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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

रमैनी । ( २९ )

रहतभयो सो ब्रह्म अकर्ताहै निर्धर्महै, मनमायादिकते रहितहै, देशकाल
बस्तु परिच्छेदते शून्यहै सो ऐसे ब्रह्मको जीवत्वको भ्रम कहांतेभयो जो
कहो वह ब्रह्म जीवत्वको धारणनहींकियो वाको तो भ्रमही नहींहै काहेते कि ॥
सत्यंज्ञानमनंतंब्रह्म ॥ यह श्रुतिलिखै है वाको भ्रमतो संभवितै नहीं है भ्रमतो
जीवनको भयो है, जिनको ब्रह्मको विज्ञानहै, तिन को न जीवत्व है न संसार
है । जैसे अज्ञानी जीवनको संसारही देखिपरे है तैसे ज्ञानी जीवनको ब्रह्मही
देखिपरे है । तौ सुनो तुमही दुइज्जीव कहौहौ एक अज्ञानी जीव एकज्ञानी
जीव । सो अज्ञानी जीवको या कह्यो कि संसारही देखाय है सो ब्रह्मके तौ
अज्ञान होताहीं नही है, जाते आपको जीवत्व मानिकै संसारीहोय । जो
कहो मायाते शबलित ह्वैकै ब्रह्मही जीव होई संसारी है जाय है तौ माया
को तौ मिथ्या कहौंहौं । मायाशब्दको अर्थः मिथ्यैव । फिर ब्रह्मको तौ ज्ञान-
स्वरूप कहि आये