कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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कबीरकृष्णगीता ।
अविनाशी राम सोइसत कबीरा । सो मम सतगुरु अजर शरीरा ॥
ऐसी संगत हमरी पांडे । हम सब जीवहिं जाने भांडे ॥
कहो कुंअर अस संगत तोरी । सुनहु ऋषी अस संगत मोरी ॥
जैसे पथिक बसे सराई । प्रात भये अपने पथ जाई ॥
कोउ काहूको बात न पूछा । प्राण गये जस काया छूछा ॥
हम सबके जीवन सतनामा । सतसंगत गुरु भक्त विथामा ॥
नारद उठ परिक्रमा कीन्हा । तब चूप सुतहिं जो बैठक दीन्हा ॥
ऋषी विनय कर पाक कराई । नाना व्यंजन परसे जवाई ॥
दोहा-बिदा भये ऋषि नृपते, आप नगर महद्देख ।
हर्ष विस्मय ऋषि चित्तमें, कला निरमोह अलेख ॥
एक चमार चलेउ पुर माहीं । सोई मृत्यु कहैं रोवत नाहीं ॥
तहां जाव नारद भये ठाढा । कृत्य करत मृतुक ले काढा ॥
तब ऋषि पूछा सभरहि जाई । कस नहिं रोवस मनुष भराई ॥
हाडी कहै रोवहिं कोहि लागी । गुरु मुख होय मुख अतुरागी ॥
साकट भरे काल मुख जाई । गुरुमुख तनतज हरिपहैं जाई ॥
राजा भयो कबीरको शिष्या । हम सब रामचरण चित लिख्या ॥
राम भजे सो साधुकी चाली । भिला कबीर भिटा जंजाली ॥
जो जन्मे तेहि मृत्यु कर लेखो । महितन अच्छत जियत ना देखो ॥
जिन प्रभु दिया तिनहिं हरलिथा । मरन जियनकी सोच न किया ॥
ऐसी संगत आय हमारी । कैसी संगत कहो विचारी ॥
ऐसी संगति ऋषि सुनि मोरी । तिरबो अस जस लकडी जोरी ॥