कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबघेलवंशवर्णन । ( ६७६ )
दोहा-पुनि कह विरसिंह देवसों, तुव सुत बड़ो निशंक ॥
रणरिपुगण जीतन प्रबल,बीर धीर अतिबंक ॥५०॥
छंदहरिगीतिका-तुव पूत बड़ो सुपूत हैहै वंशतिहरे माहिं ॥
नृप द्वादशौको भूप होई अचल भूमिसदाहिं ॥
यह आशि शाह उछाह भरि वारहौँनृपकी राजि ॥
दियबख्शिशादर नानकाराहि कह्यो भाई भ्राजि ॥
गिरि विंध्य बाँधव दुर्गके तुम ईश होहु प्रसिद्ध ॥
नृप सकल महिके करहिं सेवा होयसिद्धि समृद्ध ॥
लिखिदियो विरसिंहदेवको पुनि भूप शाहसमेत ॥
चलि प्राग करि स्नान दिय बहुदान द्विजनसचेत ॥
तहँ भूप बहु सन्मानकरि कीन्ह्योनिमंत्रण शाह ॥
पुनि शाह दिल्लीको गयो प्रागहिं बस्यो नरनाह ॥
विरसिंहदेव विवाह किय सुत वीर भ्रातृहिंकेर ॥
सब जमींदारनको निमंत्रण दियो आये ढेर ॥ ३ ॥
दिय दान द्विजन महानयुत सन्मान मोद अमान ॥
सरसान सकल जहान बिच किय गायकन बहुगान॥
गज बाजि धन मणिमाल बसन विशाल दै सब काह॥
करि मान किय सबकी विदा विरसिंह सहित उछाह॥
दोहा-जमींदार निज निज सदन, जातभये हर्षाय ॥
त्योंहीं याचक गुणीजन,गये अमित धन पाय ॥५१॥
करिकै सविधि क्रिया पितु केरी । विरसिंहदेव द्विजन बहु हेरी ॥
विविध विधान दान बहु दीन्ह्यो । युत सन्मान विदा बहु कीन्ह्यो ॥
कछु वासर करि वास प्रयागा । विरसिंहदेव भूप बड़ भागा ॥
बोलि ज्योतिषिन सुदिन शोधाई । चकरनको चाकरी देवाई ॥
करि खातिरी कह्यो तिनपाहीं । काल्हि सुदिन हमरो सुख माहीं ॥
चलो सबै बांधव गढ़ देखी । सुनत बीर है सयुग विशेखी ॥