कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६६२ ) बीजक कबीरदास ।
जिसका मंत्रजपैं सब सिखिकै, तिसके हाथ न पाउं ॥
कहै कबीर मातुसुतकाही, दिया निरंजन नाउं॥३५३॥
जिसका मन्त्र सब सिखिकै जपै हैं प्रणव उसका अर्थ ब्रह्मही है जिसके
हाथ पांउ नहीं हैं औ निरञ्जन जो है ब्रह्म ताको निरञ्जननाम मायैको धरायो
है माया वा निरञ्जन ब्रह्मकी माता है काहेते कि या निरञ्जन नाम बचन में
आवै है बिज्ञान करिकै अनुभव जो ब्रह्म होईहै सो मनका अनुभवहै मायै-
को पुत्रहै वह माया मनमें मिलि इच्छारूपहै सो जाको तुम ब्रह्म कहौहौ सोई
माया ते रहित नहीं है तुम कैसे अहम्ब्रह्म मानि माया ते रहित होउगे तामें
प्रमाण कबीरजीके शब्दको ॥ “मनपरपञ्ची मनैनिरञ्जन मनही है ओङ्कारा ।
तीनलोक मनफांसिलियाहै कोई न मनते न्यारा ॥ ३५३ ॥
जनि भूलौरे ब्रह्मज्ञानी, लोकवेदके साथ ॥
कहकबीर यह बूझहमारी, सो दीपकालियेहाथ ३५४॥
कबीरजी कहै हैं कि रे ब्रह्मज्ञानी तुम जनि भूलौ लोक वेदके साथ लोकमें
सरहना पायकै वेद में धोखाब्रह्ममें लगिकै अर्थात् तुम यामें न खराब होउ । सों
कह कबीर यह बूझ हमारी कहे कायाके बीर जीवौ परमपुरुष जे साहब श्रीरा-
मचन्द्र तिनमें तन मन ते लागो जो हमारी बूझहै सोई साहबके अनुराग रूप
दीपकहाथमें लेउ जाते संसाररूप अन्धकारते पारहोउ ॥ ३५४ ॥
देव न देखा सेवकाहि, सेवक देवनदीख ॥
कहकबीर इन मरते देखो, यह गुरु देई सीख॥३५५॥
देवता आपने सेवकको सेवक आपने इष्ट देवताको न दीख तिनको कबी-
रजी कहै हैं कि हम दूनों को मरते देखा है अर्थात् महाप्रलय में नहीं रहैं ताते
हम गुरुकी सीख इनको देते हैं कि धोखा औ नाना मतको त्यागि साहब कों
जानो जाते जनन मरण छूटै या सीख देते हैं ॥ ३५५ ॥
तेरीगति तैं जानै देवा, हममें समरथ नाहीं ॥
कहकबीर यहभूल सबनकी, सबपरे संशय माहीं॥३५६॥