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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 697

बघेलवंशवर्णन । ( ६६३ )
करि दंडवत प्रणाम विनय किय नाथ दया उर धारी ।
कछु दिन आप वास इत कीजै तौ मैं होहुँ सुखारी ॥
कुटी दियो बनवाय भूप तँहँ करतभयो मैं वासां ॥
कछु वासरमें गर्भवतीभै रानी सहित हुलासा ॥ ८ ॥
दोहा-ज्यों ज्यों रानीके उदर, बढ़्यो गर्भ करि वास ॥
त्यों त्यों रानीके वपुष, बाढ़यो परम प्रकाश ॥१६॥
कछु दिन बीते सुदिन जब आयो । तब रानी दुइ सुत उपजायो ॥
भयो जो जेठ पुत्र तेहि आनन । होत भयो सम मुख पंचानन ॥
लहुरों तनय होत जो भयऊ । तेहि नर तनु अति सुंदर ठयऊ ॥
लखि रानी अति अचरज मानी । दिय देखाय भूपति कहँ आनी ॥
मानि शंक भूपालउदासा । कह कबीर आयो मम पासा ॥
सादर करि दंडवत प्रणामा । कीन्हीं विनय भूप मतिधामा ॥
नाथ भये मेरै सुत दोई । है अति कृपा आपकी सोई ॥
पै जो भयो जेठ सुत स्वामी । व्याघ्र वदन सों यह बदनामी ॥
दोहा--सो सुनि मैं वाणी कही, करिकै बहुत प्रशंस ॥
यह सुत वंश वतंसभो, रामलोकको हंस ॥ १७ ॥
व्याघ्र वदन परतो दृग जोई । नाम बघेल ख्याति जग होई ॥
यातें वंश बयालसि तांईं । अटल राज्य रहि है महि ठांईं ॥
तेजवान यह होय महाना । पूरण भक्तिमान भगवाना ॥
वंश बयालसिलों अभिरामा । चलिहै तब बघेल कुल नामा ॥
यह वर लहि सों मेरे मुखते । भूपति आय महळ अति सुखते ॥
द्विजन दान दै तोपन कांहीं । दगवायो बहु बार तहाँहीं ॥
पुनि मोकहँ सो नृपति सुजाना । करि बहु विनय लाय निजथाना ॥
ऊंचे आसन पर बैठाई । पूजन किय अति आनँद छाई ॥
दोहा-रानीलै दोउ पुत्रको, मेरे पग दिय डारि ॥
तब मैं पुनि देतो भयों, बहु अशीस चित धारि १८