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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

आदिमंगल। ( २३ )
बचनमें आवै साहब तौदुहुनका मालिकहै उनकी कहबाई कहाकरै जो कहौं
सब कें मालिक श्रीरामचन्द्रहैं यह कहतई जाउहौ औकहौ कि मनबचनमें नहीं
आवैहैं यहबड़ो आश्चर्य है सो सत्यहै ये कबीरहूजीकहैं "किरामो नहीं खोदाई"
काहेते रामो नहीं खोदायहौ कहै हैं "रामै नाम अहै निज सारू । औ सब
झूठ सकल संसारू" ॥ इत्यादिक बहुत प्रमाणदै कै बीजक भरैमें रामैनामको
सिद्धांतकियेहै ताही में याको समाधानहै औताही में कबीरजीको बीजकलागै हैं
औरीभांति अर्थ किये नहींलागै है। सोसुनो जो साहबको रामनामहै ताके साध-
नकीन्हे ते वहमनबचन के परेजोरामनाम ताकोसाहब देइ है सो वह नाम याकें
बचनमें नहीं आवैहै साहिबै क दीन्हेते पावैहै । जब याको संसार छूटयो तब
अपने लोकको साहब हंसस्वरूप देइहै तौनेहंसस्वरूप में टिकिकै साहबकोदेखै-
हैंनामलेइहैं साहब साहबको नाम साहबको लोक साहबकोदियो हंसस्वरूप या
प्राकृत अप्राकृत मन बचनके परे हैं तामेंप्रमाण ॥ “ यतोवाचोनिवर्तंतेयत्पर-
म्ब्रह्मणःपरम् ॥ अतःश्रीरामनामादिनभवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः ”॥ औ यह रामना-
मके जपन की विधिजैसी २ कबीर जी अपने शब्दनमेंकह्योहै तेहिरीतिते जो
जपक रै तौ रामनाममन बचनकेपरे जोआपनो स्वरूप सोयाके अंतःकरणमें अस्फ़ू-
र्तिकरि देयँ हैं औ साहब को रूपअस्फूर्ति करिदेयँ हैं अर्थात् आपहीअस्फूर्ति हैजायहै
तामेंप्रमाण ॥ “ नामचिन्तामणीरामश्चैतन्यपरविग्रहः । नित्यशुद्धोनित्यमुक्तोन
भिन्नन्नामनामिनः ॥ अतःश्रीरामनामादि नभवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः ॥ स्फुरतिस्वयमे-
वैतज्जिह्वादौश्रवणेमुखे” ॥२॥ सो यही रामनाम जो मनबचनके परैहै ताही को
कबीर जानै ॥ “ सो जानै जेहिमहीं जनाऊं । बांह पकरि लोकै लै आऊं ॥
सहज जाप धुनि आपै होई । यह सँधिबूझै बिरला कोई ॥ रग २ बोलै रामजी
रोम रोम राकार । सहजै धुनि लागीरहै सोई सुमिरणसार ॥” ओठकंठहालैनहीं
जिह्वानाहिंउच्चार । गुप्तबस्तुको जो लखै सोईहंसहमार ॥ जो हंसरूपमें टिकिकै
जपत रहेहैं तौनेमें प्रमाण भक्तमालके टीकामें श्रीप्रियादासजीलिख्योहै ॥ “बिनै
तानो बानो हिय राममड़रानो” ॥ श्रीमहाराजाधिराजरामसिंहबाबा पूंछ्योहै
तब कबीर साहबकह्योहै॥ “राअक्षरघट रम्योकबीरा ॥ निजघरमेरोसाधुशरीरा” १
तातेरामनामही को परत्व बजिकमें है मुक्ति रामनामहीमें है और साधनमनह!