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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 690

( ६५४ ) बीजक कबीरदास ।
कबीर जी कहै हैं कि नेइ जब बिगरि जायहै तब सगरौ घर बिगरि जायहै
ऐसे नेइ जो है धोखाब्रह्म जौनेको गुरुवालोग समुझावै है सोई जब मिथ्या
ठहरयो तब और सब लोकके देवता येई घरहैं ते बिगरिबोई चाहें अर्थात् इनते
अब कौन सांचफल मिलै सो श्री कबीर जी कहै हैं जो कोई साहब को समझै
अर्थात् तन मन ते लागै ताको काल नहीं खाय है और सब कालकों
कलेवा हैं ॥ ३६१ ॥
रामरहे बनभीतरे, गुरुकी पूजि न आश ॥
कहकबीर पाखंडसब, झूठे सदा निराश ॥ ३६२ ॥
बन जो है संसार तौनेके भीतर जब जीव भयो रामरहे कहे वह जीव रामते
राहत भयो रामको पुनि बरिआई पावै है अथवा रामते रहित जब जीवभयो तब
संसारी ह्वै जायहै और परमगुरु जे सुरति कमलमें बैठे रामनाम बतावै हैं तिनकी
आश न पूजतभई वे रामनाम बतावै हैं यह नहीं सुनै हैं वे छुड़ावन चहै हैं
सो नहीं छूटै हैं औ जे साहबको छोड़ि और औरमें लगावै हैं ते सब पाखण्डी हैं
झूठे हैं औ पाखण्डी जे हैं और औरमें लागे हैं तिनकी मुक्ति कबहूं नहीं होईहै
वे सदा निराशरहें तामें प्रमाण चौरासी अङ्गकी साखी॥"चकई बिछुरी रैनि की
जाय मिली परभात ॥ जे जन बिछुरे रामते दिवस मिलैं नहिं रात"॥३६२॥
बिनारूप बिनरेखको, जगत नचावै सोइ ॥
मारै पांचौजोनहीं, ताहिडरै सबकोई ॥ ३६३ ॥
जोमन जगत् को नचावै है सो बिनारूपको है औ बिनारेखको है आकाश
वायु आदिक जेहैं तिनमें रूपनहीं है पै रेख देखी परै है औ वायुको स्पर्श होय है
सोई रेखहै औ मनके रेखऊ नहीं है सो जे पांचौ पांचो ज्ञानेद्रिय कर्मेंन्द्रियकों
नहीं मारै हैं ऐसे गुरुवन को सबजने डेराते जाउ नहीं तौ तुम्हहूं को संसार
में डारि देइँगे ॥ ३६३ ॥
डरउपजा जिय है डरा, डरते परा न चैन ॥
देखा रामहि हैनहीं, यहौ कहै दिनरैन ॥ ३६४ ॥