कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी। ( ४१ )
काहूके बहुतपांय काहूके मूंडनहीं ( छिन्नमस्ताको ध्यान लिखे है कि, हाथमें
मूँडलीने है गलेमें लोइ चले है सो मुहेमें परैहै ताको पीये है ) । और नाना-
भांतिकी जो है कर्म्म-प्रतिपादिका बाणी अर्थात अद्भुत रूपनकाहै ध्यान तिनमें
यहिरीति के देवतनकी उपासना करैहै औनाना जातिकीकहे नाना तरहकी है
उपासना बर्णन जिनमें ऐसी उनकी बाणीसुनके तिन 'तिन देवनपर जीवनकी
प्रीति उपजतभई । औ रमैनीठानी जो कह्यो सो अपने अपने उपास्य देव
तनकी रमनी कहै कथा सो ब्रह्मादिकन की बाणीको आशयलेके बनाय लेते
भये ॥ ३ ॥ गुणीजेंहै सगुण उपासनावाले तेजिवको स्वस्वरूप दासरूपता
खोजनलगे औअनगुणी जैहैं निर्गुणवाले ते जीवको अनुमान जो ब्रह्मत्वरूपता
खोजनलगे सो वा वेदतात्पर्यार्थ दुइमें कोई नहीं पाये अर्थात् बहुतेरेनेबहुत-
बिचारकियो परंतु न चीन्हपायो ॥ ३ ॥ ४ ॥
जोचीन्है तेहिनिर्मलअंगा । अनचीन्हेनलभयेपतंगा ५
जे यह धोखाको जानैहैं कि यह धोखाहै तिनहीं को जानिये कि इनके
पारखहै । यहबात बिनाजाने जगत्के जेजीवहैं ते जैसे दीपकमें पतंग जरिजा-
यहै ऐसे वह धोखामेंपरिकै नाना दुःखपावैहैं । औ जोकोई साहबको चीन्हैहै
जाको नेतिनेति वेदकहैंहैं औ पारिख करैहैं ताके निर्मलअंग हैजायहै अर्थात्
हंसरूप पावै है । काहेते कि वह साहब तो निर्गुण सगुण मनबचनके परैहै
सोजब वाको चीन्ह्यौ तब वाहू मनबचनके पर है जायहै ॥ ५ ॥
साखी॥चीन्हि चीन्हि कह, गावहू वाणीपरी न चीन्ह ॥
आदिअंत उत्पत्तिप्रलय,सवआपुहिकहिदीन्ह ॥६॥
चीन्हौ चीन्हौ तुमकहा गावहुहौ अर्थात् कहाकहौहौ वहबाणीतो तुमकों
चीन्हि नहीं परी काहेते बाणी आपही कहतजाय है कि जाकी उत्पत्तिहोयहै
ताकी प्रलयभी होय है; जाकी आदि होयहै ताको अंतहू होयहै, तातेजेते
पदार्थ जगत्में बाणी आदिदैहैं ते मन बचनके परे नहीं हैं । औ जोचीन्हैहै
ताको निर्मल अंग होयजायहै । यहजो कह्यो ताते यहदेखाय दियो कि जब