कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें.( ६५० ) बीजक कबीरदास ।
सुरातिसंभारै"॥ सो ऐसे पिताकी बातमानु यह झूठसनेह छोड़िदे जो अपने को ब्रह्म
मानिकै बैठे हैं कि महीं ब्रह्महौं यह ब्रह्मतौ मनको अनुभवहै झूठा है जीव ब्रह्म
कबहूं नहीं होयहै ॥ ३४४ ॥
सबै आशकरशून्यनगरकी, जहां न कर्त्ता कोई ॥
कह कबीर बूझौ जियअपने, जातेभरम न होई॥३४५॥
सबै वह शून्यनगरकी आशाकरै हैं जहां कोई कर्त्ता नहीं है सो वह तौं
झूठाहै सो कबीरजी कहै हैं कि तुम अपने मनमें बूझौ तौ उहांतौ कर्त्ता हई
नहीं है औ जगत् बनैहै तौ कौन जगत को कियो है तेहिते निराकार अकर्त्ता
ब्रह्म कहनूति जो कहो है सो सब झूठी है सो यह तुम अपने जियमें बूझौ
जेहिते ब्रह्मवालो भ्रम तुमको न होइ ॥ ३४५ ॥
भक्तिभक्ति सबकोई कहै, भक्ति न आई काज ॥
जहँको किया भरोसवा, तँहते आई गाज ॥ ३४६ ॥
भक्तिभक्ति सबकोई कहै हैं और और देवनकी भक्ति करै हैं सो वा भक्ति
कौनौ काज न आई जेहि जेहि देवंको भरोसा कियो तहांत गाजआई कहे वें
सब काल स्वरूपहैं सब याको मारिकै अपने लोक लैगये जब महाप्रलय भई
तब इष्ट औ उपासक दोऊ न रहे पुनि जब जगत्की उत्पत्ति भई तब कर्मा-
नुसार वोऊ उत्पन्न भये ॥ ३४६ ॥
समुझौ भाई ज्ञानियो , काहु न कहा सँदेश ॥
जेइ गये बहुरे नहीं, है वह कैसा देश ॥ ३४७ ॥
हे भाई ज्ञानिउ तुम समुझते जाउ तौन तुम ब्रह्म ब्रह्मकहौ हौ तहां कों
संदेश कोई न कह्यो कहे सब वेदांती ब्रह्मज्ञानी कहैं हैं कि वाको तो हमकही
नहीं सकैहैं धोकेसाहै औ जे उहां गये ते बहुरिकै न आये जो वहां को सन्देश
बतावैं अर्थात् कुछ न हाथ लग्यो ॥ ३४७ ॥
धोखे सबजग बीतिया, धोखे गई सिराइ ॥
स्थितिनाकरै सो अपनी, यहदुख कहा न जाइ३४८॥