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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

धर्मराजकी सभा

अथ

कबीरकृष्णगीताप्रारम्भः ॥

उक्ति विष्णुव्यासवाणी—चौपाई ।

सुमिरो सचनाम गुरु नामा । साधुस्वरूप गुरु विसराया ॥
वक्ता विष्णु व्यास श्रुति वाणी । गुरुप्रताप सकलो गम जानी ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश देवादी । तैत्तिस कोट देव संवादी ॥
सुनि नारद इंद्रादि अहीशा । सरस्वती गणपति जगदीशा ॥
बैठे सबै विष्णु मुख हेरा । पापपुण्यका करहिं निवेरा ॥
चित्रगुप्त तहां कागज लिखहीं । जेहिपर जेते बाकी अहहीं ॥
कितहुं निरति भजन गुरुनामा । कितहुं तो माया मनकामा ॥
पाप पुण्य बंधन जमफांसी । नाम विना भरमें चौरासी ॥
पकडे जीव चोरकी नाई । मारत सुगदर रोर कराई ॥
सासत खाय जीव अपराधी । यम लावे साकट कहैं बांधी ॥
करे पुकार सुने नहीं कोई । गुरुविन साकट परले होई ॥
जीवधात आमिष भस् जेते । अग्निकुंडमें झरकें तेते ॥
अग्नि जारके नरक बुडावे । नरकभर सिर निकसन आवे ॥
जब जिव सीस काठ दम लेहीं । तवहीं जम सिर सुगदर देहीं ॥

२

कबीरकृष्णगीता ।

लोहा सरा सा सिसखेधके गाडे । पिबहिं नरक जिव परवश पाडे ॥
त्रिगुण भक्त जिव तजे न काला । त्रिगुणभक्त काल भगजाला ॥
परनारी परद्व्य तलासी । तेहिंते ढारि दैय गरव फांसी ॥
ओझा डाइन चोर वटपारा । परे नरक जो खेले शिकारा ॥
साधु देख जिन बदन छिपावा । जम सिर सुगदर ताहि ढहावा ॥
मिथ्या वाद चुगल हंकारी । मित्र द्रोह ले नरकहिं डारी ॥
कृणबंधन निज आतमघाती । बंधुघात जम तोरैं छाती ॥
विश्वासघात दै लेय बहोरी । अघोर नरकमें तेहिं ले बोरी ॥
बैरागी ब्राह्मण संन्यासी । शस्त्र वांध भ्रमैं चौरासी ॥
गुरु पितु मातुकी करे नहिं सेवा । भ्रमैं तीरथ पूजत बहु देवा ॥
ब्रह्म तजि जो पूजहिं भूता । अघोर नरक देहीं जमदूता ॥
आतम तज जा पूज पषाणा । शिलाखूप देहीं भगवाना ॥
बृद्ध मनुज जो करहिं विवाही । सूकर जन्म नरक भार वाही ॥
वेश्यागमन विश्वाकर बेटा । तेहि पीछे होय ब्राह्मको घेटा ॥
त्रिया पाते तज जार जो राती । लोहमेश जम तोरहिं छाती ॥
तेहिपर आनि अग्नि धधकावैं । छेद बेध जम अनल जरवैं ॥
मात पिता तज त्रिय प्रतिपालैं । ताहि काल आवामैं डालैं ॥
बापको कुल तज जो सासुर वसैं । ताके सिर भसान चढ हसैं ॥
बहिनी गांव वसे जो प्राणी । पितृपछ त्याग संग्रह अवखानी ॥
अजिया सुत जिन बंधोर भाई । अजिया फिर तेहि खाय चवाई ॥
दिन दस भक्त करें अज्ञानी । बहुर मलेश दशा लपटानी ॥