सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 37

कवीरकृष्णगीता ।

२३

नृपाति वचन ।

कहे नृप ऋषिसौ कहैं सो साँचा । राज करनको देही काँचा ॥
हम सबके संगत दिन चारा । मरनो रोर न धन वित धारा ॥
आन मरे तो रोइये भाई । मरन आप अमर रहि जाई ॥
गुरुमुख मरे रोवे नहिं भाई । साकट मरे विकल होय जाई ॥
गुरुमुख भये काल भौ नासा । साकटके गले जमको फाँसा ॥
बहुरि समुन्नत ताही नहिं रोई । दाया सतसाहेबके होई ॥
सतसाहेब सतनाथ कबीरा । तिनके हम सेवक रणधीरा ॥
हमरे साहेब यह कह दीन्हा । जीव सुये चिंता नहिं कीन्हा ॥
चिंता सोइ सुमरिये नामा । सब चिंता येटे सतधामा ॥
जो आये हमहू तन धारी । रहेन कोइ राम कृष्ण नरहारी ॥
गुरुसेवा सोई शुभ कामा । और सकल जग काम अकामा ॥
गुरु जब मिले सद्गुरु पूरा । जीव बचावे जमसो सूरा ॥
जालिम काल निरंजन बाँका । त्रिध देवा निस लावहिं आसा ॥
सबकहैं खाय निरंजन राई । बांचे सचकवीर लौलाई ॥
ऐसे संगत हमरे स्वामी । कैसे संगत कहु नृप नामी ॥
कहैं निरमोह सुनो ऋषिदेवा । उतरे पार लोग एक सेवा ॥
जो जहँके तहँवा चलि जाहीं । कोउ काहूको पूछत नाहीं ॥
आपन २ समर्थ साथा । आदनाम समर्थ सुखदाता ॥
समर्थ गुरु साधुकी सेवा । तजे आस सब देवी देवा ॥
तीर्थ व्रत तप योग यज्ञधर्मा । गुरु विन मरे कालबरवंधा ॥
गुरु सोई जो अंतहु भीठा । जन्म मरण गुरु लागिह सीठा ॥