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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

भोग विराग का कहावै यह लोकके औ परलोकके विषे जेहैं स्रक् चन्दन बनि-
ता यह आदि दै कै जेहैं तिनको अनित्यता बुद्धिकैकै तिनते जो है बैराग्य सो
इहामुत्रार्थफलभोग विराग कहावै औ लौकिक व्यापारते मनकै जो है निवृत्ति
सो कहावै शम औबाह्य जे इन्द्रियहैं तिनकी श्रीरामचन्द्रके संबंधते व्यतिरिक्त
जो विषय है तेहिते निवृत्तिहोब जोहै सो कहावै दम औ श्रीरामचन्द्रको जौं
ज्ञान है तेहि पूर्वक उपासनाके अर्थ विहितजैहैं नित्यादिक कर्म तिनको जो हैं
त्याग सो कहावै उपरति औ शीत उष्ण आदि दैकै जेहैं द्वन्द तिनको जो है
साहब सो कहावै तितिक्षा औ निद्रा आलस्य प्रमाद इनको जो है त्याग तेहि
पूर्वक मनकै जोहै स्थिरता सो कहावै समाधान औ गुरु वेदांतवाक्यमें अवि-
चल विश्वास सो कहावै श्रद्धा औ संसारते छूटिबेकी जो है इच्छा सो कहावै
मुमुक्षुता ई साधना चतुष्टय जामें होय सो कहावै अधिकारी ।
१ विषय-औ यह जीव साहबको है औरको नहीं है यह जो है ज्ञान
सो यह ग्रंथमें विषय है २ सम्बन्ध-औ ग्रन्थको, विषय सो संबंध कौन है तात्पर्य
करिकै प्रतिपाद्य प्रतिपादकभाव ॥३॥ प्रयोजन-औ यह ग्रंथमें प्रयोजन का है
कि मन माया औ अहंब्रह्म जो है ज्ञान तौनेमें बँधा जौहै जीव सो मन
माया ब्रह्मते छूटिकै रघुनाथजीको प्राप्त होय सो प्रयोजन ॥ ४ ॥
जीवको मन माया ब्रह्मते छोड़ायकै श्रीरघुनाथजीके पास प्राप्त करिबेको
कही, अपनी उक्तिते कही, साहबकी उक्तिते कही, मायाकी उक्तिते कही, जी-
वकी उक्तिते कही, ब्रह्मकी उक्तिते कबीरजी उपदेश कियो है । औ उत्पत्ति
प्रकरण कैयो प्रकारते अपने ग्रंथनमें कबीरजी कह्योहै । सो यहां कबीरजी प्रथम
रमैनी में आदिकी उत्पत्ति कहैहैं । जबकुछ नहीं रह्यो है तब वही साहबकों-
लोक रह्यो है ताहीको परम अयोध्या कहै हैं । औ सत्यलोक सांतनकलोक
नौपैदलोक आदि दैकै नाना नामहैं तौने लोकमेंजे हंस हंसनी हैं गुल्मलता
तृणआदि दैकै तेसब चिन्मय हैं औ परमपुरुष श्रीरामचन्द्र सबके मालिक हैं
तामें प्रमाण॥"राजाधिराजःसर्वेषां रामएवनसंशयः ॥ इतिश्रुतेः॥दूसरोप्रमाण ॥
“यत्र वृक्षलतागुल्मपत्रपुष्पफलादिकम् ॥ यत्किंचित्पक्षिभृंगादितत्सर्वंभातिचिन्म-
यम् ॥” इतिवसिष्ठसंहितायाम्॥कबीरौजी कह्यो है ॥“सदा बसंतजहँफूलहिंकुंज