कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८ ) बीजक कबीरदास ।
होयहैं ते सनातनज्योति जोहै अयोध्याजीको प्रकाश वही ब्रह्म जहां पूर्वलीन
रहे है तहैं जाय लीनहोयहै औ जे श्रीरामचन्द्रको जाने हैं तेज्योति वह
भेदिकै श्रीरामचन्द्रके पास जायहैं तामें प्रमाण ॥ ( सिद्धाब्रह्मसुखेमग्नादैत्या-
श्चहरिणाहताः ॥ तज्ज्योतिर्भेदनेशकारसिकाहािरवेदिनः ॥ तामें कबीरजीको
प्रमाण ( जैसे माया मन मिल्यो ऐसेरामरमाय । तारामंडलभेदकै तबैअमरपुर-
जाय ) ॥ औ धोखाको अर्थयहहै जो औरेको और देखे सो कौनहै कि, एक
जोहै सर्वत्रपूर्ण लोकप्रकाशब्रह्म ताके अंतर कहे भीतर अनुरूप जेजीव ते सम-
ष्टिरूपते बास कियेरहे । सो अंतरज्योति प्रकाश कहे जब साहब सुरतिदियो
सोई अंतरप्रकाश करतभई तबजीवको जान परनलग्यो चैतन्यता आई तब
संकल्प विकल्पकियो कि मैं कौन हौं यही मनकी उत्पत्तिभई सो जीवकोरू-
पतौ ॥ ( बालाग्रशतभागस्य शतधाकल्पितस्यच । भागोजीवःसविज्ञेयः सच्हानं-
त्यायकल्पते ) ॥ इतिश्रुतेः ॥ तामें कबीरजीकों प्रमाण-(बहुत बडा ना तनकसा,
तनकी भी है नाहि । औरत मरद् न कहिसके, औ रह सबही माँहि ॥) इत्या-
दिक प्रमाण करिकै वाको स्वरूप तो अणुहै सोतो वाको न देखिपर्यो सर्वत्र
प्रकाशरूप ब्रह्मदेख्यो सो मान्यो कि महीं ब्रह्महौं यही धोखा ब्रह्महै ।
जीव ब्रह्मविषयक शंकासमाधान॥ जो कहो जीव ब्रह्मतों बने है जीव
कहना यहीयाकी भूलहै । जब याको ज्ञानभयो ज्ञानते बिज्ञानभयो अनुभवानन्द
प्राप्त भयो जबभर अनुभवानन्द बनोरहै है तबभर याकोजीवत्वको लेश बनोरहैहै
जब अनुभवानन्दरूप ही द्वैगयो तबयाको जीवत्व मिटिगयो संसारऊ मिटिगयो
एक आपही आप रहतभयो ? तुमकैसे कहौहौ कि “ जीवको ब्रह्महोना धोखा-
है”। जो ऐसे कहौ तौ सुनौ ! जोपदार्थ बीचकोहोय है सो मिटिजायहै औ
जो पदार्थ सनातनहै सो नहीं मिटिजायहै कैसे जैसे तुमकहौहौ कि जीवत्व
बीचहीको है वही ब्रह्म अनेकरूप धारण कैलियो है, एकते अनेक होइगयौहै,
जब जीवत्वको भ्रम मिटिगयो तब ब्रह्मही रहिजायहै,जो प्रथम रह्यौहै सोईरहि-
जायहै । जो पदार्थ बीचको होयहै सो मिटिजायहै । तैसे हमहूं कहैंहैं कि आदि
में तो जीवह्यो है सो जब संसार छूट्यो तब शुद्धजीवको जीवही रहिजायहै ।
जोकहो ब्रह्मही जीवद्वैजायहै तौ हम तुमसों या पूछे हैं कि प्रथम तो ब्रह्मही