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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

आदिमंगल। ( २३ )
बचनमें आवै साहब तौदुहुनका मालिकहै उनकी कहबाई कहाकरै जो कहौं
सब कें मालिक श्रीरामचन्द्रहैं यह कहतई जाउहौ औकहौ कि मनबचनमें नहीं
आवैहैं यहबड़ो आश्चर्य है सो सत्यहै ये कबीरहूजीकहैं "किरामो नहीं खोदाई"
काहेते रामो नहीं खोदायहौ कहै हैं "रामै नाम अहै निज सारू । औ सब
झूठ सकल संसारू" ॥ इत्यादिक बहुत प्रमाणदै कै बीजक भरैमें रामैनामको
सिद्धांतकियेहै ताही में याको समाधानहै औताही में कबीरजीको बीजकलागै हैं
औरीभांति अर्थ किये नहींलागै है। सोसुनो जो साहबको रामनामहै ताके साध-
नकीन्हे ते वहमनबचन के परेजोरामनाम ताकोसाहब देइ है सो वह नाम याकें
बचनमें नहीं आवैहै साहिबै क दीन्हेते पावैहै । जब याको संसार छूटयो तब
अपने लोकको साहब हंसस्वरूप देइहै तौनेहंसस्वरूप में टिकिकै साहबकोदेखै-
हैंनामलेइहैं साहब साहबको नाम साहबको लोक साहबकोदियो हंसस्वरूप या
प्राकृत अप्राकृत मन बचनके परे हैं तामेंप्रमाण ॥ “ यतोवाचोनिवर्तंतेयत्पर-
म्ब्रह्मणःपरम् ॥ अतःश्रीरामनामादिनभवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः ”॥ औ यह रामना-
मके जपन की विधिजैसी २ कबीर जी अपने शब्दनमेंकह्योहै तेहिरीतिते जो
जपक रै तौ रामनाममन बचनकेपरे जोआपनो स्वरूप सोयाके अंतःकरणमें अस्फ़ू-
र्तिकरि देयँ हैं औ साहब को रूपअस्फूर्ति करिदेयँ हैं अर्थात् आपहीअस्फूर्ति हैजायहै
तामेंप्रमाण ॥ “ नामचिन्तामणीरामश्चैतन्यपरविग्रहः । नित्यशुद्धोनित्यमुक्तोन
भिन्नन्नामनामिनः ॥ अतःश्रीरामनामादि नभवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः ॥ स्फुरतिस्वयमे-
वैतज्जिह्वादौश्रवणेमुखे” ॥२॥ सो यही रामनाम जो मनबचनके परैहै ताही को
कबीर जानै ॥ “ सो जानै जेहिमहीं जनाऊं । बांह पकरि लोकै लै आऊं ॥
सहज जाप धुनि आपै होई । यह सँधिबूझै बिरला कोई ॥ रग २ बोलै रामजी
रोम रोम राकार । सहजै धुनि लागीरहै सोई सुमिरणसार ॥” ओठकंठहालैनहीं
जिह्वानाहिंउच्चार । गुप्तबस्तुको जो लखै सोईहंसहमार ॥ जो हंसरूपमें टिकिकै
जपत रहेहैं तौनेमें प्रमाण भक्तमालके टीकामें श्रीप्रियादासजीलिख्योहै ॥ “बिनै
तानो बानो हिय राममड़रानो” ॥ श्रीमहाराजाधिराजरामसिंहबाबा पूंछ्योहै
तब कबीर साहबकह्योहै॥ “राअक्षरघट रम्योकबीरा ॥ निजघरमेरोसाधुशरीरा” १
तातेरामनामही को परत्व बजिकमें है मुक्ति रामनामहीमें है और साधनमनह!

( २४ ) बीजक कबीरदास ।
है यह कबीरजी बीजकभरमें कह्यो है। और अर्थ जे करैं हैं ते बीजक को अर्थ
नहीं जानैंहैं काहेते भागूदास बीजक लैभागेहैं सो बघेलवंश विस्तार में कबीरहीं
जी कहि दियो है कि अर्थ नहीं जानै हैं तामें प्रमाण ॥ “भागूदासकी खबरि-
जनाई ॥ लैचरणामृत साधूपियाई ॥ कोउ आयकह कलिंअर गयऊ । बीज-
कग्रन्थचोराइलैगयऊ॥सतगुरु कहैं वहनिगुरापन्थी । काह भयो लै बीजकग्रंथी ॥
चोरी करि वह चोरकहाई काह भयो बड़ भक्त कहाई ॥ बीज मूल हम
प्रगट चिन्हाई ॥ बीज न चीन्हो दुर्मति ल्याई ॥ बघेलवंश में प्रगटी हंसा ।
बीजक ज्ञान को करी प्रशंसा ॥ सबसों पूछी प्रेम हिंताई । आप सुरति आपैमें
ल्याई ॥ बीजकलाय गुफा में राखी । सत्यै कहौं बचन मैं भाखी "॥ सो
और २ अर्थ जे कबीरहा करैं हैं ते भागूदास औ भगूदास के शिष्य प्रशिष्य,
ते बीजक को बितंडाबाद अर्थ करिकै कबीरजी के सिद्धांत को अर्थ जो राम-
नामहै ताते जीवन को बिमुख करिदारयो नरककी राहबताय दियो काहेते
दूसरी पोथीतौ रही नहीं वोही पोथी रही तौने को मनमुखी अर्थ करिकै
आपबिगरे औ शिष्यन प्रशिष्यनको बिगारयो जे उनके सत्संग किये ते सब याही
ते नाम तोरहै भगवानदास पै भागूदास कबीरजी कह्योहै । औ मैं जो तिलक
करौंहौं बीजक को सो एकतो साहबके हुकुमई ते कियो है सो आगैलिखि आये
हैं दूसरे तिलक बनाइ बांधौगढ़में आयो तहां बयालिसवंश बिस्तार ग्रंथदेख्यो
ताकोप्रमाण तिलकमैं लिखिदियोहै पोथी पंद्रहसैकैइस के सालकी धर्मदासकें
हाथकी लिखीहै औ येहीपोथी में कबीरजी राजारामते आगम कहिदियो है ॥
“तुमसे दशौ बंश जो ह्वै हैं । सो तौ शब्द हमारो गहि हैं ॥ परमसनेही अनु-
भव बानी । कथिहैं शब्द लोक सहिदानी॥२॥तेहिते मैं जो अर्थ करौं हौं सोई
कबीर जी का सिद्धांत है” अनुबन्ध चतुष्टय-अधिकारी औ यह ग्रंथ में
चारि साधन करिकै युक्त जो पुरुष है सो अधिकारी है चारि साधन कौन हैं
नित्यानित्य बस्तु विवेक १ औ इहामुत्रार्थफल भोग बिराग २ औ दम शम
उपरति तितिक्षा औ श्रद्धा समाधान ई षट्संपत्ति ३ औ मुमुक्षुता ४
नित्यानित्यविवेक का कहावै, जीवात्मा नित्य औ देह इन्द्रिय आदि
दैके जो संसार सो अनित्यहै यहै कहावै नित्यानित्यविवेक औ इहामुत्रार्थ फल-

भोग विराग का कहावै यह लोकके औ परलोकके विषे जेहैं स्रक् चन्दन बनि-
ता यह आदि दै कै जेहैं तिनको अनित्यता बुद्धिकैकै तिनते जो है बैराग्य सो
इहामुत्रार्थफलभोग विराग कहावै औ लौकिक व्यापारते मनकै जो है निवृत्ति
सो कहावै शम औबाह्य जे इन्द्रियहैं तिनकी श्रीरामचन्द्रके संबंधते व्यतिरिक्त
जो विषय है तेहिते निवृत्तिहोब जोहै सो कहावै दम औ श्रीरामचन्द्रको जौं
ज्ञान है तेहि पूर्वक उपासनाके अर्थ विहितजैहैं नित्यादिक कर्म तिनको जो हैं
त्याग सो कहावै उपरति औ शीत उष्ण आदि दैकै जेहैं द्वन्द तिनको जो है
साहब सो कहावै तितिक्षा औ निद्रा आलस्य प्रमाद इनको जो है त्याग तेहि
पूर्वक मनकै जोहै स्थिरता सो कहावै समाधान औ गुरु वेदांतवाक्यमें अवि-
चल विश्वास सो कहावै श्रद्धा औ संसारते छूटिबेकी जो है इच्छा सो कहावै
मुमुक्षुता ई साधना चतुष्टय जामें होय सो कहावै अधिकारी ।
१ विषय-औ यह जीव साहबको है औरको नहीं है यह जो है ज्ञान
सो यह ग्रंथमें विषय है २ सम्बन्ध-औ ग्रन्थको, विषय सो संबंध कौन है तात्पर्य
करिकै प्रतिपाद्य प्रतिपादकभाव ॥३॥ प्रयोजन-औ यह ग्रंथमें प्रयोजन का है
कि मन माया औ अहंब्रह्म जो है ज्ञान तौनेमें बँधा जौहै जीव सो मन
माया ब्रह्मते छूटिकै रघुनाथजीको प्राप्त होय सो प्रयोजन ॥ ४ ॥
जीवको मन माया ब्रह्मते छोड़ायकै श्रीरघुनाथजीके पास प्राप्त करिबेको
कही, अपनी उक्तिते कही, साहबकी उक्तिते कही, मायाकी उक्तिते कही, जी-
वकी उक्तिते कही, ब्रह्मकी उक्तिते कबीरजी उपदेश कियो है । औ उत्पत्ति
प्रकरण कैयो प्रकारते अपने ग्रंथनमें कबीरजी कह्योहै । सो यहां कबीरजी प्रथम
रमैनी में आदिकी उत्पत्ति कहैहैं । जबकुछ नहीं रह्यो है तब वही साहबकों-
लोक रह्यो है ताहीको परम अयोध्या कहै हैं । औ सत्यलोक सांतनकलोक
नौपैदलोक आदि दैकै नाना नामहैं तौने लोकमेंजे हंस हंसनी हैं गुल्मलता
तृणआदि दैकै तेसब चिन्मय हैं औ परमपुरुष श्रीरामचन्द्र सबके मालिक हैं
तामें प्रमाण॥"राजाधिराजःसर्वेषां रामएवनसंशयः ॥ इतिश्रुतेः॥दूसरोप्रमाण ॥
“यत्र वृक्षलतागुल्मपत्रपुष्पफलादिकम् ॥ यत्किंचित्पक्षिभृंगादितत्सर्वंभातिचिन्म-
यम् ॥” इतिवसिष्ठसंहितायाम्॥कबीरौजी कह्यो है ॥“सदा बसंतजहँफूलहिंकुंज

( २६ ) बीजक कबीरदास ।

सोहावही । अक्षयवृक्षतरसेज सोहंस बिछावहीँ ॥ धरती आकाशजहांनहीं जग
मंगै । वहियांदीनदयाल हंसकेसँगलगै ॥”तौने श्रीअयोध्याजी को जो है प्रकाश
तामें शुद्ध जीव जे हैं तेभरे हैं तिनको साहबको औ साहबके लोकको ज्ञान
नहींहै जो साहबको जानै औ साहब के लोक जाय तौ ना उलटि आवै सों
साहबको तौ जानै नहींहै याही ते माया उनको धरि लैआवैहै सो प्रथम साहब
दयाल उनमें दयाकरिकै अपनी शक्ति दैकै उनके सुरति उत्पत्ति करतभये
कि हमको जानै हमारे पास आवै तौ मायातें बचि जाय सो आदिमंगलमें
कहि आये हैं जब उनके सुरति भई तब वे धोखा ब्रह्ममें औ माया में लगिकै
संसारी भये सो साहब बहुत हटक्यो सो हटको ना मान्यो सो आगे
बोलिमें कहेंगे ॥ “ तू हंसामनमानि कहौ रमैया राम । हटल न मान्यों
मोर हो रमैया राम । जसकीन्ह्योतसपायोहो रमैया राम । हमरदोषज
निदेहु हो रमैया राम ॥ ” औ साहबके लोकमें मनादिकनको कारण
नहींहै, तामें प्रमाण ॥ “ नयत्रशोकोनजरान मृत्युर्नकालमायाप्रलयादिवि-
भ्रमः ॥ रमेतरामेतुसतत्रगत्वास्वरूपतांप्राप्यचिरंनिरंतरम् ॥ इति वसिष्ठसं-
हितायाम् ॥१॥ कबीरौ जीकह्यो है ॥ “ तत्वभिन्ननिहतत्वनिरक्षरमनैप्रेमसेन्या
रा । नाद बिंदुअनहदनिरगोचरसत्यशब्द निरधारा ॥”औ साहब को लोक सबके
पार है सो मंगल में कहिआये हैं जो साहब को जानै औ साहबके लोक जाइ
तौ संसार में ना आवै सो तौनै उत्पत्ति श्रीकबीरजी प्रथम रमैनी में संक्षेप तें
कहै हैं औ सबकी उत्पत्ति साहब के लोकके प्रकाश के बहिरेहीते होइहै तामें
प्रमाण ज्ञानसागरको ॥“जानैभेद न दूसरकोई । उतपतिसबकीबाहरहोई॥१॥”

अथ बीजक प्रारम्भः।
अथ रमैनीप्रथम ॥ १ ॥ २ ॥
चौ० जीवरूपयकअन्तरबासा। अन्तरज्योतिकीनपरगासा १
इच्छारूपनारि अवतरी। तासु नाम गायत्री धरी २
तेहिनारीकेपुत्रतिनभयऊ। ब्रह्माविष्णुमहेशनामधरेऊ ३
तबब्रह्मापूंछतमहतारी। कोतोरपुरुषकाकरितुमनारी ४
तुमहमहमतुमऔरनकोई। तुममोरपुरुषहमैंतोरिजोई५
साखी–बाप पूतकी एकै नारी औ एकै माय बिआय ॥
ऐसापूत सपूत न देख्यो जोबापै चीन्है धाय ॥ १ ॥
चौ० जीवरूपयकअंतरवासा। अंतरज्योतिकीनपरगासा १
श्रीरघुनाथजीके लोकको जो है प्रकाश तेहिकै अन्तर जे हैं जीव एक
रूपते कहे समष्टिरूप ते बास किये रहे, यहां यह भाव प्रगट है कि, जीवनकी
सुरति औरई है और वह (जीव) औरई है सो-अंतरज्योति कहे साहबके
लोकको जोहै प्रकाश तेहिकै अंतरकहे भीतरै अपनई प्रकाश करतभये अर्थात्
सुरतिकी चैतन्यता पाय मनादिक उत्पन्नकै संसार प्रकटकै संसारी ह्वैगये।
साहबको न जानत भये या बात मंगलमें विस्तारते कहिआयेहैं याते इहां
प्रसङ्गमात्र सूचित कियो है। जब प्रलयहोयहै तबहूं वही ब्रह्ममें लीन होइ
है उहैंते पुनि उत्पत्ति होइहै औ अनुभव धोखा ब्रह्ममें ज्ञान करिकै जे मुक्त-

( २८ ) बीजक कबीरदास ।

होयहैं ते सनातनज्योति जोहै अयोध्याजीको प्रकाश वही ब्रह्म जहां पूर्वलीन
रहे है तहैं जाय लीनहोयहै औ जे श्रीरामचन्द्रको जाने हैं तेज्योति वह
भेदिकै श्रीरामचन्द्रके पास जायहैं तामें प्रमाण ॥ ( सिद्धाब्रह्मसुखेमग्नादैत्या-
श्चहरिणाहताः ॥ तज्ज्योतिर्भेदनेशकारसिकाहािरवेदिनः ॥ तामें कबीरजीको
प्रमाण ( जैसे माया मन मिल्यो ऐसेरामरमाय । तारामंडलभेदकै तबैअमरपुर-
जाय ) ॥ औ धोखाको अर्थयहहै जो औरेको और देखे सो कौनहै कि, एक
जोहै सर्वत्रपूर्ण लोकप्रकाशब्रह्म ताके अंतर कहे भीतर अनुरूप जेजीव ते सम-
ष्टिरूपते बास कियेरहे । सो अंतरज्योति प्रकाश कहे जब साहब सुरतिदियो
सोई अंतरप्रकाश करतभई तबजीवको जान परनलग्यो चैतन्यता आई तब
संकल्प विकल्पकियो कि मैं कौन हौं यही मनकी उत्पत्तिभई सो जीवकोरू-
पतौ ॥ ( बालाग्रशतभागस्य शतधाकल्पितस्यच । भागोजीवःसविज्ञेयः सच्हानं-
त्यायकल्पते ) ॥ इतिश्रुतेः ॥ तामें कबीरजीकों प्रमाण-(बहुत बडा ना तनकसा,
तनकी भी है नाहि । औरत मरद् न कहिसके, औ रह सबही माँहि ॥) इत्या-
दिक प्रमाण करिकै वाको स्वरूप तो अणुहै सोतो वाको न देखिपर्यो सर्वत्र
प्रकाशरूप ब्रह्मदेख्यो सो मान्यो कि महीं ब्रह्महौं यही धोखा ब्रह्महै ।
जीव ब्रह्मविषयक शंकासमाधान॥ जो कहो जीव ब्रह्मतों बने है जीव
कहना यहीयाकी भूलहै । जब याको ज्ञानभयो ज्ञानते बिज्ञानभयो अनुभवानन्द
प्राप्त भयो जबभर अनुभवानन्द बनोरहै है तबभर याकोजीवत्वको लेश बनोरहैहै
जब अनुभवानन्दरूप ही द्वैगयो तबयाको जीवत्व मिटिगयो संसारऊ मिटिगयो
एक आपही आप रहतभयो ? तुमकैसे कहौहौ कि “ जीवको ब्रह्महोना धोखा-
है”। जो ऐसे कहौ तौ सुनौ ! जोपदार्थ बीचकोहोय है सो मिटिजायहै औ
जो पदार्थ सनातनहै सो नहीं मिटिजायहै कैसे जैसे तुमकहौहौ कि जीवत्व
बीचहीको है वही ब्रह्म अनेकरूप धारण कैलियो है, एकते अनेक होइगयौहै,
जब जीवत्वको भ्रम मिटिगयो तब ब्रह्मही रहिजायहै,जो प्रथम रह्यौहै सोईरहि-
जायहै । जो पदार्थ बीचको होयहै सो मिटिजायहै । तैसे हमहूं कहैंहैं कि आदि
में तो जीवह्यो है सो जब संसार छूट्यो तब शुद्धजीवको जीवही रहिजायहै ।
जोकहो ब्रह्मही जीवद्वैजायहै तौ हम तुमसों या पूछे हैं कि प्रथम तो ब्रह्मही

रमैनी । ( २९ )

रहतभयो सो ब्रह्म अकर्ताहै निर्धर्महै, मनमायादिकते रहितहै, देशकाल
बस्तु परिच्छेदते शून्यहै सो ऐसे ब्रह्मको जीवत्वको भ्रम कहांतेभयो जो
कहो वह ब्रह्म जीवत्वको धारणनहींकियो वाको तो भ्रमही नहींहै काहेते कि ॥
सत्यंज्ञानमनंतंब्रह्म ॥ यह श्रुतिलिखै है वाको भ्रमतो संभवितै नहीं है भ्रमतो
जीवनको भयो है, जिनको ब्रह्मको विज्ञानहै, तिन को न जीवत्व है न संसार
है । जैसे अज्ञानी जीवनको संसारही देखिपरे है तैसे ज्ञानी जीवनको ब्रह्मही
देखिपरे है । तौ सुनो तुमही दुइज्जीव कहौहौ एक अज्ञानी जीव एकज्ञानी
जीव । सो अज्ञानी जीवको या कह्यो कि संसारही देखाय है सो ब्रह्मके तौ
अज्ञान होताहीं नही है, जाते आपको जीवत्व मानिकै संसारीहोय । जो
कहो मायाते शबलित ह्वैकै ब्रह्मही जीव होई संसारी है जाय है तौ माया
को तौ मिथ्या कहौंहौं । मायाशब्दको अर्थः मिथ्यैव । फिर ब्रह्मको तौ ज्ञान-
स्वरूप कहि आये

( ३० ) बीजक कबीरदास ।
तामें प्रमाण ॥ "येन्येऽरविन्दाक्षविमुक्तमानिनस्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः ॥
आरुह्यकृच्छ्रेणपरंपदंततः पतंत्यधोनादृतयुष्मदंघ्रयः" ॥ इतिभागवते ॥ तेहिते
साहबके लोक प्रकाशमें भरे जे जीवहैं तहेंतेव्यष्टि होतहै औ तहँ समष्टिरूप
करि लीनहोतहै । अनादिकाल यहीक्रमहै । सो जैसोहम वर्णनकरिआये हैं
ताही रीतिमें प्रकाशरूप जो ब्रह्महै तामें निर्विकारत्वनिर्धर्मत्वादि जे वेदांतमें
विशेषणहैं ब्रह्मके ते बन रहेहैं औरीभांतिनहीं संघटित होयहै औ प्रकाशरूप
जो ब्रह्महै सो निर्विकारहै निर्धर्म है अकर्त्ताहै, वाकी करी रक्षा जीवकी नहीं
होयहै । दूनोंते परे जे साहबहैं तिनको जोजानैहै, जानिकै उनके लोकको
जाय है सो फेरि नहीं आवैहै वे रक्षाकरिलेयहैं काहेते वहां मन मायादिकन
की गति नहीं है ॥ तामेंप्रमाण ॥ “यद्गत्वानानिवर्तंतेतद्धामपरमं मम” ॥
औ जगत्‌की उत्पत्ति जो उपनिषदन्‌में लिखैहै सो समष्टिरूप जीवही ते लिखैहै
सोकहेंहैं ॥ "सदेवसौम्येदमग्रआसीदेकमेवाद्वितीयं" ॥ इतिश्रुतेः ॥ एककहे
सजातीयभेदशून्य अद्वितीय कहे विजातीयभेदशून्य एवकारते स्वगत
भेदशून्य यद्यपि सूक्ष्म भेद वामें बने हैं परन्तु समष्टिरूपकरिकै जीव एकही-
रहै है । प्रलयमें अथवा जीवत्व करिकै एक रहैहै यह श्रुति सतनाम कैकै
कहैहै ताते अनामा जोब्रह्म है तामें नहीं लगै है औ दूजी श्रुति है ॥ “सऐ-
क्षतएकोऽहं बहुस्याम्” ॥ तौनै जो है समष्टि जीव सो सुरति पायकै इच्छा
करतभो कि, एकते बहुत होउं सो या ब्रह्मारूप जो समष्टि जीव ताहीमें
लगैहै औ ब्रह्मपद यह समष्टि जीवहीमें घटित होय है काहेते बृहिबृद्धौ यह
धातु है व्यष्टिते समष्टि हैजायहै समष्टिते व्यष्टिहोइजायहै । औ वहजो लोकप्र-
काश ब्रह्मएक रस न घटै न बढै तामें एकोऽहंबहुस्याम् या अर्थ नहीं लगै है।
औ अनुभव करि आपनेको जो ब्रह्म मान्यो है सो तो धोखैहै नाममिथ्यैहै । सो एकतो
समष्टि जीव रूप सगुण ब्रह्म तौन औ एक लोक प्रकाश रूप निर्गुण ब्रह्म तौन ई दूनोंते
साहब परेहैं । औ मंगलमें पांच ब्रह्मकहिआयेहैं सोनारायणजेंहैं साकार ते औ
तिनके अंतर्यामीजेहैं निराकारतत्त्वरूप नारायणते ई दूनों जे साकार निराकारहैं
तिनते साहब परे है औ निराकार साकार ये दोऊ साहबके शरीरहैं तामें प्रमाण
"यामिच्छसिमहाराज तांतनुंप्रविशस्वकाम । वैष्णवींतामहातेजो यद्वाकाशंसनात

रमैनी । ( ३१ )
नम् ॥ इतिवाल्मीकीये ॥ औ साहब साकारद्विभुजनराकृतिहै । तामें प्रमाण ॥
स्थूलंचाष्टभुजं प्रोक्तं सूक्ष्मंचैवचतुर्भुजम् । परन्तुद्विभुजंरूपंतस्मादेतत्त्रयंजयेत् ॥ इतिआ-
न्दसंहितायां ॥ आनन्दोद्विभुजःप्रोक्तोमूर्त्तश्चामूर्त्तएवच । अमूर्त्तस्याश्रयोमूर्त्तःपर-
मात्मानराकृतिः ॥ इतिआनंदसंहितायां ॥ औ मुसलमाननके जे अच्छे समझ-
वारेहैंतेसाकारहीमानैहैं, काहेतेकिकुरानमें लिखै है—अल्लाह कहैहै कि "महम्मद
मोको एकबार जब लड़काईमेंदेखा है औ एक बार मैंने बुलाया मेरे सामने च-
लाआया दुइकमानते कम फरक रहिगया" सो महम्मद देखा यातौअल्लाहकेसूरति
है यह आयो औ महम्मदकीहदीस "खलकलईंनसान"अल्लाहके सूरतहीमें बना-
याहै ईनसान अपनी सूरतिका यहिसे यह आयाकि अल्लाह द्विभुजहै ।
यहिसे या मालूम भया कि अल्लाह कहिकै द्विभुज श्रीरामचन्द्रही वर्णन
करैहै । औ जे अल्लाहकी सुरतिकहतेहैं कि नहीं है, कुरानकी जबानी नहीं
मानते हैं तिनको काफरकहतेहैं औ वह जो है निर्गुण सगुणके परे साहब
नराकृति सो जाके ऊपर कृपा करै है, ताको आपनोहंसरूप अपनीइन्द्री
देइहै आपै देखिपरे है तामैं प्रमाण ॥ ब्रह्मणैवाजिघ्रतिब्रह्मणैव पश्यति ब्रह्मणै-
वशृणोतीतिश्रुतेः ॥ औ साहबको रूप साकार निराकारते बिलक्षणहै
यातेअरूपीरूप कहैहैं- औजेसोयहनामहै तैसोनामनहीं है वहनामविलक्षण- मन
वचनकेपरे है यातेवाको अनामानामकहै हैं तामेंप्रमाण । "अनामासोऽप्रसिद्धत्वाद-
रूपोभूतिवर्जनात् ॥ इतिअग्निपुराणे ॥ अमाकृतशरीरत्वादरूपीभगवान्विभुः ॥
इतिवायुपुराणे॥ औ साहबके हाथ पांय नहीं हैं निराकार आयो औ चलैहै ग्रह-
ण करिलेइहै याते साकारआयौतामेंप्रमाण॥ "अपाणिपादो जवनोग्रहीतापश्यत्यच-
क्षुःसशृणोत्यकर्णः"इतिश्रुतेः॥सो ऐसे साहबके लोक प्रकाश है ब्रह्मको यह जी-
वना समुझ्यो कि साहबको लोकःप्रकाश है मनते अनुभवकरि वह ब्रह्म आपही
को मानतभयो यही धोखा ब्रह्म है । सो जीवपै कहे एकरूपते औ कहेसमष्टिरूप
जीवलोक प्रकाशके अंतरमेंबास कियेरहै, सो अंतर ज्योति कहे सुरतिपाय प्रका-
शकीन कहे मतादिक उत्पन्न करि समष्टिते व्यष्टि होवेकी इच्छाकरत भये सो
आगे कहै हैं ॥ १ ॥

( ३२ ) बीजक कबीरदास ।
इच्छारूपनारिअवतरी । तासुनामगायत्रीधरी ॥ २ ॥
आपनेको जो धोखाते ब्रह्म मानिलियो समष्टिरूप जीव, ताके जब इच्छाभई
सोई मूल प्रकृति माया है तेहिते शबलित ब्रह्म भयो सो इच्छा माया जबप्रकट
भई ताको नामगायत्री धरावत भये । गायत्री तो सूर्य्यमध्यवर्ती जे श्रीरामचन्द्रहैं
तिनको तात्पर्य ते बतावैहै सो अर्थतो न ग्रहण करत भये सूर्य्यके मध्यमें साहब
है तामें प्रमाण॥"सूर्य्यमंडलमध्यस्थं रामंसीतासमन्वितम्"॥सूर्य्यप्रतिपादक अर्थ
ग्रहण करतभये । तेहिते दिन राति संध्या होतभई । औ ब्रह्मादिक देवताभये
सो आगे कहेंगे यह संसार मुख अर्थसमुझ्यो तेहिते गायत्री सबकी उत्पत्ति कर
तभई जो कहो काहेते जानो कि गायत्रीके द्वैअर्थ हैं तौ सुनो यहवाणी जोहै सो
सार शब्द जो रामनाम ताको लैके प्रथम प्रगटभई है । तामें द्वैअर्थहैं एकसाह
ब मुख, एक संसारमुख । ऐसे प्रणव . निगम आगम इनमें द्वै द्वै अर्थहैं, एक
साहबमुख एक संसारमुख।काहेते कि रामनाम ते सब निकसेहैं सो जो कारणमें
द्वैअर्थभये तौ कार्यमें द्वैअर्थहोवई चाहैं । सो संसारमुख अर्थलैकै जीव संसारी
होतभये सो यह उत्पत्ति मंगलमें बिस्तारते लिखिआये हैं ताते संक्षेप यहां उत्प
त्ति लिख्यो है ॥ २ ॥
तेहिनारीकेपुत्रतिनिभयऊ।ब्रह्माविष्णुमहेशनामधयऊ ॥३॥
तौने गायत्रीरूप नारीके पुत्र ब्रह्मा विष्णु महेश उत्पन्न होत भये तब वह
नौं गायत्रीरूप नारी है॥ ३ ॥
तबब्रह्मापूंछतमहतारी । को तोर पुरुष केकर तुमनारी ॥ ४ ॥
तासोंब्रह्मा पूंछत भये कि को तोर पुरुष है काकरि तू नारी है औ काके
हम पुत्रहैं सो बताउ हम जानो चहैहैं तब वा नारी कहत भई ॥ ४ ॥
तुमहमहमतुमऔरनकोई । तुममोरपुरुषहमैंतोरजोई ॥५॥
प्रथम साहब के लोक प्रकाशमें अनादिकालते साहबते विमुखतारूप जो
जगत्को कारण तेहिते सहित जीव समष्टिरूप बास कियोरह्यो तिनके ऊपर
साहब दया कियो कि "अबोध सुषुप्ति ऐसे में परेहैं इनको सुखको अनुभव

:

नहीं है " यह जानि साहब बिचार्यो कि हम इनको सुरति देयें जेहिते हमको
जानि लेइ तौ मैं हंसरूप दैके आपने धामको बोलाय लेउँ । सो जब साहब
सुरति दियो तब चैतन्यता भई अर्थात् स्मरणभयो यही चित्तकी उत्पत्तिहै । औ
वाको रूपतो अणुहै सोतो आपनोदेखैनहीं है संकल्प विकल्प करैहै कि मैंहों
कि नहींहौं, यही मनकीउत्पत्ति है। फिरि बिचार्यो कि मैं हौं तो, पै कौनहौं आ-
पनो रूपतो देखैनहीं है । फिरि निश्चयकियो कि जोमैं होतो न तो यहसंकल्प
विकल्प काको होतो याते मैंहौं यहीं बुद्धि की उत्पत्ति भई । जौने लोक प्रकाशमें
अपार है ताको देखि मानत भयो कि सत्चित् आनंद स्वरूप सो महींहौं यही
अहंब्रह्मरूप अहङ्कारकी उत्पत्ति है । सो जब समष्टिजीव आपनेकों चिद्रूप ब्रह्म
मान्यो तब वही पूर्वजगत् कारणरूपा योगमाया अर्थात् साहब तें विमुखता-
रूपा सो स्थूलरूप ते चिद्रूपा योगमाया लागी । तब आपनेको सच्चिदानंद ब्रह्म
मानिकै एकते अनेक

( ३४ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ बाप पूतकी ऐकैनारी, औ एकै माय विआय ॥
ऐसा पूत सपूत न देखों, जोबापैचीन्हैंधाय ॥ ६ ॥
बापता धोखाब्रह्महै जाते शुद्धजीवअशुद्धहैउत्पन्नभयेहैं ते अशुद्ध जीव पूतहैं
सो दोऊमाया सबलित भये ताते बाप पूतकीएकै नारी भई । औ पूर्व जगत् का-
रण रूपा जो माया है तौनेहींते(अहंब्रह्म(स्मि)मान्योहै औ तौनेहींते व्यष्टि जीवनकी
उत्पत्तिहूभई है याते दोहुनकी एकै महतारी है।याते एकै माया बियानी है।सो ऐसा
पूत सपूत नहीं देखेहु है कौनसो बाप जोहै ब्रह्म ताको धायकै कहे बहुत बुद्धि
दौरायकैं चीन्हैं कि, यह धोखा है । अब जाकी शक्ति करिकै यह जगत् भयोहै
जौनी भांतिते सो समेटि कै सिंहावलोकन कैकै पुनि कहैहैं ॥ ६ ॥
इति प्रथम रमैनी समाप्तम् ।
अथ दूसरी रमैनी ॥२॥१॥
चौपाई ।
अंतर ज्योति शब्द यक नारी।हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी॥१॥
तेतिरियैभगलिंगअनंता । तेउनजानैआदिउअंता ॥ २ ॥
बाखरीएकविधातैकीन्हा । चौदहठहरपाटिसो लीन्हा॥ ३ ॥
हरिहरब्रह्ममहंतौनाऊ । तेपुनितीनिवसावलगाऊ ॥ ४ ॥
तेपुनिरचिनिखंडब्रह्मांडा । छादर्शनछानवेपखंडा ॥ ५ ॥
पेटहिकाहूनवेदपढ़ाया। सुन्नतिकरायतुरु कनाहिं आया ॥ ६ ॥
नारीमोचित गर्भप्रसूती । स्वांगधरै बहुतै करतूती ॥ ७ ॥
तहियाहमतुमएकैलोहू । एकैप्राणबियायलमोहू ॥ ८ ॥
एकैजनी जनासंसारा । कौनज्ञानते भयो निनारा ॥ ९ ॥
भावालकभगद्वारेआया । भगभोगेतेपुरुष कहाया ॥ १०॥

रमैनी । ( ३५ )
अविगतिकीगतिकाहुनजानी।एकजीभकितकहौंबखानी १ १
जोमुखहोइजीभदशलाषा।तौकोइआयमहंतौभाषा ॥१२॥
साखी ॥ कहहिंकबीर पुकारिकै, ई लेऊ व्यवहार ॥
एक रामनाम जानेविना, भव बूडि मुवा संसार॥१३॥
अंतर ज्योति शब्द यक नारी।हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी॥१॥
अन्तरज्योति कहे वह ज्योतिके अन्तरकेभीतरै नारी जोहै गायत्रीरूपबा-
णी सो शब्द जो है राम नाम ताको लैकै प्रगट भईहै सो मङ्गलमें कहि आ-
येहैं। तौने शब्दकी शक्तिते तानारीके हरि ब्रह्मा त्रिपुरारी भये हैं। अर्थात्
रामनामको जगत् मुख अर्थ लै कै वहै बाणी रूप नारी वेद शास्त्र औ सब सं-
सार प्रगटकियो रामनाममें ये सब भरेंहैं सो मैं अपने मंत्रार्थमें लिख्यो है
सो राम नाममें जो साहब मुख अर्थहै ताको छिपाय दियो ॥ १ ॥
तेतिरियैभगलिंगअनंता । तेउनजानैआदिउअंता ॥ २ ॥
तौन जो है तिरिया ताते अनंत भग लिंग होत भये अर्थात् बहुत स्त्री पुरुष
भये ते अनेक शास्त्रनमें अनेक वेदनमें बिचार करत २ थके तबहूं वह राम
नामके अर्थको अन्त न पाये ॥ २ ॥
वखरीएकविधातैंकीन्हा । चौदहठहरपाटिसोलीन्हा ॥३॥
एक बखरी यह ब्रह्मांड ब्रह्मा बनावत भये सो चौदह ठहर कहे चौदह
भुवन करिकै पाटि लेते भये ॥ ३ ॥
हरिहरब्रह्ममहंतौनाऊ । तेपुनितीनिबसावलगाऊ ॥ ४ ॥
औ हरि हर ब्रह्मा जौन ब्रह्मांड प्रथम ब्रह्मा बनायो है वोही ब्रह्माण्ड में
तीनि गांव बसावत भये तहांके मालिक होत भये औ जे प्रथम ब्रह्मादिक देव-
ता भये हैं तेई ब्रह्मादिकनके अंगनके देवता होतभये । सो मङ्गलमें लिखि-
आयेहैं ब्रह्मादिकनकी उत्पत्ति औपुनि भगवान्की नाभीमें कमल भयो तेहिते
ब्रह्माभयेहैं तिनते उत्पत्ति भई है औ ब्रह्मवैवर्त्तमें प्रथम ब्रह्माकी उत्पत्ति प्रकृति

( ३६ ) बीजक कबीरदास ।
पुरुषके अंगनते भईहै । औपुनि भगवान्की नाभीमें कमल भयोहै जौं मंगल
में कहिआये हैं, तेहिते ब्रह्माभये हैं तिनतें उत्पत्ति भई है । औ तौनै बात या
रमैनीहूं में कहै हैं कि पहिले इच्छा रूपी नारीते ब्रह्मादिक भये । औ पुनि
ब्रह्माण्डांतरानुवर्ती ब्रह्मादिकभये ते सतोगुणाभिमानी जे विष्णुते ऊपर देवलोक
बसावतभये ते ताके मालिक । और जो गुणाभिमानी जे ब्रह्माते मध्यकें
लोक बसाये ते तहांके मालिक । औ तमोगुणाभिमानी जे महादेव ते नीचेकें
लोक बसाये तहांके मालिकं होतभये । सो येतीनौ तीन लोकके मालिक होत
भये सोये तीनों तीन लोकके मालिकै हैं परंतु तौन तौन लोकनकी प्रधानता
देखाई है ॥ ४ ॥
तेपुनिरचिनिखंडब्रह्मांडा । छादर्शनछानवेपखंडा ॥ ५ ॥
पेटहिकाहुनवेदपढ़ाया । सुनतिकरायतुरुकनहिंआया॥६॥
तेतीनौँ देवता मिलिकै ब्रह्मांड में छा दर्शन छानबे पाखंड बनावत भये ॥
“ योगी जंगम सेवरा संन्यासी दुरवेश । छठयें कहिये ब्राह्मण छाघर छाउप-
देश ॥ दशसंन्यासी बारहयोगी चौदहशेष वखाना । बौध अठारहि जंगम
अठारहि चोबिस सेवरा जाना ॥” औ प्रथम उत्पत्तिमें कहि आये हैं ब्रह्मा वि-
ष्णु महेश तें यह ब्रह्मांडके ऊपर अपने लोक बसाये फिरि एक २ अंशते
अनंत कोटि ब्रह्मांडन में बसे जाय ५ औ पेटैते कोउ वेद नहीं पढ़ि आया
कहै गायत्री नहीं पढ़्यौ बरुवा नहीं भयो औ न पेटैते सुनति करायकै तुरुक
बनिआया है ताते॒हिन्दू तुरुकको जीव एकईहै सोतो ना जान्यो वेद किताब
की वाणी सुनिकै अपने २ कर्मते सब अनेक भेद ह्वैगये वेद किताबको भेद
न जान्यो ॥ ६ ॥
नारीमोचित गर्भप्रसूती । स्वांगधरै बहुतैकरतूती ॥ ७ ॥
तहियाहमतुमएकैलोहू । एकैप्राणबियापलमोहू ॥ ८ ॥
गर्भबासमें जबतुम रहेहो तब न हिन्दूए रह्योहै नातुरुकरह्यो न वेद पढ्योँ
नं तिहारी सुन्नति भई । जब गर्भते निकसे तब कर्म करिकै हिन्दू मुसलमान
ह्वैगये । बहै नारी जो है वाणी ताही में चित्त लगायकै कर्म करिकै नाना

रमैनी । ( ३७ )
स्वाग हिंदू मुसल्मान भये ७ सो कबीरजी कहैहैं कि जैसे हम शुद्धहैं तैसे तुमहूं
शुद्ध रहैहौ । जब तुमहीं मन प्रकट कियो है औ इच्छा भई है तब हम तुम
एकही लोहू रहे हैं अर्थात् एकई जाति चित्त स्वरूप शुद्ध रहे हैं । सो एक
मोह कहे भ्रम जो है मन सो व्याप्त ह्वैकै नाना भांतिन तुमको कराइ दियों
कि हम हिंदू हैं हम तुरुकहैं इत्यादिक सबसों ॥ ८ ॥
एकैजनी जनासंसारा । कौनज्ञानते भयोनिनारा ॥ ९ ॥
भावालकभगद्वारेआया । भगभोगैतेपुरुषकहाया ॥ १० ॥
अविगतिकीगतिकाहुनजानी। एकजीभकेतकहौंबखानी ११
एक जनी कहै उत्पत्ति करनहारी माया औ एकै जना कहे उत्पत्ति करन-
हार मनका अनुभव ब्रह्ममाया सबलित इन्हीं ते सब जगत् है तुम कौन ज्ञा-
नते हिंदू तुरुक नाना जाति बनाय लिये निनार निनार ९ जब भगकें द्वारे आया
तब बालक कहाया औ जब भोगन लग्यो तब पुरुष कहाया १० अविगति
जो है धोखा ब्रह्म ताकी गति कोई नहीं जानै है मैं एक जीभते केतो बखा-
निकै कहौं ॥ ११ ॥
जौमुखहोइजीभदशलाषा । तौकोइआयमहंतौभाषा॥१२॥
जो एक मुखमें लाख जीभ होय तौ कोई कहे महन्त वही ब्रह्मको भाषे
अर्थात् न भाषै यह याकुअर्थ है काहेते कि वाके तौ कुछ रूप रेखा हई नहीं
है धोखही है अथवा महंत जे ब्रह्मादिक अपने २ लोकके मालिक जिन जग-
तकी उत्पत्ति कियो है तिनके करतव्यताको जो काहूके दशलाख जीभ होय
कहै तौ का कहिसकै अर्थात् नहीं कहिसकै ॥ १२ ॥
साखी ॥ कहहिंकबीर पुकारिके, ई लयऊ ब्यवहार ॥
रामनाम जानेबिना; भव बूड़ि मुवा संसार॥१३॥
कबीरजी पुकारिकै कहैहैं कि या जो उत्पत्ति वर्णन करिआये सो सब लय
कहे नाशमानहै ! औ ऊ कहे वह धोखा ब्रह्मको जो वर्णन करि आये सो व्यवहा-

( ३८ ) बीजक कबीरदास ।
रै मात्रहै अर्थात् समुझेते धोखाँहीहै कुछ वस्तु नहीं है सो एक बिना रामनामके
जाने कहे साहबको जो बतावैहै रामनाम सो अर्थ बिनजाने मायाको बतायो जौ
है राम नाममें संसार औ ब्रह्माको अर्थ तौनेहै भव कहे भयरूप समुद्र तौनैंमें
संसार बूडि मुवा इहां लक्षणा है संसार बूडि मुवाकहे संसारी जीव बूडि
मुये ॥ १३ ॥
इतिदूजीरमैनीसमाप्तम् ।
अथ तीसरी रमैनी ।
चौपाई ।
प्रथम अरंभ कौनके भाऊ । दूसर प्रकट कीन सोठाऊ ॥१॥
प्रकटेब्रह्म विष्णु शिव शक्ती।प्रथमैभक्ति कीन जिव उक्ती॥२॥
प्रकटेपवन पानी औ छाया।बहुबिस्तारकै प्रकटी माया ३॥
प्रकटे अंड पिंड ब्रम्हंड।पृथिवी प्रकटकीन नवखंडा॥४॥
प्रकटे सिध साधक संन्यासी । ये सब लागिरहे अविनासी५
प्रकटे सुरनर मुनिसबझारी । तेऊ खोजि परे सबहारी॥६॥
साखी ॥ जीउ सीउ सब प्रकटे, वे ठाकुर सब दास ॥
कबिर और जानैनहीं, एक रामनामकी आस॥७॥
प्रथम अरंभ कौनके भाऊ । दूसर प्रकटकीनसोठाऊ ॥ १॥
प्रकटेब्रह्मविष्णुशिवशक्ती । प्रथमैभक्तिकीनजिवउक्ती ॥२॥
प्रथमअरंभ कौनके भाऊकहे भयो औ दूसर कौन प्रकटकियो जाते ये
सब व्यवहारहैं १ प्रथम अनुमान समष्टिजीवकियो मनके अनुभव ते ब्रह्म-
भयो औ बाणीभई ताते ब्रह्मा विष्णु महेशादिक देवता प्रकटभये उनकी सब

रमैनी । ( ३९ )

शक्ति प्रकटभई औप्रथम ही जीव जोहै सो अपनी उक्तिकरिकै उक्तदेवनकी
भक्तिकरत भयो अर्थात् नाना उपासना बांधिलेतभये ॥ २ ॥
प्रकटेपवनपानीऔछाया। बहुविस्तारकैकैप्रकटीमाया॥३॥
प्रकटेअंडापिंडब्रह्मांडा। पृथिवीप्रकटकीननवखण्डा ॥ ४ ॥
वे जे ब्रह्मादिकहैं ते अपनो अपनो ब्रह्माण्ड करतब करतभये तेहिसे पवन
पानी औछाया बहुतबिस्तारकैकै मायाप्रकटभई । औचारि जे खानिहैं
अंडज पिंडज स्वेदज उद्भिज्ज प्रकट भये जे ब्रह्मांडमें हैं औ नवखण्ड पृथ्वी
प्रकट भई ॥ ३ ॥ ४ ॥
प्रकटेसिधसाधकसंन्यासी। ईसबलागिरहेअबिनासी॥५॥
प्रकटेसुरनरमुनिसवझारी। तेऊखोजिपरे सबहारी ॥ ६ ॥
औ सिद्धसाधक संन्यासी प्रकटहोतभये ये संपूर्णजे हैं ते अबिनाशीमें लागि-
रहे हैं अर्थात् अबिनाशीको खोजैंहैं ॥ ५ ॥ औसुरनरमुनिसब झारिकै प्रकटहोत
भये तेऊ अबिनाशीको खोजत खोजत हारि परे तिनहूं न पायो ॥ ६ ॥
साखी ॥ जीव सीव सब प्रकटे, वे ठाकुर सबदास ॥
कबीर और जाने नहीं, एकरामनामकी आस॥७॥
जीव औ सीव कहे ईश्वर सो सब प्रकटे सो ईश्वर तो ठाकुर भयो औ
सब जीव दासभये । सोकबीरजी कहै हैं कि हमतो दूसरोकाहूको नहीं जाने
हैं न अबिनाशी निर्गुण ब्रह्मको जानै, न सगुणईश्वरन को जानै । निर्गुण
सगुण के परे जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनके एक रामनामकी हमोर आशाहै कि
वही हमारो उद्धार करैगो अथवा कबीर कहै काया के बीर जीव ! और को
तैनाजानु एक रामनामही को जानु यही संसार ते छोड़ावैगो ॥
इति तीसरी रमैनी समाप्तम् ।

( ४० ) बीजक कबीरदास ।
अथ चौथीरमैनी ।
चौपाई ।
प्रथम चरणगुरूकीन बिचारा । करतागावै सिरजनहारा॥१॥
कर्म करिकै जग बौराया।शक्ति भक्तिलै बांधिनिमाया॥२॥
अद्भुत रूप जातिकी वानी।उपजी प्रीति रमैनी ठानी ॥३॥
गुणिअनगुणी अर्थनहिं आया। बहुतकजने चीन्हि नहिं पाया ४
जो चीन्है तेहि निर्मल अंगा।अनचीन्हे नल भयेपतंगा॥५॥
साखी ॥ चीन्हि चीन्हि कह गावहू, बानी परी न चीन्हि॥
आदि अंत उत्पति प्रलय, सब आपुहिकहि दीन्हि॥६॥
──────
प्रथमचरणगुरूकीनविचारा । करतागावैसिरजनहारा ॥१॥
कर्म करिकैजगबौराया । शक्तिभक्तिलैबांधिनिमाया॥२॥
प्रथमचरणकहे जगत्‌की आदिमें गुरुकहे साहब बिचारकीन कहेसुरति
दीन कि हमको जानै,हम हंसरूपदै अपनेधामकोलै आवैं।सो जीवनेह ते वा चैतन्यता
पाय जगत्मुख है जगत्‌उत्पन्नकरिकै संसारीह्वैगये सो करता तो साहबहैं जिनकी चैत-
न्यता पायजीव समष्टिते व्यष्टिभये तौनेसाहबकी करतब्यता तो न जान्यो ब्रह्मादिक
नहीको सिरजनहार मानतभये ॥ १ ॥ तेईब्रह्मादिक नानाकर्मनको प्रतिपादन
करिकै जगत् बौरायदियो औशक्ति जो है गायत्री तौने के उपदेशकी विधिकैकै
ताकी भक्ति आपकैकै औजीवनको कराय कै माया में बांधदियो ॥ २ ॥
अद्भुत रूप जातिकीवानी । उपजीप्रीतिरमैनीठानी ॥ ३ ॥
गुणिअनगुणीअर्थनहिंआया।बहुतकजनेचीन्हिनहिंपाया४
अद्भुत रूप औ नाना जातिकी जोहै कर्म प्रतिपादक ब्रह्मादिकनकी बाणी
अर्थात् अद्भुतरूपनके हैं ध्यान जिनमें कहेकाहूके बहुत मूड़ काहूके बहुत हाथ

रमैनी। ( ४१ )
काहूके बहुतपांय काहूके मूंडनहीं ( छिन्नमस्ताको ध्यान लिखे है कि, हाथमें
मूँडलीने है गलेमें लोइ चले है सो मुहेमें परैहै ताको पीये है ) । और नाना-
भांतिकी जो है कर्म्म-प्रतिपादिका बाणी अर्थात अद्भुत रूपनकाहै ध्यान तिनमें
यहिरीति के देवतनकी उपासना करैहै औनाना जातिकीकहे नाना तरहकी है
उपासना बर्णन जिनमें ऐसी उनकी बाणीसुनके तिन 'तिन देवनपर जीवनकी
प्रीति उपजतभई । औ रमैनीठानी जो कह्यो सो अपने अपने उपास्य देव
तनकी रमनी कहै कथा सो ब्रह्मादिकन की बाणीको आशयलेके बनाय लेते
भये ॥ ३ ॥ गुणीजेंहै सगुण उपासनावाले तेजिवको स्वस्वरूप दासरूपता
खोजनलगे औअनगुणी जैहैं निर्गुणवाले ते जीवको अनुमान जो ब्रह्मत्वरूपता
खोजनलगे सो वा वेदतात्पर्यार्थ दुइमें कोई नहीं पाये अर्थात् बहुतेरेनेबहुत-
बिचारकियो परंतु न चीन्हपायो ॥ ३ ॥ ४ ॥
जोचीन्है तेहिनिर्मलअंगा । अनचीन्हेनलभयेपतंगा ५
जे यह धोखाको जानैहैं कि यह धोखाहै तिनहीं को जानिये कि इनके
पारखहै । यहबात बिनाजाने जगत्‌के जेजीवहैं ते जैसे दीपकमें पतंग जरिजा-
यहै ऐसे वह धोखामेंपरिकै नाना दुःखपावैहैं । औ जोकोई साहबको चीन्हैहै
जाको नेतिनेति वेदकहैंहैं औ पारिख करैहैं ताके निर्मलअंग हैजायहै अर्थात्
हंसरूप पावै है । काहेते कि वह साहब तो निर्गुण सगुण मनबचनके परैहै
सोजब वाको चीन्ह्यौ तब वाहू मनबचनके पर है जायहै ॥ ५ ॥
साखी॥चीन्हि चीन्हि कह, गावहू वाणीपरी न चीन्ह ॥
आदिअंत उत्पत्तिप्रलय,सवआपुहिकहिदीन्ह ॥६॥
चीन्हौ चीन्हौ तुमकहा गावहुहौ अर्थात् कहाकहौहौ वहबाणीतो तुमकों
चीन्हि नहीं परी काहेते बाणी आपही कहतजाय है कि जाकी उत्पत्तिहोयहै
ताकी प्रलयभी होय है; जाकी आदि होयहै ताको अंतहू होयहै, तातेजेते
पदार्थ जगत्‌में बाणी आदिदैहैं ते मन बचनके परे नहीं हैं । औ जोचीन्हैहै
ताको निर्मल अंग होयजायहै । यहजो कह्यो ताते यहदेखाय दियो कि जब

( ४२ ) बीजक कबीरदास ।
मनादिक एको नहीं रहिजायहैं, तब मन वचनके परे जो पुरुषहै सो वह
मुक्तजीवको हंसरूप देइ है ताको पायकै तेहिहंसरूपके इन्द्रिनते साहबको
देखैहैं सो याकोप्रमाण बेदमें है ॥ “मुक्तस्यविग्रहोलाभः” इतिकठशाखायाम् ।
सो यह बिचारनहीं करै हैं बाणीकेफेरमें ब्रह्महूं भूलिगये सो आगे कहैंहैं ॥ ६ ॥
इतिचौथीरमैनीसमाप्तम् ।
अथ पांचवीं रमैनी ।
चौपाई ।
कहँलौंकहौंयुगनकीबाता । भूलेब्रह्म न चीन्हे त्राता ॥ १ ॥
हरिहर ब्रह्माकेमनभाई । बिबि अक्षर लै युगतिबनाई ॥ २ ॥
बिबिअक्षरकाकीनविधाना।अनहदशब्दज्योतिपरमाना ३॥
अक्षरपढिगुनिराहचलाई । सनकसनन्दनकेमनभाई ॥ ४ ॥
वेदकिताबकीन्हबिस्तारा। फैलगैलमनअगमअपारा॥ ५ ॥
चहुंयुगभक्तनबांधलबाटी । समुझिनपरै मोटरी फाटी ॥ ६ ॥
भैभै पृथवी चहुंदिशिधावै । सुस्थिर होय न औषध पावै ॥ ७ ॥
होयभिस्तजोचितनडोलावै।खसमैंछोड़िदोजखकोधावै८॥
पूरुव दिशा हंसगति होई । है समीप संधि बूझै कोई ॥ ९ ॥
भक्तौभक्तिनकीनशृंगारा । बूड़िगयेसबमांझहिंधरा ॥ १०॥
साखी ॥ बिनगुरुज्ञानैदुन्दभो, खसमकही मिलिवात ॥
युगयुग कहवैया कहै, काहु न मानीजात ॥ १ ॥
कहँलौंकहौंयुगनकीबाता । भूलेब्रह्म न चीन्हे त्राता ॥ १॥
हरिहर ब्रह्माकेमनभाई। बिबि अक्षर लै युगतिबनाई ॥ २ ॥