कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 35, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीता.
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नारद वचन ।
प्रभु तुम कहेउ प्रथम हम ईशा । पुन बूझा तो निरंजन सीसा ॥
सीस जाय अब अंते लागा । सत्कवीर सीस अब जागा ॥
बिन कवीर मुक्ति जिव नहीं । योग यज्ञ बहु जतन कराहीं ॥
यह दंडवत तुमकाकंह कीन्हा । ताकर मोहि बतावो चीन्हा ॥
विष्णुवचन ।
सुन नारद हरि कहैं बुझाई । गुरु पितु मात साधु सिर नाई ॥
सत्कवीर कहैं कीन्ह प्रणामा । आय दरश दीजे सुखधामा ॥
कवीरके शिष्य राजा निरमोहा । ताहि प्रणाम कीन्ह बहु छोहा ॥
धन्य राजा निरमोहकी वाणी । हर्ष विशेष कछु लाज न हानी ॥
नारद उवाच ।
कह नारद मैं देखों राजा । तिनके दरश होय मम काजा ॥
धन्य निरमोह जेहि कृष्ण सराहा। उनके दरश करें चित चाहा ॥
आज्ञा करहु जो श्रीयदुराई । तो निरमोह दरश कर आई ॥
आज्ञा किये दरश गये करहु । दरश निरमोह जियत जिव तरहु ॥
राजा निरमोहकी कथा ।
चले ऋषी दरश निरमोहा । सभा निरमोह तर गये निरमोहा।
नृप निरमोहके एकहिं बारा । गयेउं कुटम चार सुत बारा ॥
नारद जाय द्वार होय वैसे । ससै शुल भूप धर जैसे ॥
सुंदरी एक अब कहा बुझाई । नृपकर सुत नियते मर जाई ॥
ले संदेश नृप सुतके आयऊं । भये परले ऋषि रौर करायऊं ॥