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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

रमैनी । ( ३७ )
स्वाग हिंदू मुसल्मान भये ७ सो कबीरजी कहैहैं कि जैसे हम शुद्धहैं तैसे तुमहूं
शुद्ध रहैहौ । जब तुमहीं मन प्रकट कियो है औ इच्छा भई है तब हम तुम
एकही लोहू रहे हैं अर्थात् एकई जाति चित्त स्वरूप शुद्ध रहे हैं । सो एक
मोह कहे भ्रम जो है मन सो व्याप्त ह्वैकै नाना भांतिन तुमको कराइ दियों
कि हम हिंदू हैं हम तुरुकहैं इत्यादिक सबसों ॥ ८ ॥
एकैजनी जनासंसारा । कौनज्ञानते भयोनिनारा ॥ ९ ॥
भावालकभगद्वारेआया । भगभोगैतेपुरुषकहाया ॥ १० ॥
अविगतिकीगतिकाहुनजानी। एकजीभकेतकहौंबखानी ११
एक जनी कहै उत्पत्ति करनहारी माया औ एकै जना कहे उत्पत्ति करन-
हार मनका अनुभव ब्रह्ममाया सबलित इन्हीं ते सब जगत् है तुम कौन ज्ञा-
नते हिंदू तुरुक नाना जाति बनाय लिये निनार निनार ९ जब भगकें द्वारे आया
तब बालक कहाया औ जब भोगन लग्यो तब पुरुष कहाया १० अविगति
जो है धोखा ब्रह्म ताकी गति कोई नहीं जानै है मैं एक जीभते केतो बखा-
निकै कहौं ॥ ११ ॥
जौमुखहोइजीभदशलाषा । तौकोइआयमहंतौभाषा॥१२॥
जो एक मुखमें लाख जीभ होय तौ कोई कहे महन्त वही ब्रह्मको भाषे
अर्थात् न भाषै यह याकुअर्थ है काहेते कि वाके तौ कुछ रूप रेखा हई नहीं
है धोखही है अथवा महंत जे ब्रह्मादिक अपने २ लोकके मालिक जिन जग-
तकी उत्पत्ति कियो है तिनके करतव्यताको जो काहूके दशलाख जीभ होय
कहै तौ का कहिसकै अर्थात् नहीं कहिसकै ॥ १२ ॥
साखी ॥ कहहिंकबीर पुकारिके, ई लयऊ ब्यवहार ॥
रामनाम जानेबिना; भव बूड़ि मुवा संसार॥१३॥
कबीरजी पुकारिकै कहैहैं कि या जो उत्पत्ति वर्णन करिआये सो सब लय
कहे नाशमानहै ! औ ऊ कहे वह धोखा ब्रह्मको जो वर्णन करि आये सो व्यवहा-