कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीता ।
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यह सुन कृष्ण कहा मोहि सेती । जात मनुष्य गुरु कहे अनेती ॥
तुम ठाकुर कहो कौन सजाई । कहे नारद तुम कहो बुझाई ॥
कृष्ण कहा भरमो चौरासी । तब छूटे ऋषि यम गर फांसी ॥
ताते तुम पहुँ आयउँ स्वामी । कहो सो करहुँ मैं अंतयंगिनी ॥
अब तुम कहो कृष्णसों जाई । क्षित चौरासी लिख दिसलाई ॥
तब हरि लिखें पृथ्वी चौरासी । लोट पोट कर छटे फांसी ॥
चले ऋषि गुरु कहैं सिर नाई । ठाकुरसे गये विनती लाई ॥
लिख देव स्वामी मम चौरासी । बूझ लेव तब भर्मउ दासी ॥
लिखा कृष्ण भूतल अघरवानी । लोटहिं नारदमुनि विलखानी ॥
कहे कृष्ण तुम यह का काहूँ । महि महीं लोट रेहे तुम करहूँ ॥
भरमो चौरासी हरि सुन वैना । हरि भर आये जल धर नैना ॥
कहें ऋषी यह बुध किन दीन्हा । कहें ऋषी गुरु मोक्ष मम कीन्हा ॥
कहा कृष्ण अस गुरु परतापा । गुरुसम जग हित नहिं पितुभाता ॥
पिता निरंजन गुरुसम मोरा । गुरु दुरवासा ऋषि गतघोरा ॥
सदृढ़ सचकवीर हमारे । कवीरके शरण इकोतर तारे
दोहा—कहें कृष्ण सुन नारद गुरु, बढेके द्विजराज ।
कह ऋषि गुरु सबते बढे, गुरु गरीब निवाज ॥
गुरुसम काहु न देख गोसाई । करता पितु जननी ओ भाई ॥
गुरु हैं सवपर ईश गोसाई । कहें कृष्ण नारद समुझाई ॥
नारद ऋषि उठ चरणन लागे । श्रीपति तुम मोहि कीन्ह सुभागे ॥
जो हम ब्रह्मा सुत बड ज्ञानी । गुरु विन इतने बात न जानी ॥