सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 78

अथ बीजक प्रारम्भः।
अथ रमैनीप्रथम ॥ १ ॥ २ ॥
चौ० जीवरूपयकअन्तरबासा। अन्तरज्योतिकीनपरगासा १
इच्छारूपनारि अवतरी। तासु नाम गायत्री धरी २
तेहिनारीकेपुत्रतिनभयऊ। ब्रह्माविष्णुमहेशनामधरेऊ ३
तबब्रह्मापूंछतमहतारी। कोतोरपुरुषकाकरितुमनारी ४
तुमहमहमतुमऔरनकोई। तुममोरपुरुषहमैंतोरिजोई५
साखी–बाप पूतकी एकै नारी औ एकै माय बिआय ॥
ऐसापूत सपूत न देख्यो जोबापै चीन्है धाय ॥ १ ॥
चौ० जीवरूपयकअंतरवासा। अंतरज्योतिकीनपरगासा १
श्रीरघुनाथजीके लोकको जो है प्रकाश तेहिकै अन्तर जे हैं जीव एक
रूपते कहे समष्टिरूप ते बास किये रहे, यहां यह भाव प्रगट है कि, जीवनकी
सुरति औरई है और वह (जीव) औरई है सो-अंतरज्योति कहे साहबके
लोकको जोहै प्रकाश तेहिकै अंतरकहे भीतरै अपनई प्रकाश करतभये अर्थात्
सुरतिकी चैतन्यता पाय मनादिक उत्पन्नकै संसार प्रकटकै संसारी ह्वैगये।
साहबको न जानत भये या बात मंगलमें विस्तारते कहिआयेहैं याते इहां
प्रसङ्गमात्र सूचित कियो है। जब प्रलयहोयहै तबहूं वही ब्रह्ममें लीन होइ
है उहैंते पुनि उत्पत्ति होइहै औ अनुभव धोखा ब्रह्ममें ज्ञान करिकै जे मुक्त-