कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६१४ ) बघेलवंशवर्णन ।
सँग चलीसैन्य विशाल, सेनप लसे सम काल ॥
सुत सहित सैन समेत, विरसिंह नृप सुख सेत ॥ ९ ॥
नियरान चित्रहिकूट, तब सुन्यो शाह अटूट ॥
निज फौज दियो निदेश, तहँ भै तयारी बेस ॥१०॥
पयस्वनी सरिके पार, विरसिंह भूप उदार ॥
जब गयो हलकारान, किय विनय जोरे पान ॥११॥
सुनु खोंदावंद हवाल, बड़ी सैन्य आवति हाल ॥
सुनि बादशाह उमाह, भरिबैठ तखतहिं माह ॥१२॥
विरसिंहदेव भुवाल, गजते उतरि तेहिं काल ॥
ढिग शाह चलि अभिराम, बहुभांति कियो सलाम १३
समभानु पुनि विरभान, हयको उघाटि महान ॥
गजमस्त कै परजाय, बैठत भयो सुख छाय ॥ १४ ॥
लिखि साह तब हरषाय, तेहि तुरत निकट बोलाय ॥
लिय तखत में बैठाय, बहु विधि सराहि सुभाय॥१५॥
पुनि कह्यो बाँकेवीर, तुम सम न निडर सुधीर ॥
तुम कहँके अहौ नरेश, काहे चल्यो परदेश ॥ १६ ॥
सोरठा-केहि कारण मम देश, लूट्यो सो नहिं नीक किय॥
शाह वचन सुनि बेस, वीरभानु बोलत भयो॥४९॥
हम क्षत्री बघेल हैं रुरे । वासी थल गुजरातहि केरे ॥
आप हमारे हैं सति स्वामी । हम चाकर राउर अनुगामी ॥
निज करतब देखायबे काहीं । आये हम यहि देशहिं माहीं ॥
जो रिपुता करि हमको मारचो । ताको हमहूं सपदि सँहारचो ॥
तुव देशहिको द्रव्य न खायो । निज कोषहिको वित्त उठायो ॥
जो नृप हमको तेज देखायो । ताहि दंडदै फेरि बसायो ॥
सो आपहिकी बदिकारि दीन्ह्यो । वृथाकोप हमपर प्रभु कीन्ह्यो ॥
यह सुनि बादशाह कह वानी । यहि बालक की बुद्धि महानी ॥