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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

महादेव और कबीर सम्वाद - योगका वर्णन

१४०

कबीररुणगीता ।

कहैं अज सत्यकबीर संवादी । हम सब शिशु क्रीतमलघुवादी ॥
अन चीन्है हम बाद बहु कीन्हा । बरुसहु सत्यकबीर प्रवीना ॥
अब तो शरण तुम्हारी आये । यम अवगुण क्षमा प्रभु लाये ॥

कबीरवचन ।

कहैं कबीर सुनो अज वाणी । मात पिता शिशु घट नहिं यानी ॥
जो हम क्रोध करो तुव सबपर । को तोहिराख सके अज हरिहर ॥
तुन तीनोंके पितु महकाला । निराकार सब करे विहाला ॥
हम तुम सबको प्रथम चेतावा । गहो शरण होय जिव सुत्कावा ॥
तब तुम गर्भवासमहैं भूले । ताते फिर २ योनी झूले ॥
जब सिर टेकेउ ऋषिदेव कारा । तब कबीरके शरण पवैरा ॥
कबीरके नाम शरण प्रतापा । उलटहिं जाय कालहिं चांपा ॥
कहैं कबीर सुनहु तुम चित दे । हृदय कबीर नाम जप हितकै ॥
जो जेहि नाम सुमरे चितलाई । हृदय कबीर नाम लौलाई ॥
दोहा-निशि दिन सुमरहु नाम मम, यमते रहहु निसंक ।

शब्द निरख पंथ गवनहु, गुरु पितु जेहि न कलंक ॥

चरण चूम अज सीस चढाये । तत्क्षण रुद्र जो गमन लाये ॥
कहैं महादेव विनय बहूता । कहहु कबीर योग सतमता ॥
केतिक स्वास चले दिन राती । किम घर बरे तेल विन वाती ॥
केते हांथ धरती आकाशा । कौन देवको कहां निवासा ॥
केतिक नदी केतिक गिरवरतन । कौन सिंधुको गाय कहावन ॥
कौन अमावस कौन परीवा । कौन पुत्रवा कौन ग्रह धरिवा ॥
केतिक रुधिर कायाभैं आही । वगन ओंकार फेर कित आही ॥
पांच तचहैं काहे नामा । और पचीस नाम पंच बाभा ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१४१

काया माहिं कै अंस हैं ताता । सोकहु कै अंस आहिं तन माता ॥
कौन तत्त केहि जोनी साजा । योग भलाके भोगे राजा ॥
श्रुतुक मरे जरे तन क्षारा । परम पुरुष होय तनते न्यारा ॥
कौन देह धरि नरक भोगाई । को है सेवक लेय भिलाई ॥
चौदह सुवन कायामहैं काही । कहिये तन प्रचे मोहि पाही ॥
पांच सत्तका रंग कौन है । विन मंदिरका है सो कौन है ॥
कौन योगीको सिंगी बजावे । कौन आसन कौन विभूत रमावे ॥
काहेकी डिब्बी काहेका ढकना । कौन बेगाना को है अपना ॥
कौनसो चावल कौनसो दाली । कौनसी अगिन जात कहिवाली ॥
कौन कपिल को देवता आही । केतिक अनपा कहाँ जपाही ॥
विनती कर शिव पूछहिं भेऊ । कहैं कबीर सुनहु सब कोऊ ॥
योग यज्ञ तप तीर्थ कर्म काटा । यह मत चलि जिव बारह वाटा ॥
सार भक्त विन तरे न कोई । चहुं युग भक्ति श्रेष्ठ गुरु सोई ॥
कहैं कबीर सुन प्रेतके ईशा । गहहु देव पथ तारहु सीसा ॥
तुम सब लीन्ह पान परवाना । भक्ति चावल चित तज मम कामा ॥
एक २ अंश देहते काढहु । तेहि पितु सेव राख पितु बाढहु ॥
दोहा—अपनी अकित दुतिअन, सिरजा तीनो देव ।
बनिजा तीनो छट्टुर मिले, क्रीतम देव पितु सेव ॥
छै सौ बीस सहस्र इकईसा । येतिक स्वास दिवस निशि ईसा ॥
मनु पवनाको धायियो तारी । विना तेल औ दीपक वारी ॥
साठे तीन कर क्षीनीजहैंथा । आंगुर चार अकाशको माथा ॥
मल निकास बछ गनपत राजा । रिद्ध सिद्ध समसावत्री विराजा ॥
सकल सिद्ध मिल गुरुपद सेवा । गुरु विन गनपति भक्ति बहेवा ॥

१४२

कबीरकृष्णगीता ।

पृथ्वी तत्त्व तिष्ठत तेहि बारिज । पृथ्वी समान साध तेह कारिज ॥
सोह चतुरदल विधु सूरंगा । नाम बीच अजपा सोहंगा ॥
सोहंगका विन डोर कमला । जपे सो अमृत नाम दयाला ॥
षट्पत्रपद इंदी अस्थाना । बला सावित्री तहँवा जाना ॥
रजगुण पीत वरण सो पंकज । षट्सहस्र अजपातहँआपअज ॥
आप तच तहँ कीन्ह निवासा । विषै निरंजन काम यम फांसा ॥
केवल सो अष्टदल नील सुरंगा । विष्णु देवता लक्ष्मीसंगा ॥
सबगुण षट्सहस्र अजपा जप । सत्यनाम सम नहिँ कोइ तप ॥
वायु तत तहँ गांठ वंधानी । नाभचक पवना घर जानी ॥
कीतम घर तन पवन सोहंगा । आद अमर घर सदुरु संगा ॥
जाके बस सोहंग है भाई । सोई सत्यकबीर गोसाई ॥

दोहा--आद पवन सोहंग है, क्रीतम वायु तत पांच ।

जहांते सोहंग ऊपजा, कहैं कबीर सो सांच ॥

शिव शारदा दस हियकमला । स्फटिक वर्णअतिसोहेपदअमला
तेज तत वडवानल चितंगी । हृदय दरश गुरु सदुरु संगी ॥
षट्सहस्र अजपा तहँ होई । शिव सक्ती गुरु शिष्यधरसोई ॥
द्वादसदल पंकज कंठ अथर । तत अकाश त्रिगुण मनस धर ॥
अय परम शिव दस द्वादसी । स्वांतकीलक्ष्मीमहाविष्णुसंगवसी
एक सहस्र अजपा तहँ होई । सञ्ज रंग बरते पद सोई ॥
सञ्ज स्याम जेठ लघु भाई । सञ्ज रिस्वाम लखि जाई ॥
कंठ केवल दल षोडश पूरा । तहां वस्तु जिवसकलरंगसूरा ॥
अजपा छै सो नाम विहंगा । सुरत निरत सो सदुरु संगा ॥
भंवर गुफा दोय दल पद सोहा । परमहंस बसे नृप निरमोहा ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१४३

एक निरमोह सुरत सतनामा । दुतिय निरमोह कबीरशिष्यराभा
स्याम लालभी रंग सोहाई । अजपा सहस्र कबीर लखाई ॥
सहस्रकमलदलाझलमिलझलके । मन पवन झीर मानसरोवरसे ॥
सुरत कमलपर सट्टुर वासा । एक सहस्र अजपा प्रकाशा ॥
गुन गुहिंज निरगुण सरबादी । शब्दसरूप सुरत संग स्वादी ॥
वतिस पट्टम पत्र गुण गाना । सुखा कंबल गुरु दरश पयाना ॥
दलअसंख्यकोकरवलसो भूला । जेहि २विन शून्य २ अस्थूला ॥
असंख्यदलकंबलकेदेखहुआगे । सतसाहेब दसमे बढभागे ॥
सतसाहेब सतनाम कबीरा । कहै कबीर हम सकल शरीरा ॥
हंस हमार सकल भत ताते । जीवधातके निकट न जाते ॥
कहै कबीर सुनो वृषवासन । काया लखहु देवन जहँ आसन ॥
अट्ट कोट पर्वत तहँहाडा । नौ सौ नदी समानीजेहिभांडा ॥
ज्ञानहीन जिव रात अमावस । पूनम चाँद गहुजगतगुरुआवस ॥
गुरु सट्टुर कबीर मिल तरना । कलश सवांरहु रतन सुवरणा ॥
सवा हाथ नभको गगन घर । वरणहु एक २ सुन संकर ॥
पृथ्वी आप तेज वायु अकाशा । यही नाम पंच तत्व प्रकाशा ॥
और सुनहु पांचहुके भाजा । ताते जीवन पोत दो मरजा ॥
पृथ्वीतत्वकी सुनहु प्रकृती । गुरु प्रताप कहैं संतन जीती ॥
असत भेद नारि तुच रोमा । बंधु पंच यह पृथ्वी तत भोमा ॥
लाल भसेव सुकल सोभ सुनं । पंच बंधु वह आपकी सुनं ॥
वायु तत्तकी भारजा बोली । लिये पवन फिरे उठन खटोली ॥
गावन धावन बोलन अगोचर । अटवा नतसी प्राणन दूसर ॥
क्रीतम वायु पंचतत्त संग तेहि बंधु।तेहि मुख बैन बोले भज नंद ॥

१४४

कबीरकृष्णगीता ।

नासिका वाट आवे जाई । रमता राम स्थिर न रहाई ॥
स्थिर पुरुष सत्यनाम कबीरा । मरे न जरे न धरे शरीरा ॥
तेज तत्तकी बंधु कहाई । तृषा क्षुधा आलस जमुहाई ॥
निद्रा मिल पांचो तजे दासी । नाम भक्त विन यमकी फांसी ॥
लज्जा शंका हर्ष शोक मोहा । यह अकाश बंधु संदोहा ॥
कहे कबीर सांचा मोहि भावे । सांचा सो जो सद्गुरु गुण गावे ॥

कबीरवचन ।

कहे कबीर हम नाम लखाई । सद्गुरु विन कोइ सुक्ति न पाई ॥
मम भये शिव नाचन लागे । कर गहि हरको दुलारन लागे ॥
सुनहु शंभु पूछहु प्रचारई । इतना सुन नाचत हो भाई ॥
जो पूछेहु तेहि महाँ कछु बाकी । सो सुन लेहु मह पंथ ताकी ॥
दूत तुम्हार फिरहि संसारा । पुण्यहि पापी दोनो लै जारा ॥

महादेववचन ।

कहे महादेव सुन सतनामा । तुव सेवक जो हम तेहि कामा ॥
पाप पुण्य है त्रिगुण बाजी । बेद ठेल त्रिपतात्रिक साजी ॥
पाप पुण्य है यमके खेती । दया सत् प्रधारथ सुनेती ॥
हमहु चले कुपंथ ढर ताता । तापर प्रबल अष्टंगीमाता ॥
अपने पुत्रहि जो धर खाई । आनहिं कस छोडे भाई ॥
पितु आज्ञा हम बहु जिव चांपा । परे आन हमरे सिरपापा ॥
ताते शरण तुम्हारी आये । काल पितारे आप बचाये ॥

कबीरवचन ।

कहे कबीर भल होय सब केश । जरा मरण सतनाम निबेरा ॥
अब तुम जात भातु तन बूझहु । तन स्वासा स्वासा गम सुझहु ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१४५

एकको लोहु एकको पानी । दौय मिल सिरजा विदेहनिस्सानी ॥
निहअक्षर निहतत्तसो निरगुण । अमी नीर विन कुंभक सरगुण ॥
सट्टुर शब्दसे खागी धरनी । उर्ध्व सुरत सोहंग परवनी ॥
पितुके बुंदसो हाड औ गूदा । मांस रक्त औ येद औजूदा ॥
पुन पितु अंस रुधिर तन तबलों । तबलहि तन श्रोनित जिव जबलों ॥
चार अंस तनमहँ पितुकेरा । पांच अंस माता वन घेरा ॥
एक अधिक माता गुण भयऊ। चित देखो पन सतगुण कियऊ ॥
पौन आगे परा चल पाछे । धरिया माहिँ तन कछनी कांछे ॥
पिता पौन ले सांचहि दारी । तब जिव परा परातम नारी ॥
आतम परमातप जिव संग। नांद बिंदु मिलना मत रंगा ॥
अब जो अंस सुनहु शिव आही। जे जननी सो जो इन होय खाही ॥
जेहि जननी तन पांच प्रकृती । रोम चाम नख दंत भगोती ॥
जत द्वार तन तत भग जानी । आद लिंग सोहंग बखानी ॥
आठो पहर करे रति सोई । आवागवन महा दुख होई ॥
जबलग अमरलोक नहि पहुँचे । आवागौन भग भोगि विगूचे ॥
भक्त करे तो बारहि नीकी । भक्त बिहून सकल जग फीकी ॥
कीतम निरंजन पितु मम आही। तनके मात पिता यह साही ॥
जीव सब सत्यनामके आही । सत्यकबीर सतनाम लखाही ॥

महादेववचन ।

कहैं शंखु संसे गढ़ मोरी । तुम दयाल मम बंदीछोरी ॥
अब साहेब कहु जीवत लेखा । कौन तत्त कोहि जोनि परेखा ॥