कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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बरसे पानी बहे समीरा । तरुवर डोले अतहि गंभीरा ॥
चरन जाउं डरपौ दिन राती । जस भंजर टोरे कोइ छाती ॥
भयउं वृक्ष तब छीले छाला । कोइ जर काट करे वेहाला ॥
गउ भयेऊं तब दुख कछु थोरा । पुछमान गउ वृक्ष अंजौरा ॥
बकरा भया चला बल देने । फांसी लगाय गरा गहि लीन्है ॥
खैंचे जाय वेदरद कसाई । भोथा शस्त्र सो गला कटाई ॥
अधमरा काट दिहिसभोहिडारी । छूटे न प्राण महादुख भारी ॥
लेकर विप्र गये घर अपना । काटेसि गर छिन मिटी कल्पना ॥
चीन्तूर भयेउं वसेउ तेहिमाहीं । टोय निकरेसी रुधिर पियाहीं ॥
मलत २ मारेसि अध मरके । दीन्हैसि डार हाहूतमह धरके ॥
बडे कष्ट छूटा तहैं प्राणा । सर्पखान जिव जाय समाना ॥
जहैलग सर्पखान जो जितनी । भमैंउं सब अजगर अवजोनी ॥
अजगर तन अतिभये मितभारी । लूक आग तन निशिदिन जारी ॥
भूखन मरही प्यासन मरही । तेहिपर अष्ट काल निशि जरही ॥
भारी देह चला नहिं जाई । दलमैं परे अहार भक्ष खाई ॥
दस हजार कोइ बीस हजार । सहस्र पांच शत कोइ जियारा ॥
अस जीवनसो मरना भले । पाख बीते कछु भोजन मिले ॥
जिया जंतु जो सोहैं धावे । स्वास संग खैंचि सुँह आवे ॥
महाकष्ट दुख अगम अथाहा । धन्य गुरु जिन तह निरवाहा ॥
सरगुणके गुरुको क्या देश । सोई देय कहुँ पास जो जैसा ॥
निगुण भक्त बिना गत नाही । मिला कबीर सब त्रिखा बुझाहीं ॥
और सुनहु चौरासी पीरा । भिक्षा माहिं भयऊं तब कीरा ॥