कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४२ ) बीजक कबीरदास ।
मनादिक एको नहीं रहिजायहैं, तब मन वचनके परे जो पुरुषहै सो वह
मुक्तजीवको हंसरूप देइ है ताको पायकै तेहिहंसरूपके इन्द्रिनते साहबको
देखैहैं सो याकोप्रमाण बेदमें है ॥ “मुक्तस्यविग्रहोलाभः” इतिकठशाखायाम् ।
सो यह बिचारनहीं करै हैं बाणीकेफेरमें ब्रह्महूं भूलिगये सो आगे कहैंहैं ॥ ६ ॥
इतिचौथीरमैनीसमाप्तम् ।
अथ पांचवीं रमैनी ।
चौपाई ।
कहँलौंकहौंयुगनकीबाता । भूलेब्रह्म न चीन्हे त्राता ॥ १ ॥
हरिहर ब्रह्माकेमनभाई । बिबि अक्षर लै युगतिबनाई ॥ २ ॥
बिबिअक्षरकाकीनविधाना।अनहदशब्दज्योतिपरमाना ३॥
अक्षरपढिगुनिराहचलाई । सनकसनन्दनकेमनभाई ॥ ४ ॥
वेदकिताबकीन्हबिस्तारा। फैलगैलमनअगमअपारा॥ ५ ॥
चहुंयुगभक्तनबांधलबाटी । समुझिनपरै मोटरी फाटी ॥ ६ ॥
भैभै पृथवी चहुंदिशिधावै । सुस्थिर होय न औषध पावै ॥ ७ ॥
होयभिस्तजोचितनडोलावै।खसमैंछोड़िदोजखकोधावै८॥
पूरुव दिशा हंसगति होई । है समीप संधि बूझै कोई ॥ ९ ॥
भक्तौभक्तिनकीनशृंगारा । बूड़िगयेसबमांझहिंधरा ॥ १०॥
साखी ॥ बिनगुरुज्ञानैदुन्दभो, खसमकही मिलिवात ॥
युगयुग कहवैया कहै, काहु न मानीजात ॥ १ ॥
कहँलौंकहौंयुगनकीबाता । भूलेब्रह्म न चीन्हे त्राता ॥ १॥
हरिहर ब्रह्माकेमनभाई। बिबि अक्षर लै युगतिबनाई ॥ २ ॥