सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 698, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 698

( ६६६ ) बघेलवंशवर्णन ।
कियो शङ्क नहि कोष न देशू । नहिं चाकर यह बड़ो अँदेशू ॥
चलिहै किमि जग नाम हमारो । नहिं कबीर वर मृषा विचारो ॥
करत करत यहि भांति विचारा । होतभयो जबही भिनसारा ॥
दोहा-सपदि भूप जयसिद्ध तब, जाय जनकके पास ॥
विनय कियो करजोरिकै, मोहिं यह परमहुलास २४
करि महि अटन तीर्थ सब करहूँ । परम प्रमोद हिये महँ भरहूँ ॥
करै न धर्म धरै धन जोरी । क्षत्री ह्वै करतो धन चोरी ॥
तेहि नृप तेजअंश घटिजाइ । ताते धर्म करै मनलाई ॥
करै नीति रण पीठि न देई । सो नृप अनुपम यश महि लेई ॥
यह सुनि सब बघेल सुख पायो । पितु प्रसन्नह्वै वचन सुनायो ॥
जाहु हमारे पितुके पासा । कहौ करै जस हुकुम मकासा ॥
यह सुनिकै नयसिद्ध भुवाला । जाय पितामह निकट उताला ॥
शीश नवाय उभय कर जोरी । विनय कियो यह इच्छा मोरी ॥
दोहा-जात अहौं तीरथ करन, दीजै नाथ रजाय ॥
तब सुलंक नृप पौत्रसों, कह्यो गोद बैठाय ॥ २५ ॥
कौन कलेश पर्यो तुमकाहीं । जो निज राज्य रहतहौ नाहीं ॥
यह तुब सिगरी राज्य ललामा । का परदेश जानको कामा ॥
सुनि जयसिद्ध कही तब बाता । देहु राज्य दोंउ पुत्रन ताता ॥
काम न मम तुब राज्यहि तेरे । करिये विदा यही मन मेरे ॥
तिहरो यश जगमें अति होई । नहिं निंदा करि है जन कोई ॥
तब कबीर वरदान प्रभाउ । गुणि सुलङ्ग नृप भारी अति चाऊ ॥
युगल उतंग मतंग निवेरे । तीस तुरंग तबेले केरे ॥
तिनको नीकी भांति सजाई । द्रव्य ऊन्ट दै तुरत भराई ॥
दोहा-वीर महारणधीर जे, काल सरिस सरदार ॥
तिनको तिन सँग करत भे, औरहु चमू अपार २६
सुदिन शोधि जयसिद्ध नरेशा । पितु मातहिं किय खातिर वेशा ॥
पुनि रानी अतिशय विलखानी । महूँ संग चलिहौं कह वानी ॥

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित) · पृष्ठ 698, कुल 766 में से · SarvaKosh