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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

राजा छत्रजीतकी कथा

४

कबीरकृष्णगीता ।

मन वचके जो साधू सेवा । ताकहैं छोड़ि सके न जमदेवा ॥
साधु देह घर भजहिं जो रामा । सदुरु भाकि प्रताप सुखधामा ॥
सुखके धाम आह सतलोक । सतनाम भज जीव निसोका ॥

राजा छत्रजीतकी कथा ।

राजा छत्रजीत छत्रधारी । करे भाकि कुल लाज बिसारी ॥
इच्छाभोजन सब कहैं देई । जो इच्छा माँगे सो लेई ॥
राजा रहे कबीरके शीषा । सर्व जीवपर दाया दीषा ॥
आतुर होय कहे इंद्र भुवारा । अब तो राज न रहे हमारा ॥
राजा छत्रजीत चलि आवा । इच्छा भोजन सबहिं खवावा ॥
बोले कृष्ण इंद्रसन आई । कबीर भजेते प्राण बसाई ॥
इन्द्र उवाच ।

कहैं इंद्र अब केहिपर जाऊँ । हम आये राखहु मम भाऊ ॥

कृष्ण उवाच ।

जो अब तुव आवनमें राखो । निर्गुण भक्त दोह किष भाषो ॥
जो हम निर्गुण भक्त दुखावैं । निराकार मोहि नरक डुबावैं ॥
और सबनपर मैं सरदारा । कबीरके संतसे जम सब हारा ॥
कबीरको मनुषजानो मत कोई । कारण करण कबीर है सोई ॥
निराकार निरंजन देवा । तिन कह सत्त कबीरको भेवा ॥
पिता निरंजन हम सो कहेऊ । जब कबीर तब कोई नहीं रहेऊ ॥
कहैं निरंजन राज जो मोरा । सो दीन्ह कबीर बंदीछोरा ॥
कबीरके दिये करें हम राजू । कबीर भेवक मम सिरताजू ॥

कबीरकृष्णगीत ।

५

और सबे हैं जमके चेरा । भजें कबीर तेहि सतपुर डेरा ॥
कहैं कृष्ण जानहु सो करहु । कबीर बालकके पाछन परहु ॥
कृष्णबचन लख सबहिं उदासा । कहैं अजहूँ चल देखहु दासा ॥
ब्रह्मा रुद्र नारद सब देवा । रज तम संग जीव सबे चलेवा ॥
इंद्र आद नारद सो भाषी । चलो जाय देखहुँ मैं आंखी ॥
सबे अधर धर प्रगटे गोपा । नारद धार नृप गये कोपा ॥
सात दिवस निशिके हम भूखे । इच्छाभोजन विन हम खूखे ॥
जाय सेवटिया नृप सो कहई । क्षुधावंत द्वारे नृप अहई ॥
राजा कहा पूछहु तुम जाई । इच्छा भोजन कौन गोसाई ॥
जाय सेवटिया ऋषिसों पूछा । भोजन कौन आय तुव इच्छा ॥
तव नारद कहै तोहि कह कहहीं । कहौ ताहि राजा जो अहई ॥
जाय सेवटिया नृपसो भाषी । द्विज नृपसो कहवे चित राखी ॥
राजा आय कीन्ह परणामा । कछु ऋषि कहु इच्छा भच्छकामा
नारद कहैं इच्छा चित मोरा । सर्व मांस खाऊं भर थोरा ॥
सर्व मांस सुन राजा डरेऊ । सर्व जीव हतको डर भरेऊ ॥
नृप ऋषिकहैं बैठक दीन्हा । आप गमन भवन निज कीन्हा ॥
मंदिर जाय ध्यान गुरु कीन्हा । तुरत कबीर दरश नृप दीन्हा ॥
राजा चरण पखार सो पान कराये । नारद सुनिके कथा सुनाये ॥
सर्व मांस चाहे अन्याई । सट्टरु आप दया डर लाई ॥

कबीर वचन ।

कहैं कबीर सोच कछु नाहीं । देहु मीन ले तिनके पाहीं ॥
सर्व मांस है मीनशरीरा । गउ सूकर नर सकल सधीरा ॥

६

कबीरकृष्णगीता ।

भिक्षा पटार और खरचारा । भवै मीन सो सूतक झारा ॥
मीन कीरा सो तुरत मगाये । शूद्र हाथ दे राय पठाये ॥
नारद देख कोप होय ऊठे । लेहिं न मीन जाय तब रुठे ॥
जाय दास नृप सो अथाई । ब्राह्मण रुठा जाय गोसाई ॥
उठे कबीर राय तेहि बारा । आय ठाढ़ भै सिंह दुवारा ॥
आपन रूप छिपाय कबीरा । साधुरूप होय मुनिसो भीरा ॥
कहै साधु सुन जपके अंसा । सर्व मांस तैं भष निहंससा ॥
नारद कहै जीवन जिव मारी । सबकर मांस मैं भषत अहारी ॥
कहै कबीर राजासों वाणी । कलिके विष जाय अघखानी ॥
अब नृप मालुष बहुत बोलावहु । तिनते सब तर रुधिर मंगावहु ॥
जीवन मरे रुधिर सब चाही । सप सरोय अब सबके लाही ॥
एक कहत धाये शत कोटी । लाये हेर रुधिर भर लोटी ॥
सो ले धरा ऋषीके आगे । सर्व मांस अब लेहु अभागे ॥
लोहूते होय मांस तुच हाडा । सर्व मांस भषतैं अब गाढा ॥
नारद देख अचंभा भयऊ । हो नृप यह बुध को तोहि दियऊ ॥
कहा नृप सतनाम कबीरा । सो हमरे रक्षक गुरुपरा ॥
सो समर्थ मम सङ्कट निवारन । औ सब जीवके विथा विडारन ॥
तब कबीर निज रूप दिखावा । नारद प्रतीत भये पतिआवा ॥
नारद सुनहु श्रवण दे वैना । कहै कबीर अलख लख नेना ॥
कस तुम फंद रच्यो इहँ आई । भेटो अजहूँ सबै नसई ॥
डोप तोहे नरक लै नारद । राख सके को गनपत शारद ॥
नारद बेग नृपके पग धारे । राजा बकसहु चूक हमारे ॥