे ॥
गोरस रास गऊ रवाणीके । सांझ सकारे छाँछ महीके ॥
जैसे मैं कबीरके चेरा । कबीर पुरुष मम पिता सुखेरा ॥
मैं कपूत सब बंधु सयाना । वे सब निकट मैं दूर समाना ॥
मैं अपराधी दरश बिहूना । पुरुष दरश विन मंदिर सूना ॥
जहँ मैं रहों सुन्य तेहि नाऊ । तुम विनपुरष सुन्य सब ठाऊँ ॥
धन्य जीव जो सद्गुरु सेवे । सद्गुरु सेय परम पद लेवे ॥
परमपद सोई भवते न्यारा । भौसागर तुम कष्ट अपारा ॥
तीन लोक तव करिहों राजू । जब कबीरसों करिहों साजू ॥
हमरे पिता त्रिगुणके आजा । सतकबीर सुमरै जिव काजा ॥

दोहा—जो समर्थके जीव हैं, सो नाम कबीरके लेंय ।
तिनकी सेवा तुम करो, सुफल कबीर कहैं सेय ॥
सुनके विष्णु कृष्ण औ रामा । पुलकित भये तब विष्णु सुजाना
पूछा निरंजन कस खुशियाला । कबीर नाम सुन गात रिसाला ॥
कहैं विष्णु हम अति पुलकाने । हमपर दया कबीर बहु ठाने ॥
कहैं निरंजन तेहि बड भागी । दीन्हो जाय कबीर सोहागी ॥