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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 695

बघेलवंशवर्णन । ( ६६१ )
ज्ञान उपदेश ताको कीन्ह्यो श्रीकबीर तहां कह्यो सो न इति भीति विस्तर बुझायकै ॥
मानिकै यथारथ कृतारथ ह्वै धर्मदास चलि मथुरा ते पथ गौन्यों चिते चायकै ॥२॥
दोहा-धर्मदास आवत भये, बांधौगढ़ सहुलास ॥
गुरु विश्वास दढ़ वास किय, जासु हिये आवास॥१३॥
पुनि कछु दिन बीतेसुख छाये । श्रीकबीर बांधव गढ़ आये ॥
तहँ चौहट बजार मधिमाहीं । निरखि एक सेमर तरु काहीं ॥
तहाँ आठ दिन आसन कीन्ह्यो । सेमर तरु उड़ाय पुनि दीन्ह्यो ॥
निरखि लोग सब अचरज माने । भूपति सों सब जाय बखाने ॥
महाराज साधू यक आई । सेमरतरुको दियो उड़ाई ॥
गुणि अचरज भूपति अतुराई । प्रभु पद किय दंडवत सिधाई ॥
सादर नृप कर जोरि सुहाये । पूंछ्यो नाथ कहांसें आयें ॥
तब प्रभु बचन कह्यो अभिरामा । हम कबीर निवसैं यहि ठामा ॥
दोहा-तब राजा पूंछत भयो, कैसे जानैं नाथ ॥
देहु परीक्षा हमहिं जो, तौ लखि होयँ सनाथा॥१४॥
होत अज्ञान नाश जेहिं तेरे । कहिय नाथ सो ज्ञान निवेरे ॥
देवी आदि वेदकी जोई । आदि निरंकारहु जो होई ॥
सादर पूंछत भयो भुआला । दियो बताय कबीरकृपाला ॥
राजाराम कह्यो पुनि बैना । कहिय जो आदि बघेल सचैना ॥
तब तुमकों कबीर हम जानें । अपनो जन्म सफल करि मानैं ॥
सुनि कबीर तब मृदु मुसक्याई । उत्पत्ति जौन बघेल सोहाई ॥
लागे कहन भूपसों सो सब । हम साकेत रहे निवसे जब ॥
तब मोसों कह श्रीरघुराई । तुम कबीर संसारहि जाई ॥
दोहा-जीवनको उपदेश करि, मेरो ज्ञान अशोक ॥
हमरे लोकपठावहू, जो पद आनँद थोक ॥ १५ ॥
छंद-द्वापर अंत आदि कलियुगमें कृष्ण प्रकाश अनूपा ॥
पूरुब दिशि सागरके तटमें धरिहैं बोध स्वरूपा ॥