कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३० ) बीजक कबीरदास ।
तामें प्रमाण ॥ "येन्येऽरविन्दाक्षविमुक्तमानिनस्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः ॥
आरुह्यकृच्छ्रेणपरंपदंततः पतंत्यधोनादृतयुष्मदंघ्रयः" ॥ इतिभागवते ॥ तेहिते
साहबके लोक प्रकाशमें भरे जे जीवहैं तहेंतेव्यष्टि होतहै औ तहँ समष्टिरूप
करि लीनहोतहै । अनादिकाल यहीक्रमहै । सो जैसोहम वर्णनकरिआये हैं
ताही रीतिमें प्रकाशरूप जो ब्रह्महै तामें निर्विकारत्वनिर्धर्मत्वादि जे वेदांतमें
विशेषणहैं ब्रह्मके ते बन रहेहैं औरीभांतिनहीं संघटित होयहै औ प्रकाशरूप
जो ब्रह्महै सो निर्विकारहै निर्धर्म है अकर्त्ताहै, वाकी करी रक्षा जीवकी नहीं
होयहै । दूनोंते परे जे साहबहैं तिनको जोजानैहै, जानिकै उनके लोकको
जाय है सो फेरि नहीं आवैहै वे रक्षाकरिलेयहैं काहेते वहां मन मायादिकन
की गति नहीं है ॥ तामेंप्रमाण ॥ “यद्गत्वानानिवर्तंतेतद्धामपरमं मम” ॥
औ जगत्की उत्पत्ति जो उपनिषदन्में लिखैहै सो समष्टिरूप जीवही ते लिखैहै
सोकहेंहैं ॥ "सदेवसौम्येदमग्रआसीदेकमेवाद्वितीयं" ॥ इतिश्रुतेः ॥ एककहे
सजातीयभेदशून्य अद्वितीय कहे विजातीयभेदशून्य एवकारते स्वगत
भेदशून्य यद्यपि सूक्ष्म भेद वामें बने हैं परन्तु समष्टिरूपकरिकै जीव एकही-
रहै है । प्रलयमें अथवा जीवत्व करिकै एक रहैहै यह श्रुति सतनाम कैकै
कहैहै ताते अनामा जोब्रह्म है तामें नहीं लगै है औ दूजी श्रुति है ॥ “सऐ-
क्षतएकोऽहं बहुस्याम्” ॥ तौनै जो है समष्टि जीव सो सुरति पायकै इच्छा
करतभो कि, एकते बहुत होउं सो या ब्रह्मारूप जो समष्टि जीव ताहीमें
लगैहै औ ब्रह्मपद यह समष्टि जीवहीमें घटित होय है काहेते बृहिबृद्धौ यह
धातु है व्यष्टिते समष्टि हैजायहै समष्टिते व्यष्टिहोइजायहै । औ वहजो लोकप्र-
काश ब्रह्मएक रस न घटै न बढै तामें एकोऽहंबहुस्याम् या अर्थ नहीं लगै है।
औ अनुभव करि आपनेको जो ब्रह्म मान्यो है सो तो धोखैहै नाममिथ्यैहै । सो एकतो
समष्टि जीव रूप सगुण ब्रह्म तौन औ एक लोक प्रकाश रूप निर्गुण ब्रह्म तौन ई दूनोंते
साहब परेहैं । औ मंगलमें पांच ब्रह्मकहिआयेहैं सोनारायणजेंहैं साकार ते औ
तिनके अंतर्यामीजेहैं निराकारतत्त्वरूप नारायणते ई दूनों जे साकार निराकारहैं
तिनते साहब परे है औ निराकार साकार ये दोऊ साहबके शरीरहैं तामें प्रमाण
"यामिच्छसिमहाराज तांतनुंप्रविशस्वकाम । वैष्णवींतामहातेजो यद्वाकाशंसनात