कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबघेलवंशवर्णन । ( ६६७ )
जहां धर्म रहती तहँ माया । जहां रूप रहती तहँ छाया ॥
लै तिय सँग मोहिं शीश नवाई । मोसों बहुत आशिषा पाई ॥
दशहराकें दिन किय प्रस्थाना। पुरलोगनको करि सन्माना॥
कह कबीर पुनि मो ढिग आई । कीन्ही विनय प्रमोद बढ़ाई ॥
प्रभु मोहिं जिमि दीन्ह्यो वरदाना । तिमि मम सँग कीजिये पयाना ॥
तब मैं सुनि यह ताकारि बानी। हँसिकै वचन कह्यो सुखमानी ॥
दोहा-तुम सेवा अति मम करी, दोउ जन्मके मोर ॥
भक्त अहौ ताते चलहुँ, संग तजौं नहिं तोर ॥२७॥
विजय मुहूरत अबहिं नृप, गुणि मम वचन प्रमान॥
मुदित निसान बजायकै, वेगिहिं करहु पयान॥२८॥
छंद-वर मानि मोर निदेश, जयसिद्ध नाम नरेश ॥
पितु पितामह ढिग जाय, बहु भाँति शीशनवाय॥१॥
स्वरदाहिनो नृप साधि,चढ़ि चल्यो हय सुख कांधि॥
तेहिं समय पुरजन यूह,जुरि दिय अशीस समूह ॥२॥
जस देश यह गुजरात, तसदेश लहो विख्यात ॥
तुब पर देवी मात, रक्षक रहै दिन रात ॥ ३ ॥
तिमि रानि भारि अति चाव, परि सासु ससुराह पाँउ ॥
कह छोंड़ियो नहिं छोह, नहिं किह्यो कबहूं कोह॥४॥
पुनि रानि युत जयसिद्ध, यश जासु जगत् प्रसिद्ध ॥
मोहिं सहित साधु समाज, संग लै चमू छवि छाज ५॥
किय गवन मग रणधीर, तनु धरे मनु रसबीर ॥
बिच बीच पथ करि वास, पुरगढ़ा कोसहुलास ॥६॥
पहुँच्यो महीश सुजान, लिय भूप तहँ अगवान ॥
निज महल गयो लेवाय, दिय नज़र बहु सुख छाय ७॥
जयसिद्ध पुनि नरराय, सरि नर्मदामें जाय ॥
तिय सहित करि स्नान, धन अमित दीन्ह्यो दान ८॥