कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 90, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( ३९ )
शक्ति प्रकटभई औप्रथम ही जीव जोहै सो अपनी उक्तिकरिकै उक्तदेवनकी
भक्तिकरत भयो अर्थात् नाना उपासना बांधिलेतभये ॥ २ ॥
प्रकटेपवनपानीऔछाया। बहुविस्तारकैकैप्रकटीमाया॥३॥
प्रकटेअंडापिंडब्रह्मांडा। पृथिवीप्रकटकीननवखण्डा ॥ ४ ॥
वे जे ब्रह्मादिकहैं ते अपनो अपनो ब्रह्माण्ड करतब करतभये तेहिसे पवन
पानी औछाया बहुतबिस्तारकैकै मायाप्रकटभई । औचारि जे खानिहैं
अंडज पिंडज स्वेदज उद्भिज्ज प्रकट भये जे ब्रह्मांडमें हैं औ नवखण्ड पृथ्वी
प्रकट भई ॥ ३ ॥ ४ ॥
प्रकटेसिधसाधकसंन्यासी। ईसबलागिरहेअबिनासी॥५॥
प्रकटेसुरनरमुनिसवझारी। तेऊखोजिपरे सबहारी ॥ ६ ॥
औ सिद्धसाधक संन्यासी प्रकटहोतभये ये संपूर्णजे हैं ते अबिनाशीमें लागि-
रहे हैं अर्थात् अबिनाशीको खोजैंहैं ॥ ५ ॥ औसुरनरमुनिसब झारिकै प्रकटहोत
भये तेऊ अबिनाशीको खोजत खोजत हारि परे तिनहूं न पायो ॥ ६ ॥
साखी ॥ जीव सीव सब प्रकटे, वे ठाकुर सबदास ॥
कबीर और जाने नहीं, एकरामनामकी आस॥७॥
जीव औ सीव कहे ईश्वर सो सब प्रकटे सो ईश्वर तो ठाकुर भयो औ
सब जीव दासभये । सोकबीरजी कहै हैं कि हमतो दूसरोकाहूको नहीं जाने
हैं न अबिनाशी निर्गुण ब्रह्मको जानै, न सगुणईश्वरन को जानै । निर्गुण
सगुण के परे जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनके एक रामनामकी हमोर आशाहै कि
वही हमारो उद्धार करैगो अथवा कबीर कहै काया के बीर जीव ! और को
तैनाजानु एक रामनामही को जानु यही संसार ते छोड़ावैगो ॥
इति तीसरी रमैनी समाप्तम् ।