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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

( २४ ) बीजक कबीरदास ।
है यह कबीरजी बीजकभरमें कह्यो है। और अर्थ जे करैं हैं ते बीजक को अर्थ
नहीं जानैंहैं काहेते भागूदास बीजक लैभागेहैं सो बघेलवंश विस्तार में कबीरहीं
जी कहि दियो है कि अर्थ नहीं जानै हैं तामें प्रमाण ॥ “भागूदासकी खबरि-
जनाई ॥ लैचरणामृत साधूपियाई ॥ कोउ आयकह कलिंअर गयऊ । बीज-
कग्रन्थचोराइलैगयऊ॥सतगुरु कहैं वहनिगुरापन्थी । काह भयो लै बीजकग्रंथी ॥
चोरी करि वह चोरकहाई काह भयो बड़ भक्त कहाई ॥ बीज मूल हम
प्रगट चिन्हाई ॥ बीज न चीन्हो दुर्मति ल्याई ॥ बघेलवंश में प्रगटी हंसा ।
बीजक ज्ञान को करी प्रशंसा ॥ सबसों पूछी प्रेम हिंताई । आप सुरति आपैमें
ल्याई ॥ बीजकलाय गुफा में राखी । सत्यै कहौं बचन मैं भाखी "॥ सो
और २ अर्थ जे कबीरहा करैं हैं ते भागूदास औ भगूदास के शिष्य प्रशिष्य,
ते बीजक को बितंडाबाद अर्थ करिकै कबीरजी के सिद्धांत को अर्थ जो राम-
नामहै ताते जीवन को बिमुख करिदारयो नरककी राहबताय दियो काहेते
दूसरी पोथीतौ रही नहीं वोही पोथी रही तौने को मनमुखी अर्थ करिकै
आपबिगरे औ शिष्यन प्रशिष्यनको बिगारयो जे उनके सत्संग किये ते सब याही
ते नाम तोरहै भगवानदास पै भागूदास कबीरजी कह्योहै । औ मैं जो तिलक
करौंहौं बीजक को सो एकतो साहबके हुकुमई ते कियो है सो आगैलिखि आये
हैं दूसरे तिलक बनाइ बांधौगढ़में आयो तहां बयालिसवंश बिस्तार ग्रंथदेख्यो
ताकोप्रमाण तिलकमैं लिखिदियोहै पोथी पंद्रहसैकैइस के सालकी धर्मदासकें
हाथकी लिखीहै औ येहीपोथी में कबीरजी राजारामते आगम कहिदियो है ॥
“तुमसे दशौ बंश जो ह्वै हैं । सो तौ शब्द हमारो गहि हैं ॥ परमसनेही अनु-
भव बानी । कथिहैं शब्द लोक सहिदानी॥२॥तेहिते मैं जो अर्थ करौं हौं सोई
कबीर जी का सिद्धांत है” अनुबन्ध चतुष्टय-अधिकारी औ यह ग्रंथ में
चारि साधन करिकै युक्त जो पुरुष है सो अधिकारी है चारि साधन कौन हैं
नित्यानित्य बस्तु विवेक १ औ इहामुत्रार्थफल भोग बिराग २ औ दम शम
उपरति तितिक्षा औ श्रद्धा समाधान ई षट्संपत्ति ३ औ मुमुक्षुता ४
नित्यानित्यविवेक का कहावै, जीवात्मा नित्य औ देह इन्द्रिय आदि
दैके जो संसार सो अनित्यहै यहै कहावै नित्यानित्यविवेक औ इहामुत्रार्थ फल-