कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
साखी । ( ६४९ )
मतिबिंब बीजकमें दिखायो अर्थात् यह बतायदियो कि, रामनामहीते जगत
मुख अर्थ में सबकी उत्पत्ति भई है । औ रामनामही साहबको बतावै है
साहब मुख अर्थमें । औ अनिर्वचनीय साहबको रामनामही देखाय देइहै यह
भी कबीरजी अलखके देखिबेको उपाय बताय दियो यही अलखको लखावनो
है सो जब साहब को ह्वैजाय तब या लखै तामें प्रमाण सुखसागरको ॥ “अ-
लख अपार लखै केहि भांती । अलखलखै अलखैकी जाती ॥ ३४१ ॥
बूझौ करता आपना, मानौ बचन हमार ॥
पंचतत्त्वके भीतरै, जिसका यह बिस्तार ॥ ३४२ ॥
तुम कहांते आये औ तुमको को कियों सो अपने कर्त्ताको तुम बूझौ वह
साखी में तो बचन हम कहि आये ताको तुम मानौ तुम वह शब्द रामनामही
ते भये हौ जिसका यह बिस्तार सब देखतेहौ औ जौन जौन मानिदी तुम
मानिराखेहौ सो सब पंचतत्त्वकेभीतरहै एकवह रामनामही पंचतत्त्वके बाहिर है
औ वही तुम्हारो आदि कर्त्ता है ॥ ३४२ ॥
हमकर्त्ताहैं सकल सृष्टिकै, हम पर दूसर नाहि ॥
कहै कबीर हमैं नहिं चीन्है,सकल समानाताहि ॥३४३॥
हमहीं सम्पूर्ण सृष्टिके कर्त्ता हैं हम मालिक दूसर नहीं है हमहीं सबकें
मालिकहैं सबमेरेहीं में समानेहैं हमहीं ब्रह्महैं ऐसा कोई कोई कबीर कायाके
बीरजीव कहै हैं ताको आपै खंडन करै हैं ॥ ३४३ ॥
सुतनहिं मानै बातपिताकी, सेवै पुरुष बिदेह ॥
कहै कबीर अबहुँ किन चेतौ, छांड़ो झूठ सनेह ॥३४४॥
तैं सुतहै रामनाम प्रतिपाद्य जे साहबहैं ते तेरे पिताहैं तिन की बात तैं
नहीं मानै है औ बिदेह पुरुष जो है ब्रह्म ताको सेवै है कहे आपही ब्रह्म ह्वै
बैठै है सो अबहूं चेतकरु साहब कहि आये हैं कि॥ "अजहूं लेहुँ छड़ाय कालसों जो घट
.( ६५० ) बीजक कबीरदास ।
सुरातिसंभारै"॥ सो ऐसे पिताकी बातमानु यह झूठसनेह छोड़िदे जो अपने को ब्रह्म
मानिकै बैठे हैं कि महीं ब्रह्महौं यह ब्रह्मतौ मनको अनुभवहै झूठा है जीव ब्रह्म
कबहूं नहीं होयहै ॥ ३४४ ॥
सबै आशकरशून्यनगरकी, जहां न कर्त्ता कोई ॥
कह कबीर बूझौ जियअपने, जातेभरम न होई॥३४५॥
सबै वह शून्यनगरकी आशाकरै हैं जहां कोई कर्त्ता नहीं है सो वह तौं
झूठाहै सो कबीरजी कहै हैं कि तुम अपने मनमें बूझौ तौ उहांतौ कर्त्ता हई
नहीं है औ जगत् बनैहै तौ कौन जगत को कियो है तेहिते निराकार अकर्त्ता
ब्रह्म कहनूति जो कहो है सो सब झूठी है सो यह तुम अपने जियमें बूझौ
जेहिते ब्रह्मवालो भ्रम तुमको न होइ ॥ ३४५ ॥
भक्तिभक्ति सबकोई कहै, भक्ति न आई काज ॥
जहँको किया भरोसवा, तँहते आई गाज ॥ ३४६ ॥
भक्तिभक्ति सबकोई कहै हैं और और देवनकी भक्ति करै हैं सो वा भक्ति
कौनौ काज न आई जेहि जेहि देवंको भरोसा कियो तहांत गाजआई कहे वें
सब काल स्वरूपहैं सब याको मारिकै अपने लोक लैगये जब महाप्रलय भई
तब इष्ट औ उपासक दोऊ न रहे पुनि जब जगत्की उत्पत्ति भई तब कर्मा-
नुसार वोऊ उत्पन्न भये ॥ ३४६ ॥
समुझौ भाई ज्ञानियो , काहु न कहा सँदेश ॥
जेइ गये बहुरे नहीं, है वह कैसा देश ॥ ३४७ ॥
हे भाई ज्ञानिउ तुम समुझते जाउ तौन तुम ब्रह्म ब्रह्मकहौ हौ तहां कों
संदेश कोई न कह्यो कहे सब वेदांती ब्रह्मज्ञानी कहैं हैं कि वाको तो हमकही
नहीं सकैहैं धोकेसाहै औ जे उहां गये ते बहुरिकै न आये जो वहां को सन्देश
बतावैं अर्थात् कुछ न हाथ लग्यो ॥ ३४७ ॥
धोखे सबजग बीतिया, धोखे गई सिराइ ॥
स्थितिनाकरै सो अपनी, यहदुख कहा न जाइ३४८॥
साखी । (६५१)
धोखाही तें सम्पूर्ण जगत् व्यतीत होगया और धोखाही ते सिराय गया औ
यह मन अपनी स्थिति नहीं पकरै है स्थिर नहीं होयहै सो अपनी भूल कासों
कहै यादुःख काहूसों नहीं कह्यो ॥ ३४८ ॥
मायाते मन ऊपजै, मनते दश अवतार ॥
ब्रह्माँविष्णु धोखेगये, भरमपरा संसार ॥ ३४९ ॥
साहब औ साहबकें पास पहुँचेहैं जे तिनको छोड़ै और सब मनके फन्दमें
परे हैं और अर्थ स्पष्टही है ॥ ३४९ ॥
रामकहतजगबीते सिगरे, कोई भये न राम ॥
कहकबीर जिनरामाहिं जाना, तिनके भे सबकाम३५०
हमहीं रामहैं हमही रामहैं या कहत कहत सब सब जग बीतिगये कहैं
मरिगये परन्तु कोई राम न भये औ कबीरजी कहैहैं कि जिन श्रीरामचन्द्रकों
मालिक जान्यो है तिनके सब काम ह्वैगये हैं ॥ ३५० ॥
यहदुनिया भै बावरी, अदृश्यसों बाँध्यो नेह ॥
दृश्यमानको छोड़िकै, सेवै पुरुष विदेह ॥ ३५१ ॥
यह दुनिया बावरी है गई अदृश्य जो निराकार ब्रह्म तासों नेहबाँध्यो है सो
वातो धोखाहै काको मिलै जीव ब्रह्म होतही नहीं है सो दृश्यमान जे साहब
श्रीरामचन्द्रहैं तिनको छोड़िकै वा बिदेह पुरुष निराकार ब्रह्मको सेवै है अर्थात्
वाहीमें लागैहै ॥ ३५१ ॥
राजा रैयत ह्वैरहा, रैयत लीन्हीं राज ॥
रैयतचाहै सवालिया, ताते भया अकाज ॥ ३५२ ॥
राजा जो साहब है सो रैयत है रहा है अर्थात् वाको कोई जानतही नहीं
है औ रैयत जो धोखाब्रह्म सो सब लेत भयो अर्थात् सब जगत् वाही में लग-
त भयो सो रैयत जो है अहम्ब्रह्मास्मि सो साहबको सब लियो चाहै है अर्थात्
आपै ब्रह्म होन चाहै है ताते अकाज भयो माया के बश है आपनेनको
मालिक मानन लग्यो ॥ ३५२ ॥
( ६६२ ) बीजक कबीरदास ।
जिसका मंत्रजपैं सब सिखिकै, तिसके हाथ न पाउं ॥
कहै कबीर मातुसुतकाही, दिया निरंजन नाउं॥३५३॥
जिसका मन्त्र सब सिखिकै जपै हैं प्रणव उसका अर्थ ब्रह्मही है जिसके
हाथ पांउ नहीं हैं औ निरञ्जन जो है ब्रह्म ताको निरञ्जननाम मायैको धरायो
है माया वा निरञ्जन ब्रह्मकी माता है काहेते कि या निरञ्जन नाम बचन में
आवै है बिज्ञान करिकै अनुभव जो ब्रह्म होईहै सो मनका अनुभवहै मायै-
को पुत्रहै वह माया मनमें मिलि इच्छारूपहै सो जाको तुम ब्रह्म कहौहौ सोई
माया ते रहित नहीं है तुम कैसे अहम्ब्रह्म मानि माया ते रहित होउगे तामें
प्रमाण कबीरजीके शब्दको ॥ “मनपरपञ्ची मनैनिरञ्जन मनही है ओङ्कारा ।
तीनलोक मनफांसिलियाहै कोई न मनते न्यारा ॥ ३५३ ॥
जनि भूलौरे ब्रह्मज्ञानी, लोकवेदके साथ ॥
कहकबीर यह बूझहमारी, सो दीपकालियेहाथ ३५४॥
कबीरजी कहै हैं कि रे ब्रह्मज्ञानी तुम जनि भूलौ लोक वेदके साथ लोकमें
सरहना पायकै वेद में धोखाब्रह्ममें लगिकै अर्थात् तुम यामें न खराब होउ । सों
कह कबीर यह बूझ हमारी कहे कायाके बीर जीवौ परमपुरुष जे साहब श्रीरा-
मचन्द्र तिनमें तन मन ते लागो जो हमारी बूझहै सोई साहबके अनुराग रूप
दीपकहाथमें लेउ जाते संसाररूप अन्धकारते पारहोउ ॥ ३५४ ॥
देव न देखा सेवकाहि, सेवक देवनदीख ॥
कहकबीर इन मरते देखो, यह गुरु देई सीख॥३५५॥
देवता आपने सेवकको सेवक आपने इष्ट देवताको न दीख तिनको कबी-
रजी कहै हैं कि हम दूनों को मरते देखा है अर्थात् महाप्रलय में नहीं रहैं ताते
हम गुरुकी सीख इनको देते हैं कि धोखा औ नाना मतको त्यागि साहब कों
जानो जाते जनन मरण छूटै या सीख देते हैं ॥ ३५५ ॥
तेरीगति तैं जानै देवा, हममें समरथ नाहीं ॥
कहकबीर यहभूल सबनकी, सबपरे संशय माहीं॥३५६॥
साखी । (६५३)
सब लोग या कहै हैं तुम्हारी गति तुम्हीं जानो हममें सामर्थ्य नहीं है जौन
हमको गुरु बताय दियो है ताही मे लगें हैं : तिनको कबीरजी कहैं हैं कि इन
सबकी भूल ईश्वर तो बताबै न आवेंगे औ जीवका तो आपने साहबको जानबै
चाही नाहक संशयमें परे हैं साहबको जानैं तौ साहब छुड़ाइ लैइँगे ॥ ३५६ ॥
खालीदेखिकै भरमभा, ढूंढ़ताफिरै चहुँ देश ॥
ढूंढ़त ढूंढ़तमरगया, मिला न निर्गुणभेश ॥ ३५७ ॥
जौने संशयमें सब बूड़िगये हैं सो संशय कबीरजी देखावै हैं खाली कहें
शून्य देखिकै सब जीवन को भरम भयो सो देवता परोक्षहै वाको अर्थ जानै
नहीं हैं औ चारों देशमें ढूंढत फिरै हैं औ केते वा निर्गुण धोखाब्रह्म को ढूंढ़त
ढढ़त मरि गये खोज न लाग्यो ॥ ३५७ ॥
बूझ आपनी थिररहै, योगी अमर सो होइ ॥
अब बूझै भरमै तजै, आपै और न कोइ ॥ ३५८ ॥
देखादेखी सबजग भरमा, मिला न सतगुरु कोइ ॥
कहै कबीर करत नितसंशय, जियरा डाराखोइ॥३५९॥
गुरुवा लोग कहैं हैं कि जो बूझ थिर रहै तौ योगी अमर है जाय जोजग-
त्के नाना भ्रमछोड़िकै अबहूं बूझै तौ एक आपही है दूसरानहीं है मारैगा कौन
ऐसे कहि कहि देखादेखी श्रीकबीरजी कहैं हैं कि सबजगत् भरमि गयो सतगुरु-
कहे साहबके जाननवारे इनको कोई न मिलो हमहीं ब्रह्महैं यही संशय में डा-
रिकै आपने जीवन को खोइ डारे अर्थात् नरकमें डारिदिन्हे ॥ ३५८॥३५९॥
ह्रांकी आश लगाया, झूठी ह्रांकी आश ॥
गृहताजि वनखंड मानिया, युगयुग फिरै निराश॥३६०॥
वा ब्रह्म जो धोखा ताकीआश लगाये है सो आश तेरी झूठी है गृहत्या-
गिकै जाके हेत तुम बनखण्डमें टिकेहु सो युग युग निराश फिरौगे अर्थात्
ठिकान न लगैगो वह मिथ्याहै बिना साहबके जाने संसारते न छूटैगो ॥३६०॥
नेइके बिचले सबघर बिचला, अब कछु नाहिं बसाइ॥
कहैकबीरजोअबकीसमुझे, ताकोकालनखाइ ॥३६१॥
( ६५४ ) बीजक कबीरदास ।
कबीर जी कहै हैं कि नेइ जब बिगरि जायहै तब सगरौ घर बिगरि जायहै
ऐसे नेइ जो है धोखाब्रह्म जौनेको गुरुवालोग समुझावै है सोई जब मिथ्या
ठहरयो तब और सब लोकके देवता येई घरहैं ते बिगरिबोई चाहें अर्थात् इनते
अब कौन सांचफल मिलै सो श्री कबीर जी कहै हैं जो कोई साहब को समझै
अर्थात् तन मन ते लागै ताको काल नहीं खाय है और सब कालकों
कलेवा हैं ॥ ३६१ ॥
रामरहे बनभीतरे, गुरुकी पूजि न आश ॥
कहकबीर पाखंडसब, झूठे सदा निराश ॥ ३६२ ॥
बन जो है संसार तौनेके भीतर जब जीव भयो रामरहे कहे वह जीव रामते
राहत भयो रामको पुनि बरिआई पावै है अथवा रामते रहित जब जीवभयो तब
संसारी ह्वै जायहै और परमगुरु जे सुरति कमलमें बैठे रामनाम बतावै हैं तिनकी
आश न पूजतभई वे रामनाम बतावै हैं यह नहीं सुनै हैं वे छुड़ावन चहै हैं
सो नहीं छूटै हैं औ जे साहबको छोड़ि और औरमें लगावै हैं ते सब पाखण्डी हैं
झूठे हैं औ पाखण्डी जे हैं और औरमें लागे हैं तिनकी मुक्ति कबहूं नहीं होईहै
वे सदा निराशरहें तामें प्रमाण चौरासी अङ्गकी साखी॥"चकई बिछुरी रैनि की
जाय मिली परभात ॥ जे जन बिछुरे रामते दिवस मिलैं नहिं रात"॥३६२॥
बिनारूप बिनरेखको, जगत नचावै सोइ ॥
मारै पांचौजोनहीं, ताहिडरै सबकोई ॥ ३६३ ॥
जोमन जगत् को नचावै है सो बिनारूपको है औ बिनारेखको है आकाश
वायु आदिक जेहैं तिनमें रूपनहीं है पै रेख देखी परै है औ वायुको स्पर्श होय है
सोई रेखहै औ मनके रेखऊ नहीं है सो जे पांचौ पांचो ज्ञानेद्रिय कर्मेंन्द्रियकों
नहीं मारै हैं ऐसे गुरुवन को सबजने डेराते जाउ नहीं तौ तुम्हहूं को संसार
में डारि देइँगे ॥ ३६३ ॥
डरउपजा जिय है डरा, डरते परा न चैन ॥
देखा रामहि हैनहीं, यहौ कहै दिनरैन ॥ ३६४ ॥
साखी । ( ६५५ )
यहीं मनते डरउपजा कहे यहीके अनुभवते ब्रह्मभयो सो भूत ब्रह्मको सबै डेंरा-
यहैं सो यही ब्रह्मके डरमें जीव परा है कहे हराहै सो यह ब्रह्मके डरते चैन न
याको परा अर्थात् यह ब्रह्मको ढूंढ़तही रहिगयें न पायो न ब्रह्म भयो न
चैन भयो यह कहै हैं कि राम को कोई देखा है हमतो नहीं देखा जो कोई
हमको देखाइ देइ तौ हम मानैं सो अरे मूढ़ौ तुमतो डरमें परेहौ तुमको कैसें
देखाइदेइँ जाको साहब कृपाकरै हैं ताको देखाइ देइहौं ॥ ३६४ ॥
सुखको सागर मैं रचा, दुखदुख मेलो पांव ॥
स्थिति ना पकरै आपनी, चले रङ्क औ राव ॥३६५॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि मैंतो या बीजक ग्रन्थमें सुखको सागर रच्यो है
कहे साहबको बताइ दियो है तामें नहीं लगे दुःखमें पाँउ मेले है अर्थात् कहूं
ब्रह्ममें कहूं ईश्वरनमें कहूं नानामत में लागे है जहां याकी स्थिति है साहबमें
तिनको नहीं पकरै याही ते राजा रंक सब चले जायहैं कालखाये लेइहै ॥३६५॥
दुख न हता संसारमें, हता न शोक वियोग ॥
सुखहीमें दुखलादिया, बोलै बोली लोग ॥ ३६६ ॥
या संसार जो है सो चित अचितरूप साहबको है सो जो कोई साहबरूप
करि संसारको देखै है ताको न दुःख न शोकहै न वियोगहै साहबतो सर्वत्रपूर्ण है
ऐसो सुखरूप जो है संसार तामें मोर तोरमें परिकै दुखलादिया कहे दुःखभोगन
लग्यो औ वही मोर तोरकी बोली लोग बोलै हैं साहबको नहीं जानै हैं ॥३६६॥
लिखापढ़ीमें परे सब, यहगुण तजै न कोइ ॥
सबै परे भ्रमजालमें, डारा यह जिय खोइ ॥ ३६७ ॥
सब लिखापढ़ीमें परे हैं वेदशास्त्र तात्पर्य्य करिकै साहब को बतावै हैं सो
तो न जान्यो वादविवाद पढ़िपढ़ि करनलगे नये नये ग्रन्थ बनाय लेन लगे लिख-
नलगे वेदशास्त्रको अर्थ फेरि डारनलगे साहब मुख अर्थ जौन तात्पर्य्य करिकै
वेदशास्त्र बतावै हैं ताको छोड़ि अर्थ बदलै हैं या गुणको कोई नहीं छांड़ै
याही ते सब भ्रमजालमें परे आपने जियको खोइ डारचो ॥ ३६७ ॥
(६५८) बीजक कबीरदास ।
बहु परचै परतीति दृढ़ावै सांचेको बिसरावै ।
कळपत कोटि जन्म युग वांगै दर्शन कतहुं न पावै ॥
परम दयालु परम पुरुषोत्तम ताहि चीन्ह नर कोई ।
तत्पर हाल निहाल करतहै रीझतहै निज सोई ॥
बधिक कर्म करि भक्ति दृढ़ावै नाना मतको ज्ञानी ।
बीजक मत कोइ बिरला जानै भूलि फिरै अभिमानी ॥
कह कबीर कर्त्तामें सबहै कर्त्ता सकल समाना ।
भेद बिना सब भरम परे कोउ बूझै संत सुजाना ॥ ३६१ ॥
इति श्रीकबीरजी विरचित बीजक तथा सिद्धि श्रीमन्महाराजाधिराजश्रीमहाराजा
श्रीराजाबहादुरश्रीसीतारामचन्द्रकृपापात्राधिकारिविश्वनाथसिंहजूदेवकृत-
पाखण्डखण्डनी टीकासमाप्ता । शुभमस्तु ।
बघेलवंशागमनिर्देश ।
दोहा-वंदौं वाणी वीण कर, विधिरानी विख्यात ॥
वरदानी ज्ञानी सुयश, हरि गानी दिन रात ॥ १ ॥
मदन कदन सुत मुद सदन, वारण वदन गणेश ॥
वंदतहों अरविंद पद, प्रद उर बुद्धि विशेष ॥ २ ॥
सवैया-श्रीरघुनंदन श्रीयदुनंदन औध द्वारकाधीसविलासी ।
रावणकंस विध्वंस किये जिन अंश भयअवतारप्रकाशी
पारकयाभवसिंधु अपारको वोहितनामजासंतसुपासी।
वंदत हौं तिनके पद द्वंद्व सुमैं अरविंद अनंदकेरासी ॥
दोहा-शंकर शंकर पद कमल, वंदन करौं निशंक ॥
शिर मयंक शुचि वंक जेहिं, लसति शैलजा अंक ॥३॥
प्रियादास पद पद्म युग, पुनि पुनि करहुँ प्रणाम ॥
विश्वनाथ नरनाथ गुरु, हरि स्वरूप सुखधाम ॥ ४ ॥
सांच मकुंद स्वरूपजे, नाम मुकुंदाचार्य्य ॥
वंदौं नृप रघुराज गुरु, करन सिद्धि सब कार्य्य ॥ ५॥
( ६६० ) बघैलवंशवर्णन ।
रामभक्त शिरताज जे, महाराज विश्वनाथ ॥
करन अनाथ सनाथ पद, पुनि पुनि नाऊं माथ ॥ ६ ॥
सवैया-भूपशिरोमणिश्रीविश्वनाथतनैरघुराजअनाथनिनाथै।
श्रीयदुनाथकोभक्त अनूपमसेवी सदाद्विजसाधुनगाथै ॥
तेज तपै दिननाथसों जासु यशो निशि नाथ दिपै महिमाथै
तापद् पाथजमें सुख साथ है जोरिकैहाथनवावतमाथै ॥ १ ॥
दोहा-पवनपूत जय दुखदवन, राम दूत सुखधाम ॥
शमन धूत सुकृपाभवन, बल अकूथ सब ठाम ॥ ७ ॥
जय कबीर मतिधीर अति, रति जेहिं पद रघुवीर ॥
क्षीर नीर सत असत कर,विवरण हंस शरीर ॥ ८ ॥
जय हरि गुरु हरि दास पद, पंकज मोहिं भरोस ॥
जाकी कृपा कटाक्षते,मिटत सकल अफसोस॥ ९ ॥
संतत संतन भूसुरण, चरण कमल शिरनाय ॥
बार बार विनती करौं, सब मिलि करो सहाय ॥ १० ॥
रच्यो रामरसिकावली, ग्रंथ भूप रघुराज ॥
तामें बहु भक्तन कथा, वरण्यो भरि सुखसाज ॥ ११ ॥
भक्तमाल नाभा सुकृत, ताहीके अनुसार ॥
श्रीकबीरहू की कथा, तामें रची उदार ॥ १२ ॥
छप्पय-जो कबीर बांधव नरेश वंजावलि भाखी ॥
अरु आगमनिर्देश भविष्यहु जो रचि राखी ॥
सोउ समास सहुलास तासु मैं वर्णन कीनो ॥
सुनत गुणत जेहिं सुकवि संत संतत सुख भीनो ॥
तेहि तुम वरणौ विस्तार युत, शासन नृप रघुराज दियो ॥
कह युगलदास धरि शीश सो, वर्णन हौं आरंभकियो॥१॥
घनाक्षरी ।
प्रथम कबीरजी सिधारि पुरी मथुरामें संतन सहित अति हरष बढ़ायकै ॥
तहां धर्मदास आय प्रभु पदपंकजमें बैठो बार बार शीश सादर नवायकै ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ६६१ )
ज्ञान उपदेश ताको कीन्ह्यो श्रीकबीर तहां कह्यो सो न इति भीति विस्तर बुझायकै ॥
मानिकै यथारथ कृतारथ ह्वै धर्मदास चलि मथुरा ते पथ गौन्यों चिते चायकै ॥२॥
दोहा-धर्मदास आवत भये, बांधौगढ़ सहुलास ॥
गुरु विश्वास दढ़ वास किय, जासु हिये आवास॥१३॥
पुनि कछु दिन बीतेसुख छाये । श्रीकबीर बांधव गढ़ आये ॥
तहँ चौहट बजार मधिमाहीं । निरखि एक सेमर तरु काहीं ॥
तहाँ आठ दिन आसन कीन्ह्यो । सेमर तरु उड़ाय पुनि दीन्ह्यो ॥
निरखि लोग सब अचरज माने । भूपति सों सब जाय बखाने ॥
महाराज साधू यक आई । सेमरतरुको दियो उड़ाई ॥
गुणि अचरज भूपति अतुराई । प्रभु पद किय दंडवत सिधाई ॥
सादर नृप कर जोरि सुहाये । पूंछ्यो नाथ कहांसें आयें ॥
तब प्रभु बचन कह्यो अभिरामा । हम कबीर निवसैं यहि ठामा ॥
दोहा-तब राजा पूंछत भयो, कैसे जानैं नाथ ॥
देहु परीक्षा हमहिं जो, तौ लखि होयँ सनाथा॥१४॥
होत अज्ञान नाश जेहिं तेरे । कहिय नाथ सो ज्ञान निवेरे ॥
देवी आदि वेदकी जोई । आदि निरंकारहु जो होई ॥
सादर पूंछत भयो भुआला । दियो बताय कबीरकृपाला ॥
राजाराम कह्यो पुनि बैना । कहिय जो आदि बघेल सचैना ॥
तब तुमकों कबीर हम जानें । अपनो जन्म सफल करि मानैं ॥
सुनि कबीर तब मृदु मुसक्याई । उत्पत्ति जौन बघेल सोहाई ॥
लागे कहन भूपसों सो सब । हम साकेत रहे निवसे जब ॥
तब मोसों कह श्रीरघुराई । तुम कबीर संसारहि जाई ॥
दोहा-जीवनको उपदेश करि, मेरो ज्ञान अशोक ॥
हमरे लोकपठावहू, जो पद आनँद थोक ॥ १५ ॥
छंद-द्वापर अंत आदि कलियुगमें कृष्ण प्रकाश अनूपा ॥
पूरुब दिशि सागरके तटमें धरिहैं बोध स्वरूपा ॥
( ६६२ ) बघेलवंशवर्णन ।
तहां जाय तुम प्रकट होउ यह रघुवर आयसु पाई ॥
प्रगटि वोडैसा जगपतिकेरो दरशन लीन्ह्यों जाई ॥ १ ॥
सागर तीर गाड़ि कुबरी पुनि बाँधि तासु मर्यांदा ॥
पुनि परबोधि सिंधुको बहु विधि गमन्यों युत अह्नादा ॥
चलत चलत गुजरात आयकै नगर विलोक्यो जाई ॥
जहां सुलंक भूप बहु साधुन राखे रहो टिकाई ॥ २ ॥
भक्तिवान अति रही रानि अति नित सब साधुन केरो ।
दर्शन करिलै तिन चरणामृत निज घर करै बसेरो ॥
ते साधुनको दर्शन करिकै एक वृक्षतर जाई ॥
वसि आसन बिछायकै बैठ्यो हरिको ध्यान लगाई॥३॥
यक दिन रानी सब साधुनको भोजन हित बोलवाई ॥
पंगति दिय बैठाय गयो मैं नहिं तहँवां हरषाई ॥
रानी तब मेरे आश्रममें आवतभै अतुराई ॥
महि तजि अंतरिक्ष आसन मम निरखि परम सुख पाई४
विनती किय प्रभु आपहु चलिकै मम घर भोजन कीजै ॥
मैं तब कह नहिं भूख प्यास मोहि हरि अधार गनि लीजै।
रानी कह यकतो सुत बिन मैं दुखित राज्य सब सूनी ॥
दूजे जो न आप पगुधारे तपी ताप तो दूनी ॥ ५ ॥
मैं कह सोच करै नहिं राजा द्वै सुत हैंहैं तेरे ॥
संतनको चरणामृत अबहीं लैआवे ढिग मेरे ॥
साधुन चरण धोय चरणोदक लैआई जब रानी ॥
दियो पियाय रानिको तब मैं निज चरणोदक सानी॥६॥
लहि मेरो वर साधुनकेरो बहु विधि करि सतकारा ॥
परम प्रमोद पायउर रानी गमनत भई अगारा ॥
कह्यो हवाल भूपसों सो सब सुनि नृप अति सुखपाई ।
लै फल फूल द्रव्य बहु सादर मम समीप द्रुत आई॥७॥
बघेलवंशवर्णन । ( ६६३ )
करि दंडवत प्रणाम विनय किय नाथ दया उर धारी ।
कछु दिन आप वास इत कीजै तौ मैं होहुँ सुखारी ॥
कुटी दियो बनवाय भूप तँहँ करतभयो मैं वासां ॥
कछु वासरमें गर्भवतीभै रानी सहित हुलासा ॥ ८ ॥
दोहा-ज्यों ज्यों रानीके उदर, बढ़्यो गर्भ करि वास ॥
त्यों त्यों रानीके वपुष, बाढ़यो परम प्रकाश ॥१६॥
कछु दिन बीते सुदिन जब आयो । तब रानी दुइ सुत उपजायो ॥
भयो जो जेठ पुत्र तेहि आनन । होत भयो सम मुख पंचानन ॥
लहुरों तनय होत जो भयऊ । तेहि नर तनु अति सुंदर ठयऊ ॥
लखि रानी अति अचरज मानी । दिय देखाय भूपति कहँ आनी ॥
मानि शंक भूपालउदासा । कह कबीर आयो मम पासा ॥
सादर करि दंडवत प्रणामा । कीन्हीं विनय भूप मतिधामा ॥
नाथ भये मेरै सुत दोई । है अति कृपा आपकी सोई ॥
पै जो भयो जेठ सुत स्वामी । व्याघ्र वदन सों यह बदनामी ॥
दोहा--सो सुनि मैं वाणी कही, करिकै बहुत प्रशंस ॥
यह सुत वंश वतंसभो, रामलोकको हंस ॥ १७ ॥
व्याघ्र वदन परतो दृग जोई । नाम बघेल ख्याति जग होई ॥
यातें वंश बयालसि तांईं । अटल राज्य रहि है महि ठांईं ॥
तेजवान यह होय महाना । पूरण भक्तिमान भगवाना ॥
वंश बयालसिलों अभिरामा । चलिहै तब बघेल कुल नामा ॥
यह वर लहि सों मेरे मुखते । भूपति आय महळ अति सुखते ॥
द्विजन दान दै तोपन कांहीं । दगवायो बहु बार तहाँहीं ॥
पुनि मोकहँ सो नृपति सुजाना । करि बहु विनय लाय निजथाना ॥
ऊंचे आसन पर बैठाई । पूजन किय अति आनँद छाई ॥
दोहा-रानीलै दोउ पुत्रको, मेरे पग दिय डारि ॥
तब मैं पुनि देतो भयों, बहु अशीस चित धारि १८
( ६६६ ) बघेलवंशवर्णन ।
कियो शङ्क नहि कोष न देशू । नहिं चाकर यह बड़ो अँदेशू ॥
चलिहै किमि जग नाम हमारो । नहिं कबीर वर मृषा विचारो ॥
करत करत यहि भांति विचारा । होतभयो जबही भिनसारा ॥
दोहा-सपदि भूप जयसिद्ध तब, जाय जनकके पास ॥
विनय कियो करजोरिकै, मोहिं यह परमहुलास २४
करि महि अटन तीर्थ सब करहूँ । परम प्रमोद हिये महँ भरहूँ ॥
करै न धर्म धरै धन जोरी । क्षत्री ह्वै करतो धन चोरी ॥
तेहि नृप तेजअंश घटिजाइ । ताते धर्म करै मनलाई ॥
करै नीति रण पीठि न देई । सो नृप अनुपम यश महि लेई ॥
यह सुनि सब बघेल सुख पायो । पितु प्रसन्नह्वै वचन सुनायो ॥
जाहु हमारे पितुके पासा । कहौ करै जस हुकुम मकासा ॥
यह सुनिकै नयसिद्ध भुवाला । जाय पितामह निकट उताला ॥
शीश नवाय उभय कर जोरी । विनय कियो यह इच्छा मोरी ॥
दोहा-जात अहौं तीरथ करन, दीजै नाथ रजाय ॥
तब सुलंक नृप पौत्रसों, कह्यो गोद बैठाय ॥ २५ ॥
कौन कलेश पर्यो तुमकाहीं । जो निज राज्य रहतहौ नाहीं ॥
यह तुब सिगरी राज्य ललामा । का परदेश जानको कामा ॥
सुनि जयसिद्ध कही तब बाता । देहु राज्य दोंउ पुत्रन ताता ॥
काम न मम तुब राज्यहि तेरे । करिये विदा यही मन मेरे ॥
तिहरो यश जगमें अति होई । नहिं निंदा करि है जन कोई ॥
तब कबीर वरदान प्रभाउ । गुणि सुलङ्ग नृप भारी अति चाऊ ॥
युगल उतंग मतंग निवेरे । तीस तुरंग तबेले केरे ॥
तिनको नीकी भांति सजाई । द्रव्य ऊन्ट दै तुरत भराई ॥
दोहा-वीर महारणधीर जे, काल सरिस सरदार ॥
तिनको तिन सँग करत भे, औरहु चमू अपार २६
सुदिन शोधि जयसिद्ध नरेशा । पितु मातहिं किय खातिर वेशा ॥
पुनि रानी अतिशय विलखानी । महूँ संग चलिहौं कह वानी ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ६६७ )
जहां धर्म रहती तहँ माया । जहां रूप रहती तहँ छाया ॥
लै तिय सँग मोहिं शीश नवाई । मोसों बहुत आशिषा पाई ॥
दशहराकें दिन किय प्रस्थाना। पुरलोगनको करि सन्माना॥
कह कबीर पुनि मो ढिग आई । कीन्ही विनय प्रमोद बढ़ाई ॥
प्रभु मोहिं जिमि दीन्ह्यो वरदाना । तिमि मम सँग कीजिये पयाना ॥
तब मैं सुनि यह ताकारि बानी। हँसिकै वचन कह्यो सुखमानी ॥
दोहा-तुम सेवा अति मम करी, दोउ जन्मके मोर ॥
भक्त अहौ ताते चलहुँ, संग तजौं नहिं तोर ॥२७॥
विजय मुहूरत अबहिं नृप, गुणि मम वचन प्रमान॥
मुदित निसान बजायकै, वेगिहिं करहु पयान॥२८॥
छंद-वर मानि मोर निदेश, जयसिद्ध नाम नरेश ॥
पितु पितामह ढिग जाय, बहु भाँति शीशनवाय॥१॥
स्वरदाहिनो नृप साधि,चढ़ि चल्यो हय सुख कांधि॥
तेहिं समय पुरजन यूह,जुरि दिय अशीस समूह ॥२॥
जस देश यह गुजरात, तसदेश लहो विख्यात ॥
तुब पर देवी मात, रक्षक रहै दिन रात ॥ ३ ॥
तिमि रानि भारि अति चाव, परि सासु ससुराह पाँउ ॥
कह छोंड़ियो नहिं छोह, नहिं किह्यो कबहूं कोह॥४॥
पुनि रानि युत जयसिद्ध, यश जासु जगत् प्रसिद्ध ॥
मोहिं सहित साधु समाज, संग लै चमू छवि छाज ५॥
किय गवन मग रणधीर, तनु धरे मनु रसबीर ॥
बिच बीच पथ करि वास, पुरगढ़ा कोसहुलास ॥६॥
पहुँच्यो महीश सुजान, लिय भूप तहँ अगवान ॥
निज महल गयो लेवाय, दिय नज़र बहु सुख छाय ७॥
जयसिद्ध पुनि नरराय, सरि नर्मदामें जाय ॥
तिय सहित करि स्नान, धन अमित दीन्ह्यो दान ८॥
( ६७० ) बघेलवंशवर्णन ।
तुमहीं राजा अहौ हमोरें । निशि दिन सेवन करब तिहारे ॥
भये खुशी केहरीसिंह सुनि । करि नवाबको अति खातिर पुनि ॥
भवन जानकी दई बिदाई । गयो सो बार बार शिरनाई ॥
नृप केहरीसिंह सहुलासा । कछु वासर तहँ कियो निवासा ॥
सरदारनको करि सन्माना । सब चकरनको सहित विधाना ॥
दिय चिट्ठा चाकरी चुकाई । वसे सबै सेवा मनलाई ॥
दोहा--तहँ केहरी सिंहके, माल केसरी पूत ॥
होत भयो जाके वदन, वसी सरस्वता पूत ॥३७॥
उभय मल्लको जोर तनु, सुंदर तेज विधान ॥
कछु दिनमें तेहि व्याहकरि दीन्ह्यो दान महान ३८॥
फेरि व्यतीत भये कछुकाला । तनु तजि करि केहरी भुवाला ॥
वास कियो वासवपुर मांही । मालकेसरी सपदि तहांही ॥
विधि युत मृतकक्रिया पितुकेरो । करि दीन्ह्यो तहँ दान घनेरो ॥
मालकेसरी कछु दिन माहीं । उपजायो सुंदर सुत काहीं ॥
सारंग देव नाम तेहि भयऊ । सुयश प्रताप नाम तेहि ठयउ ॥
भीमलदेव भयो सुत तासू । फैलि रह्यो जगमें यश जासू ॥
हरिगुरुको भो भक्त महाना । पाल्यो परजन प्राण समाना ॥
ब्रह्मदेव ताके सुत जायो । सो निज पितुसों वचन सुनायो ॥
दोहा--आप कीजिये भजन हरि, सुचित भौन करि वास ॥
मोहिं दीजिये फौज सब, करि उर कृपा प्रकाश ॥३९॥
कछु दिन सैर करौं महि माहीं । प्रकटहुँ नाम रावरे काहीं ॥
सुनि नृप भीमलदेव उदारा । ब्रह्मसूनु सों वचन उचारा ॥
मनमें यह विचार किय नीको । करै सुपूती सोइ सुत ठीको ॥
जगमें नहिं कपूत कहवायो । अस करतूति करन मन लायों ॥
ब्रह्मदेव सुनि ये पितु वैना । करी तयारी भरि अतिचैना ॥
चतुरंगिनी चमू सँग लैके । कियो पयान वीररस ह्वैकै ॥
राज्य गहरवारनके आये । कछु वासर तहँ वसि सुख छाये ॥
पुनि सिधाय शिरनेतन देशू । तहँ विवाह किय ब्रह्म नरेशू ॥
बघेलावंशवर्णन । ( ६७१ )
दोहा-कछुक दिवस शिरनेतनृप, सेवा करि युत प्रीति ॥
ब्रह्मदेव सों समय गुणि, कह्यो विनयकी रीति ॥ ४० ॥
यक मम भाई देश हमारे । गनत न हमहिं भये बलवारे ॥
तिनको दंड दीजिये नाथा । तौ हम बसैं राज्य सुख साथा ॥
ब्रह्मदेव यह सुनि तेहिं वानी । कह नर पठैलेहिं हम जानी ॥
पुनि नृप ब्रह्मदेव रिस छायो । पाती यक ऐसी लिखवायो ॥
ग्यारहसै नेजा सँग लीन्हे । आवत तुब दरशन मन दीन्हे ॥
हैं बघेल हम विदित जहाना । तुम शिरनेत अनुज बलवाना ॥
यह हवाल लिखि पत्री काहीं । दै पठयो यक मनुज तहाँहीं ॥
सो पाती दियँ तिन कर जाई । बांचत गयो कोपमें छाई ॥
दोहा-तुरत जवाब लिखायकै, दीन्ह्यो तेहिं कर धारि ॥
आप दरश पावैं जो हम, धनि धनि भाग्य हमारि ॥ ४१ ॥
सुन्यों न हम बघेलको नामा । निरखि होहिं अब पूरण कामा ॥
पाती असि लिखाय शिरनेता । बांध्यो युद्ध करनको नेता ॥
फौज जोरि आगे कछु जाई । ठाढ़े भये रोष अति छाई ॥
इततें ब्रह्मदेवकी सैना । काल समान गई कछु मैना ॥
भगी फौज शिरनेतन केरी । नृप शिरनेत बन्धु तहँ घेरी ॥
पकरि भूप शिरनेतहिं काहीं । सौंप्यो सो अतिहीं सुख माहीं ॥
ब्रह्मदेवको निज सब देशू । सौंपिदियो शिरनेत नरेशू ॥
तहँ नृप ब्रह्मदेव सहुलासा । करत भये कछु वासर वासा ॥
दोहा-ब्रह्मदेवके होतभयो, तनय सिंह जेहिं नाम
सिंहदेवके पुनि भये, वेणीसिंह ललाम ॥ ४२ ॥
भूपति वेणीसिंहके, नरहरिसिंह सुजान ॥
नरहरि हरिके होतभे, भैददेव मतिवान ॥ ४३ ॥
शिरनेतनके सहित उछाहा । भैददेवको कियो विवाहा ॥
भैददेवकों परम प्रतापा । बाढ़्यो रिपुन देत अति तापा ॥
भैददेव पुनि पितु ढिग जाई । सादर विनती कियो सुहाई ॥
( ६१४ ) बघेलवंशवर्णन ।
सँग चलीसैन्य विशाल, सेनप लसे सम काल ॥
सुत सहित सैन समेत, विरसिंह नृप सुख सेत ॥ ९ ॥
नियरान चित्रहिकूट, तब सुन्यो शाह अटूट ॥
निज फौज दियो निदेश, तहँ भै तयारी बेस ॥१०॥
पयस्वनी सरिके पार, विरसिंह भूप उदार ॥
जब गयो हलकारान, किय विनय जोरे पान ॥११॥
सुनु खोंदावंद हवाल, बड़ी सैन्य आवति हाल ॥
सुनि बादशाह उमाह, भरिबैठ तखतहिं माह ॥१२॥
विरसिंहदेव भुवाल, गजते उतरि तेहिं काल ॥
ढिग शाह चलि अभिराम, बहुभांति कियो सलाम १३
समभानु पुनि विरभान, हयको उघाटि महान ॥
गजमस्त कै परजाय, बैठत भयो सुख छाय ॥ १४ ॥
लिखि साह तब हरषाय, तेहि तुरत निकट बोलाय ॥
लिय तखत में बैठाय, बहु विधि सराहि सुभाय॥१५॥
पुनि कह्यो बाँकेवीर, तुम सम न निडर सुधीर ॥
तुम कहँके अहौ नरेश, काहे चल्यो परदेश ॥ १६ ॥
सोरठा-केहि कारण मम देश, लूट्यो सो नहिं नीक किय॥
शाह वचन सुनि बेस, वीरभानु बोलत भयो॥४९॥
हम क्षत्री बघेल हैं रुरे । वासी थल गुजरातहि केरे ॥
आप हमारे हैं सति स्वामी । हम चाकर राउर अनुगामी ॥
निज करतब देखायबे काहीं । आये हम यहि देशहिं माहीं ॥
जो रिपुता करि हमको मारचो । ताको हमहूं सपदि सँहारचो ॥
तुव देशहिको द्रव्य न खायो । निज कोषहिको वित्त उठायो ॥
जो नृप हमको तेज देखायो । ताहि दंडदै फेरि बसायो ॥
सो आपहिकी बदिकारि दीन्ह्यो । वृथाकोप हमपर प्रभु कीन्ह्यो ॥
यह सुनि बादशाह कह वानी । यहि बालक की बुद्धि महानी ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ६७६ )
दोहा-पुनि कह विरसिंह देवसों, तुव सुत बड़ो निशंक ॥
रणरिपुगण जीतन प्रबल,बीर धीर अतिबंक ॥५०॥
छंदहरिगीतिका-तुव पूत बड़ो सुपूत हैहै वंशतिहरे माहिं ॥
नृप द्वादशौको भूप होई अचल भूमिसदाहिं ॥
यह आशि शाह उछाह भरि वारहौँनृपकी राजि ॥
दियबख्शिशादर नानकाराहि कह्यो भाई भ्राजि ॥
गिरि विंध्य बाँधव दुर्गके तुम ईश होहु प्रसिद्ध ॥
नृप सकल महिके करहिं सेवा होयसिद्धि समृद्ध ॥
लिखिदियो विरसिंहदेवको पुनि भूप शाहसमेत ॥
चलि प्राग करि स्नान दिय बहुदान द्विजनसचेत ॥
तहँ भूप बहु सन्मानकरि कीन्ह्योनिमंत्रण शाह ॥
पुनि शाह दिल्लीको गयो प्रागहिं बस्यो नरनाह ॥
विरसिंहदेव विवाह किय सुत वीर भ्रातृहिंकेर ॥
सब जमींदारनको निमंत्रण दियो आये ढेर ॥ ३ ॥
दिय दान द्विजन महानयुत सन्मान मोद अमान ॥
सरसान सकल जहान बिच किय गायकन बहुगान॥
गज बाजि धन मणिमाल बसन विशाल दै सब काह॥
करि मान किय सबकी विदा विरसिंह सहित उछाह॥
दोहा-जमींदार निज निज सदन, जातभये हर्षाय ॥
त्योंहीं याचक गुणीजन,गये अमित धन पाय ॥५१॥
करिकै सविधि क्रिया पितु केरी । विरसिंहदेव द्विजन बहु हेरी ॥
विविध विधान दान बहु दीन्ह्यो । युत सन्मान विदा बहु कीन्ह्यो ॥
कछु वासर करि वास प्रयागा । विरसिंहदेव भूप बड़ भागा ॥
बोलि ज्योतिषिन सुदिन शोधाई । चकरनको चाकरी देवाई ॥
करि खातिरी कह्यो तिनपाहीं । काल्हि सुदिन हमरो सुख माहीं ॥
चलो सबै बांधव गढ़ देखी । सुनत बीर है सयुग विशेखी ॥
( ६७६ ) बघेलवंशवर्णन ।
कहें नाथ भल कीन सलाहा । हमरें उर महान उत्साहा ॥
पुनि विरसिंहदेव मुद भरिकै । वीरभानु युत मज्जन करिकै ॥
दोहा-वेणीमें बहु दान दै, युत सन्मान द्विजान ॥
लै सँग सैन्य पयान किय,विपुल बजाय निसान ५२॥
कवित्त ।
सोहत सवाव लाख संगमें सवार लोने युग लाख पैदरहु गौने जासु साथमें ॥
बेशुमारगज त्योंहीं सुतर अपार राजे योंहीं कूँच करि भरे आनँदके गाथमें ॥
बिच बिच पंथ वास करि बांधवदुर्ग,पास आय नीचे डेरा कियो धारे अस्त्रहाथमें।
विरसिंहदेव जाय लषणकी पूजा तहां करि सविधान धार्यो पद जल माथमें ॥१॥
स०-सादर साधुन विप्रनको नृप छिप्र भली विधि बोलि जेवायो
फेरि सबै ज़मींदारन औ भुमियानको आपने पास बोलायो ॥
ते सब आय सलाम किये दिये भेट कह्यो नृप वैन सोहायो ॥
डेरा करो सब जाय सुखी दियो दण्ड तेहीं जो बोलाये न आयो
दोहा-सांझ समय दरबारको, सादर सबहिं बोलाय ॥
कह रै यत तुम शाहकै, सुनहु सबै चित लाय ॥५३॥
कवित्त ।
शाह यह राज्य हमें दियो है उछाह भरि प्रथम सम्प्रीति वैन सबसों बखानै हैं॥
रीति या बघेलवंशकी है क्रोध ठानै नाहिं येतेहुँ पै कोई जो न हुकुमको मानै हैं ॥
युद्ध करिवेको जो तयार होत ताको हम बाघही है क्रुद्ध ह्वैकै आसनको ठानै हैं ॥
ऐसे अवनीशवैन सुनि सुनि शीशनाय कहे हम रावरेके रैयत प्रमानै हैं ॥ १ ॥
सोरठा-ईश्वर आप हमार, हम सेवक हैं रावरे ॥
सुनि गढ़भूप उदार,आयो विरसिंहदेव ढिग॥५४॥
कवित्त ।
तेग धरि आगे विनय कियों अहैं बाल हम आपहूँ हमारे पिता पालैं प्रीति ठानिकै॥
सुनि विरसिंहदेव बाहँ गहि पुत्र कहि लीन्ह्यो बैठाय उर महामोद मानिकै ॥
कह्यो पुनि तूतो वीरभानुके समान मेरे कह्यो पुनि सोऊ पाणि जोरि सुख सानिकै॥
महाराज किला चलि बैठैं राज्य आसनमें करों सोई दीजिये निदेश दास जानिकै १