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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 766 में से

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पृष्ठ 84

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नहीं है " यह जानि साहब बिचार्यो कि हम इनको सुरति देयें जेहिते हमको
जानि लेइ तौ मैं हंसरूप दैके आपने धामको बोलाय लेउँ । सो जब साहब
सुरति दियो तब चैतन्यता भई अर्थात् स्मरणभयो यही चित्तकी उत्पत्तिहै । औ
वाको रूपतो अणुहै सोतो आपनोदेखैनहीं है संकल्प विकल्प करैहै कि मैंहों
कि नहींहौं, यही मनकीउत्पत्ति है। फिरि बिचार्यो कि मैं हौं तो, पै कौनहौं आ-
पनो रूपतो देखैनहीं है । फिरि निश्चयकियो कि जोमैं होतो न तो यहसंकल्प
विकल्प काको होतो याते मैंहौं यहीं बुद्धि की उत्पत्ति भई । जौने लोक प्रकाशमें
अपार है ताको देखि मानत भयो कि सत्चित् आनंद स्वरूप सो महींहौं यही
अहंब्रह्मरूप अहङ्कारकी उत्पत्ति है । सो जब समष्टिजीव आपनेकों चिद्रूप ब्रह्म
मान्यो तब वही पूर्वजगत् कारणरूपा योगमाया अर्थात् साहब तें विमुखता-
रूपा सो स्थूलरूप ते चिद्रूपा योगमाया लागी । तब आपनेको सच्चिदानंद ब्रह्म
मानिकै एकते अनेक