कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ें( २६ ) बीजक कबीरदास ।
सोहावही । अक्षयवृक्षतरसेज सोहंस बिछावहीँ ॥ धरती आकाशजहांनहीं जग
मंगै । वहियांदीनदयाल हंसकेसँगलगै ॥”तौने श्रीअयोध्याजी को जो है प्रकाश
तामें शुद्ध जीव जे हैं तेभरे हैं तिनको साहबको औ साहबके लोकको ज्ञान
नहींहै जो साहबको जानै औ साहब के लोक जाय तौ ना उलटि आवै सों
साहबको तौ जानै नहींहै याही ते माया उनको धरि लैआवैहै सो प्रथम साहब
दयाल उनमें दयाकरिकै अपनी शक्ति दैकै उनके सुरति उत्पत्ति करतभये
कि हमको जानै हमारे पास आवै तौ मायातें बचि जाय सो आदिमंगलमें
कहि आये हैं जब उनके सुरति भई तब वे धोखा ब्रह्ममें औ माया में लगिकै
संसारी भये सो साहब बहुत हटक्यो सो हटको ना मान्यो सो आगे
बोलिमें कहेंगे ॥ “ तू हंसामनमानि कहौ रमैया राम । हटल न मान्यों
मोर हो रमैया राम । जसकीन्ह्योतसपायोहो रमैया राम । हमरदोषज
निदेहु हो रमैया राम ॥ ” औ साहबके लोकमें मनादिकनको कारण
नहींहै, तामें प्रमाण ॥ “ नयत्रशोकोनजरान मृत्युर्नकालमायाप्रलयादिवि-
भ्रमः ॥ रमेतरामेतुसतत्रगत्वास्वरूपतांप्राप्यचिरंनिरंतरम् ॥ इति वसिष्ठसं-
हितायाम् ॥१॥ कबीरौ जीकह्यो है ॥ “ तत्वभिन्ननिहतत्वनिरक्षरमनैप्रेमसेन्या
रा । नाद बिंदुअनहदनिरगोचरसत्यशब्द निरधारा ॥”औ साहब को लोक सबके
पार है सो मंगल में कहिआये हैं जो साहब को जानै औ साहबके लोक जाइ
तौ संसार में ना आवै सो तौनै उत्पत्ति श्रीकबीरजी प्रथम रमैनी में संक्षेप तें
कहै हैं औ सबकी उत्पत्ति साहब के लोकके प्रकाश के बहिरेहीते होइहै तामें
प्रमाण ज्ञानसागरको ॥“जानैभेद न दूसरकोई । उतपतिसबकीबाहरहोई॥१॥”